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राजस्थान हाईकोर्ट ने सोमवार को एक मोटर दुर्घटना मुआवजा मामले में फैसला सुनाते हुए मुआवजा राशि में 3.81 लाख रुपए की बढ़ोतरी की है। जस्टिस रेखा बोराणा की एकलपीठ ने मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल, जोधपुर द्वारा दिए गए 10 लाख 73 रुपए के मुआवजे को बढ़ाकर

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कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि मृतक अपने परिवार का इकलौता कमाने वाला था। उसके लकवाग्रस्त पिता भी बेटे पर ही आश्रित थे। ट्रिब्यूनल ने मुआवजा राशि तय करने में मृतक को अकुशल मजदूर माना, जो कि उचित नहीं था।

जोधपुर में पाल चौराहा पर 2013 में हुआ था हादसा

गत 9 जून 2013 को शाम 7:40 बजे जोधपुर के पाल चौराहे की ओर भैराराम उर्फ सुमेर (25) अपने साले कालूराम के साथ मोटरसाइकिल पर सांगरिया से बंबोर जा रहा था। इसी दौरान गलत दिशा में आई एक अल्टो कार के चालक ने तेज रफ्तार व लापरवाही से ड्राइविंग करते हुए मोटरसाइकिल को टक्कर मार दी। इस हादसे में दोनों को गंभीर चोटें आईं और भैराराम की मौके पर ही मौत हो गई। घटना के संबंध में चौपासनी हाउसिंग बोर्ड थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी।

ट्रिब्यूनल ने 10.73 लाख रुपए दिए थे

जोधपुर जिले के बंबोर गांव के निवासी मृतक भैराराम मेघवाल की विधवा पत्नी लक्ष्मी (25 वर्षीय), 6 वर्षीय पुत्र युवराज, पिता खियाराम (58) और मां चुकीदेवी (56) ने मुआवजे की मांग करते हुए दावा याचिका दायर की थी। इसमें कार के चालक रूपाराम, गाड़ी के मालिक मदनसिंह और बीमा कंपनी रॉयल सुंदरम एलायंस इंश्योरेंस कंपनी को पक्षकार बनाया गया था।

मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल, जोधपुर मेट्रोपॉलिटन ने 31 अगस्त 2018 को अपने फैसले में मृतक की मासिक आय 4,980 रुपए आंकी। इसी आधार पर कुल 10,73,968 रुपए (50,000 रुपए के अंतरिम राहत सहित) का मुआवजा दिया था। ट्रिब्यूनल ने 7 मार्च 2014 यानी दावा याचिका दाखिल होने की तारीख से 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी दिया था। इसे कम बताते हुए पीड़ित परिवार ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

खंडवालिया की आय को लेकर विवाद

याचिकाकर्ताओं के वकील संतोष कुमार सांखला ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि मृतक भैराराम मेघवाल खदान में पत्थर तोड़ने (खंडवालिया) का काम करता था और 15,000 रुपए मासिक कमाता था। उन्होंने कहा कि ट्रिब्यूनल ने गलती से अकुशल मजदूर की न्यूनतम मजदूरी के आधार पर 4,980 रुपए मासिक आय आंकी, जबकि साक्ष्य में साबित हुआ था कि मृतक की आय अधिक थी। मृतक की पत्नी लक्ष्मी ने अपने बयान में स्पष्ट रूप से कहा था कि उनके पति खदान मजदूर के रूप में हर महीना 15,000 रुपए कमाते थे।

पिता को आश्रित मानने का मुद्दा

याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल ने गलती से मृतक के पिता को आश्रित नहीं माना, जबकि रिकॉर्ड में साबित था कि वह वर्षों से लकवाग्रस्त थे और कोई कमाई नहीं कर रहे थे। चूंकि आश्रितों की संख्या चार थी, इसलिए व्यक्तिगत खर्च के लिए एक-तिहाई के बजाय एक-चौथाई कटौती होनी चाहिए थी। याचिकाकर्ताओं ने यह भी कहा कि ट्रिब्यूनल ने कंसोर्टियम के तहत अपर्याप्त मुआवजा दिया था।

मजदूर परिवार से दस्तावेजी साक्ष्य की अपेक्षा नहीं

जस्टिस रेखा बोराणा ने सभी साक्ष्यों और सुप्रीम कोर्ट के अलग-अलग फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मजदूर के परिवार से दस्तावेजी साक्ष्य की अपेक्षा नहीं की जा सकती। कोर्ट ने रामचंद्रप्पा बनाम रॉयल सुंदरम एलायंस इंश्योरेंस कंपनी मामले का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने खदान मजदूर की आय 5,500 रुपए मासिक आंकी थी। कोर्ट ने कहा कि मृतक 25 वर्ष का युवा और स्वस्थ व्यक्ति था और परिवार का एकमात्र कमाने वाला था। हाईकोर्ट ने सरकारी अधिसूचना के अनुसार 1 मई 2013 को कुशल मजदूर की न्यूनतम मजदूरी 186 रुपए प्रतिदिन यानी 5,580 रुपए मासिक मानी।

कोर्ट ने कहा कि चूंकि मृतक के पिता लकवाग्रस्त थे और स्वयं की आय नहीं थी, इसलिए पिता को आश्रित माना गया और व्यक्तिगत खर्च की कटौती एक-चौथाई की गई।

कोर्ट ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी बनाम प्रणय सेठी और मैग्मा जनरल इंश्योरेंस बनाम नानूराम के मामलों का हवाला देते हुए कहा कि कंसोर्टियम एक व्यापक शब्द है। इसमें पत्नी को पति खोने का नुकसान, बच्चे को पिता खोने का नुकसान और माता-पिता को अपने बच्चे को खोने का नुकसान शामिल है। इसलिए प्रत्येक याचिकाकर्ता (पत्नी लक्ष्मी, पुत्र युवराज, पिता खिया राम और माता चुकी देवी) को 40,000 रुपए यानी कुल 1,60,000 रुपए कंसोर्टियम के तहत दिए गए।

दो माह में जमा करना होगा

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि बढ़ी हुई राशि पर दावा याचिका दाखिल करने की तारीख से 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज मिलेगा। बीमा कंपनी को इस आदेश की प्रति प्राप्त होने से दो माह के भीतर ट्रिब्यूनल में राशि जमा करनी होगी, अन्यथा इस आदेश की तारीख से वास्तविक भुगतान तक 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लगेगा।



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