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आरएसएस ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर शहर की देवश्वर बस्ती द्वारा पथ संचलन का आयोजन किया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर शहर की देवश्वर बस्ती द्वारा पथ संचलन का आयोजन किया। यह संचलन टांकरिया हनुमान मंदिर प्रांगण से शुरू होकर विभिन्न गलियों से गुजरा और वापस मंदिर पर समाप्त हुआ।
पथ संचलन में स्वयंसेवकों ने पूर्ण गणवेश में भाग लिया। घोष वादन के साथ कदम से कदम मिलाते हुए उन्होंने अनुशासन, एकता और शक्ति का प्रदर्शन किया। मार्ग में माता-बहनों और नागरिकों ने ‘भारत माता की जय’ के नारे लगाते हुए पुष्पवर्षा कर स्वयंसेवकों का स्वागत किया।
इस अवसर पर मुख्य वक्ता संजीव ने अपने उद्बोधन में कहा कि आज शास्त्र के साथ शस्त्र का ज्ञान भी आवश्यक है। उन्होंने जोर दिया कि बिना शस्त्र के शास्त्र की रक्षा नहीं हो सकती और बिना शास्त्र के शस्त्र का कोई महत्व नहीं है।
संजीव ने कहा कि संघ के 100 वर्ष पूरे हो गए हैं, लेकिन हिंदू समाज का जातियों में बंटा होना समाज हित में नहीं है। उन्होंने मुगलों और अंग्रेजों द्वारा सामाजिक ताने-बाने को ध्वस्त करने का जिक्र करते हुए आंतरिक दोषों को दूर करने और शत्रु को पहचानने की आवश्यकता बताई। उन्होंने ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का संस्कार देने वाली पारिवारिक व्यवस्था को फिर से स्थापित करने का आह्वान किया।
उन्होंने संघ की कार्यपद्धति, राष्ट्र सेवा और समाज निर्माण के महत्व पर प्रकाश डाला। संजीव ने संघ के पंच परिवर्तनों, सामाजिक समरसता, कुटुंब प्रबोधन, स्वदेशी, नागरिक बोध और पर्यावरण के विषय पर विस्तार से चर्चा की।
कुटुंब प्रबोधन के महत्व पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह केवल कहने से नहीं आएगा, बल्कि इसकी शुरुआत स्वयं से करनी होगी, जैसे परिवार के साथ एक समय का भोजन करना। उन्होंने भारतीय संस्कृति, परंपरा और देश-समाज से जुड़े विषयों पर चर्चा करने, सगे-संबंधियों की सुध लेने और मित्रों-परिजनों से सपरिवार मिलकर पर्व-त्योहार मनाने का सुझाव दिया।
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