खैरथल में स्वरांचल संगीत आश्रम, अलवर के तत्वावधान में श्री शीतलदास वैदिक शिक्षण संस्थान, रैनागिरी में दो दिवसीय निःशुल्क संगीत कार्यशाला “नाद-परिचय” का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में करीब 15 बच्चों ने भाग लेकर भारतीय शास्त्रीय संगीत की मूलभूत शिक्ष
कार्यशाला का शुभारंभ वैदिक परंपरा के अनुरूप बच्चों द्वारा स्वस्तिवाचन के साथ हुआ। संगीत आश्रम के व्यवस्थापक कुमार अनिल ने बताया कि कार्यशाला को तीन सत्रों में पूर्ण किया गया। प्रत्येक सत्र में बच्चों को भारतीय शास्त्रीय संगीत के आधारभूत तथ्यों, स्वरों की उत्पत्ति और राग-रागिनियों के महत्व से अवगत कराया गया।
संगीत आचार्य पं. कमल कांत शर्मा ने अपने वक्तव्य में प्रकृति से उत्पन्न संगीत और भारतीय शास्त्रीय संगीत की यात्रा पर प्रकाश डालते हुए बच्चों को रोचक उदाहरणों के माध्यम से समझाया। उन्होंने बताया कि संगीत जीवन का अनिवार्य अंग है, जो न केवल आत्मिक शांति देता है बल्कि जीवन की दिशा भी तय करता है।

कार्यशाला का शुभारंभ वैदिक परंपरा के अनुरूप बच्चों द्वारा स्वस्तिवाचन के साथ हुआ।
दो दिवसीय कार्यशाला के दौरान बच्चों ने सीखी हुई विधाओं का प्रदर्शन किया। उन्होंने श्री हनुमान चालीसा, श्रीरामचरितमानस की चौपाइयां, शिवतांडव स्तोत्र और महिषासुर मर्दिनी स्तोत्रम को शास्त्रीय संगीत की लय और धुन में जोड़कर प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुतियों ने कार्यशाला में मौजूद सभी अभिभावकों और ग्रामीणों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

कार्यशाला के समापन पर आचार्य स्वामी बालकदेवाचार्य महाराज ने सहभागिता प्रमाण पत्र दिए ।
कार्यशाला के समापन पर सभी प्रतिभागियों को सहभागिता प्रमाणपत्र वितरित किए गए। इस मौके पर गुरुकुल की बेनामी पीठ के गद्दीनशीन आचार्य श्रीमद् जगतगुरु स्वामी बालकदेवाचार्य महाराज ने स्वरांचल संगीत परिवार की इस पहल को सराहते हुए कहा कि वैदिक गुरुकुलों में इस तरह की कार्यशालाएं नियमित रूप से होती रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि संगीत से बच्चों की कर्मकांडीय शिक्षा और पांडित्य कर्म दोनों को नई दिशा मिल सकती है और उनमें संस्कारों के साथ-साथ रचनात्मकता भी विकसित होगी।
वेद प्राचार्य विष्णु जैमन ने बच्चों को आशीर्वाद देते हुए प्रसाद वितरित किया। कार्यशाला का समापन बच्चों द्वारा सामूहिक रूप से श्री हनुमान चालीसा के वाचन के साथ हुआ। इस अवसर पर उपस्थित अभिभावकों और ग्रामीणों ने आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे प्रयास बच्चों के व्यक्तित्व और आत्मविश्वास को नई उड़ान देते हैं।
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