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आजकल फैशन तेजी से बदल रहा है। इसकी वजह से फास्ट फैशन के कपड़ों में हर साल 15% बढ़ोतरी हो रही है। बदलते फैशन और सस्ते होते कपड़ों की वजह से अब देश में हर साल कपड़े का सवा नौ करोड़ टन वेस्ट तैयार होता है। जयपुर की बात करें तो यहां रोजाना दो हजार टन कचर
बात देश की करें तो केवल एक से दो प्रतिशत वेस्ट का रिसाइकिल होता है। इस वेस्ट का आधा डंपिंग यार्ड में जाता है, बाकी सड़कों पर बिखरा रहता है। यूनाइटेड नेशन एन्वायरमेंट प्रोग्राम 2025 की रिपोर्ट में यह चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। ये आंकड़े ग्लोबल से लोकल तक हैं। फोर्ब्स मैगजीन के मुताबिक देश में अब एक बार पहनने से करीब 40 टन कपड़े का वेस्ट सीधे डंपिंग यार्ड में जा रहा है। इसमें हर साल 10 से 15% की बढ़ोतरी हो रही है।
देश में 5 साल में 60% तक वेस्ट
पहले टेक्सटाइल के पूर्ण उपयोग के बाद 30% वेस्ट निकलता था, जबकि बीते 5 साल में यह बढ़कर 60% तक जा पहुंच गया है। पहले कपड़े की कतरन का वेस्ट जमा होता था, लेकिन अब पहनने के बाद वेस्ट जमा होता है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार पहले सस्टेनेबल और लॉन्ग टर्म फैशन का दौर था, जबकि अब फास्ट फैशन का। फैशन इंडस्ट्री की इकोनॉमी में अब 25% हिस्सा फास्ट फैशन का है। हर साल देश में 25% फैशन स्टोर बढ़ रहे हैं।
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% कार्बन उत्सर्जन अब कपड़ा बनाने से होता है
नंबर पर कपड़े का प्रदूषण, दुनिया में तेल खनन के बाद
सेकंड में अब दुनिया में 1 ट्रक कपड़ा कचरा डिपो में
कॉटन शर्ट बनाने में 2700 लीटर पानी बहाया जाता है
5वें नंबर पर वस्त्र निर्माण उद्योग कुल पानी की बर्बादी में
7500 लीटर पानी एक जींस बनाने में लगता है
}फ्रांस में वेस्ट नियंत्रण के लिए पहल; फ्रांस दुनिया में अकेला देश है जहां इस पर नियंत्रण लाने के लिए कपड़ों पर डिटेल होती है। इसमें हर प्रॉडक्ट पर लिखा होता है कि कपड़ा किससे बना है, कौनसा केमिकल इस्तेमाल किया गया है। इसे कब तक यूज कर सकते हैं। हर प्रॉडक्ट पर 1 यूरो यानी 100 रुपए टैक्स लगता है।
}क्या कहते हैं पर्यावरण विशेषज्ञ; पर्यावरण विशेषज्ञ डॉ. विवेक एस. अग्रवाल ने बताया कि फास्ट फैशन पर रोक नहीं लगी तो यह पूरी दुनिया के लिए घातक होगा। इसके निर्माण पर तेजी से नियंत्रण होना चाहिए ताकि इसके जहरीले रसायन प्रदूषण का कारक न बन सकें। कपड़ों के बढ़ते वेस्ट से जल-थल और वायु तीनों ही प्रदूषित हो रहे हैं।
}कलरफुल कपड़ों से पसीने के साथ केमिकल पहुंचा रहा नुकसान; एसएमएस कॉलेज के सी. प्रोफेसर चर्म और रति रोग विशेषज्ञ डॉ. पुनीत भार्गव ने बताया कि फास्ट फैशन का बढ़ता चलन वाकई हेल्थ के लिए नुकसान पहुंचाने वाला है। एक रिसर्च में यह बात सामने आई थी कि जब केमिकल पसीने के साथ बॉडी के कॉन्टैक्ट में आता है तो एग्जिमा हो जाते हैं।
स्कूलों, मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म के जरिए उपभोक्ताओं को फास्ट फैशन के नुकसान बताना जरूरी है। साथ ही सरकार को फास्ट फैशन कंपनियों पर नियामक नियंत्रण लागू करना चाहिए।
ब्रांड्स को ईको-फ्रेंडली फैब्रिक कम पानी और ऊर्जा उपयोग करने वाली तकनीकों और फेयर वेजेज देने की दिशा में काम करना होगा।
‘कम खरीदो लेकिन बेहतर खरीदो’ की आदत डालनी होगी। कपड़ों को लंबे समय तक पहनना और रिपेयर कराने से फास्ट फैशन की मांग घटेगी।
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यूनाइटेड नेशन एन्वायरमेंट प्रोग्राम-25 की रिपोर्ट, देश में हर साल कपड़े से नौ करोड़ टन वेस्ट, रिसाइकिल 2%
समझें… कैसे कम होगा फास्ट फैशन का प्रभाव
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