यह दर्द है झुंझुनूं के रहने वाले राजीव कुमार (40) के दिव्यांग पिता जगदीश का। नम आंखों से उन्होंने कहा कि बेटा राजीव पहले फौज में रहा चुका है। फिर टीचर भर्ती और यहां तक कि राजस्थान एलायड सर्विसेज में भी सफलता पाई। लेकिन उसका सपना सब इंस्पेक्टर (SI) बनकर न्याय व्यवस्था से जुड़ना था। इसी चाह में उसने बाकी नौकरियां छोड़ दीं। बेटा शादीशुदा है। उसकी पत्नी गृहिणी है। 2 छोटे बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं।
वहीं संदीप के पिता रामकुमार का कहना है- बेटे को अकेले में रोते देखा है, उसे कैसे दिलासा दें।
दरअसल, ऐसे सैकड़ों परिवार है, जिनके बच्चों ने कड़ी मेहनत करके SI भर्ती-2021 दी। पास हुए और नौकरी हासिल की। लेकिन अब कोर्ट के फैसले के बाद सभी की आंखें नम हैं। पढ़िए पूरी रिपोर्ट…

एसआई भर्ती-2021 में चयनित हुए राजीव कुमार के दिव्यांग पिता जगदीश का कहना है कि फैसले के बाद सब दुखी हैं।
पहले पढ़िए हाईकोर्ट का आदेश… राजस्थान हाईकोर्ट ने 28 अगस्त को एसआई भर्ती-2021 रद्द कर दी थी। 859 पदों के लिए एग्जाम हुआ था। पेपर लीक में कई ट्रेनी एसआई पकड़े गए थे। जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने फैसला सुनाते हुए 202 पेज के आदेश में कहा था- इस भर्ती का पेपर पूरे प्रदेश में फैला।
पेपर लीक में आरपीएससी के 6 सदस्यों की भूमिका थी। ब्लूटूथ गैंग के पास भी भर्ती का पेपर पहुंचा। इन हालात में इस भर्ती को जारी नहीं रखा जा सकता है। कोर्ट ने निर्देश दिए कि साल 2025 की भर्ती में इस भर्ती के पद भी जोड़े जाएं। वहीं एसआई भर्ती 2021 के सभी अभ्यर्थियों को इसमें फिर शामिल किया जाए।

एसआई भर्ती-2021 के रद्द होने पर चयनित अभ्यर्थियों के परिजन झुंझुनूं में शहीद स्मारक पर भी प्रदर्शन कर चुके हैं।
अब पढ़िए… नौकरी मिलने के बाद उसके छिन जाने का दर्द
भाई ने फूड इंस्पेक्टर की नौकरी छोड़ी, अब घर के रहे न घाट के झुंझुनूं के सचिन धाभाई (28) का परिवार भी गम में डूबा है। सचिन के भाई हेमंत बताते हैं- सचिन जयपुर में 2015 से तैयारी कर रहा था। रोज 8-10 घंटे पढ़ाई, ऊपर से घर के कामों में हाथ बंटाता। पिता खेती करते हैं। मां गृहिणी हैं।
सचिन पहले एलायड सर्विसेज में फूड इंस्पेक्टर था, लेकिन खाकी की चाह में उसने वह नौकरी छोड़ दी। अब सब खत्म हो गया। वो भी गई और यह भी। हमारे भाई ने ईमानदारी से पढ़ाई की थी। फिर भी उसे इस हालात का सामना करना पड़ रहा है।
हेमंत कहते हैं- सपने देखने से डर लग रहा है। हमने भाई को टूटते देखा है। अब परिवार में किसी के पास हिम्मत नहीं बची।

खाकी के लिए VDO की नौकरी छोड़ी जिले की स्नेहा के पिता शीशराम भेड़ा का कहना है- बेटी स्नेहा शुरू से मेधावी रही है। 12वीं से लेकर एमएससी तक कॉलेज टॉपर रही। 2018 से लगातार तैयारी की। 8 महीने VDO की नौकरी भी की, लेकिन एसआई बनने का सपना इतना बड़ा था कि नौकरी छोड़ दी।
पिता शीशराम बीएसएफ से रिटायर्ड हैं और हाल ही में किडनी ट्रांसप्लांट करवाया है। मां सरकारी टीचर हैं। शीशराम कहते हैं कि बेटी ने दिन-रात मेहनत की। हम बीमार थे, फिर भी उसे पढ़ाया। अब जब सफलता मिली तो कोर्ट का आदेश सब छीनकर ले गया। बेटी का मनोबल टूट गया है। उसने कहा पापा अब किस मुंह से गांव वालों का सामना करूंगी? सपने पूरे होने से पहले ही चकनाचूर हो गए।
बेटी को कर्ज लेकर पढ़ाया, अब तो रोजी-रोटी भी छिन गई अनु यादव के पिता बलबीर सिंह (पूर्व आमी मैन) बताते हैं- बेटी ने 5 साल जयपुर में रहकर तैयारी की। घर चलाने के लिए हमने कर्ज लिया। पत्नी ने गहने गिरवी रखे। लेकिन, बेटी ने हार नहीं मानी और आखिरकार एसआई में सफलता पाई। उस दिन हमें लगा कि हमारे त्याग रंग लाए।
लेकिन, अब हाईकोर्ट का आदेश सुनकर पूरा परिवार सदमे में है। दो दिन से घर में खाना तक नहीं बना। मेरी बेटी ने कोई गड़बड़ी नहीं की, फिर उसको सजा क्यों मिल रही है? कोर्ट के फैसले के बाद हम बर्बाद हो गए। हमारी रोजी-रोटी तक छिन गई।

मजदूरी कर 10 साल तैयारी की, सब खत्म हो गया टमकोर निवासी संदीप के पिता रामकुमार ने बताया कि बेटे ने 10 साल तैयारी की। घर चलाने के लिए मजदूरी करता था। खेतों में हमारा हाथ बंटाता था और रोज 8-10 घंटे पढ़ाई करता था। 2016 की भर्ती में इंटरव्यू तक पहुंचा, लेकिन सफलता नहीं मिली। इस बार आखिरकार एसआई में चयन हो गया तो घर में खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
पिता रामकुमार बताते हैं- बेटा सिलेक्शन के बाद जब घर आया था तो आंखों में चमक थी। फैसला आने के बाद सब हताश और दुखी हैं। हमारी हालत भी ऐसी हो गई कि अब न खेतों में काम करने का मन है और न घर में चैन है। बेटे ने 10 साल की मेहनत को मिट्टी में मिलते देखा।

परिजनों ने पूछा- हमारे बच्चों के 4 साल कौन लौटाएगा एसआई भर्ती-2021 के रद्द होने के बाद कई घरों में माहौल गमगीन है। परिवार वालों का कहना है कि फैसला आने के बाद घरों में चूल्हे तक नहीं जले। खाना खाना भूल गए हैं। सपने और परिवार की मेहनत सब धुंधली हो गई है। बुजुर्ग माता-पिता इलाज के इंतजार में हैं। बहनों की शादी तक टल गई हैं।
परिजनों का कहना है कि हमारे बच्चों का कसूर क्या था? अगर हमारे बच्चों ने मेहनत से एग्जाम पास किया तो उन्हें क्यों हटाया जा रहा है। जबकि फैसले के बाद हमारे बच्चों के वो चार साल कौन लौटाएगा?


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