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ऐतिहासिक नगरी चित्तौड़गढ़ में जहां एक ओर दुर्ग अपनी भव्यता और गौरवशाली इतिहास के लिए प्रसिद्ध है, वहीं दूसरी ओर यहां मौजूद छोटे-छोटे स्मारक और मूर्तिशिल्प भी प्राचीन संस्कृति और कला की झलक दिखाते हैं। रतन पैलेस के बाहर स्थित रत्नेश्वर तालाब की पूर्वी

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यह पैनल सामान्य पर्यटक की नजर से शायद छिपा रह जाए, लेकिन जब कोई इसे ध्यान से देखता है तो इतिहास और कला के अद्भुत संगम से रूबरू होता है। इसमें सात माताओं के साथ भगवान शिव और भगवान गणेश की मूर्तियां भी उत्कीर्ण हैं। भले ही कुछ मूर्तियां खंडित हो चुकी हैं, लेकिन उनकी प्राचीनता और कलात्मकता आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है।

पैनल की शुरुआत शिवजी से और अंत गणेश से

रत्नेश्वर तालाब की दीवार पर बना यह पैनल एक विशेष क्रम का पालन करता है। इसकी शुरुआत भगवान शिव से होती है और समापन भगवान गणेश पर होता है। यह व्यवस्था प्रतीकात्मक सृजन और संहार के अधिपति शिव से आरंभ और विघ्नहर्ता गणेश पर अंत भी है।

पुरातत्व विभाग, उदयपुर वृत के संग्रहालय अधीक्षक अधिकारी हिमांशु सिंह बताते हैं कि इस पैनल में सात माताओं का स्वरूप स्पष्ट रूप से उकेरा गया है। इनमें ब्राह्मणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, इंद्राणी और चामुंडा शामिल हैं।

भगवान शिव यहां विश्वरूपम में नंदी पर विराजित हैं। उनके हाथों में वीणा और त्रिशूल है तथा गले में सर्प लिपटा हुआ है। शिवजी का यह स्वरूप उन्हें संगीत और शक्ति के अद्भुत संगम के रूप में प्रस्तुत करता है। पैनल के अंतिम छोर पर भगवान गणेश की मूर्ति है, जो अपने प्रिय भोजन मोदक पात्र के साथ विराजमान हैं।

सात माताओं का अद्भुत स्वरूप

अधीक्षक सिंह बताते हैं कि इस पैनल में सात माताओं को उनके वाहन और विशेष आयुधों के साथ दर्शाया गया है।

ब्राह्मणी – हंस पर विराजमान। चतुर्मुखी और चतुर्भुजी स्वरूप। उनके हाथों में वीणा, जयमाला, सुवा और कमंडलु है।

माहेश्वरी – बैल पर सवार। हाथों में त्रिशूल, सर्प और कमंडलु।

कौमारी – मयूर पर विराजमान। हाथों में शूल और कमंडलु।

वैष्णवी – गरुड़ वाहन पर। चतुर्भुजी स्वरूप, जिनके हाथों में पद्म, गदा, चक्र और शंख है।

वाराही – वराह स्वरूप में। अभय मुद्रा में विराजित। उनके हाथों में गदा और मछली स्पष्ट दिखते हैं, जबकि अन्य दो हाथ खंडित होने के कारण पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं।

इंद्राणी – हाथी पर विराजमान। उनके हाथ में वज्र है, जबकि दूसरा हाथ खंडित है।

चामुंडा – प्रेत वाहन पर विराजित। उनके हाथों में त्रिशूल और खड़क (तलवार) है।

इन सभी माताओं के स्वरूप न सिर्फ धार्मिक महत्व रखते हैं बल्कि भारतीय शिल्पकला की उत्कृष्ट परंपरा को भी दर्शाते हैं।

खंडित मूर्तियां भी देती हैं प्राचीनता का संदेश

हालांकि कुछ मूर्तियां खंडित हो चुकी हैं, फिर भी उनकी छवि स्पष्ट झलक देती है। विशेषकर वाराही और इंद्राणी की मूर्तियों में कुछ हाथ और आयुध टूट चुके हैं, लेकिन उनका शेष स्वरूप अब भी भव्यता और दिव्यता को प्रदर्शित करता है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि यह पैनल न केवल कला के लिहाज से महत्वपूर्ण है बल्कि धार्मिक दृष्टि से भी बेहद दुर्लभ है। सप्तमातृकाओं के साथ भगवान शिव और गणेश का समावेश इस पैनल को और भी अनूठा बनाता है।

ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व माना गया है

सप्तमातृकाओं की परंपरा भारतीय धर्म और संस्कृति में प्राचीन काल से रही है। इन्हें शक्तियों का सामूहिक रूप माना जाता है, जो बुराइयों के संहार और धर्म की रक्षा के लिए प्रकट होती हैं। चित्तौड़गढ़ जैसे ऐतिहासिक स्थल पर इन माताओं का ऐसा प्राचीन पैनल होना इस क्षेत्र की आध्यात्मिकता और धार्मिक चेतना का प्रमाण है।

भगवान शिव और गणेश की उपस्थिति इस पैनल को और भी विशेष बनाती है। शिवजी यहां वीणा वादन करते हुए दिखाई देते हैं, जो सामान्य शिव स्वरूपों से अलग है। वहीं गणेशजी अपने प्रिय मोदक पात्र के साथ श्रद्धालुओं को विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता के रूप में आशीर्वाद देते हैं।



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