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प्रदेश के स्कूलों के जर्जर भवन ठीक करने, नए भवन, टायलेट आदि बनाने पर पिछले 5 साल में मुख्यमंत्री या वित्त मंत्री ने विधानसभा में बजट के दिन 1675 करोड़ रुपए की घोषणा की। सरकार ने पैसे जारी भी किए। इस राशि में 19,142 स्कूलों की रिपेयरिंग हो जाती। प्रश्

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5 साल में जारी राशि से 19,142 स्कूल ठीक हो जाते

2021-22: 3500 से अधिक क्लासरूम, लैब, लाइब्रेरी कंप्यूटर रूम के लिए, 15 नए भवन और 70 स्कूलों के मरम्मत कार्य के लिए 450 करोड़। 2022-23: 3800 से अधिक क्लासरूम, लैब, लाइब्रेरी, कंप्यूटर रूम के निर्माण, 20 नए स्कूल भवन, 100 स्कूलों में मरम्मत के लिए 200 करोड़ रुपए। 2023-24: क्लासरूम, लैब, कंप्यूटर रूम, जर्जर भवन रिपेयर, शौचालय के लिए 200 करोड़ रुपए। 2024-25: क्लास, लैब, टायलेट निर्माण पर 350 करोड़, 750 स्कूलों की मरम्मत के लिए 100 करोड़। 2025-26: 175 भवन विहीन व जर्जर स्कूलों के नवीन भवन के लिए 200 करोड़, 2 हजार स्कूलों की मरम्मत के लिए 175 करोड़। कुल 1675 करोड़

15 साल की बजट राशि से 52 हजार स्कूल तैयार हो जाते यदि 15 साल का सरकार का बजट देखें तो 5 हजार करोड़ रुपए से अधिक स्कूलों के भवन निर्माण और जर्जर भवन मरम्मत के लिए घोषणाएं की जा चुकी हैं। इतनी राशि में 52 हजार से अधिक स्कूलों की मरम्मत व नए भवन बन जाते। लेकिन, हर साल 1000 से 1200 जर्जर भवनों की शिकायतें आती है। जयपुर जिले के ही करीब 16 स्कूलों के भवन जर्जर बताए जा रहे हैं। दूर दराज के इलाकों में तो यह संख्या सैकड़ों में है।

झालावाड़ में स्कूल भवन हादसे में 7 बच्चों की जान चली गई। शनिवार को भी नागौर के खारियावास में स्कूल की छत की पट्‌टियां टूट गईं, गनीमत रही कि बच्चे नहीं थे। प्रदेश में करीब 2256 स्कूलों के हालात ऐसे ही हैं। सरकार को तत्काल प्रभाव से इनको मरम्मत होने तक बंद कर देना चाहिए। नुकसान न हो, इसके लिए पंचायत भवन, धर्मशाला, सामुदायिक भवन या फिर नजदीकी स्कूल में पढ़ाई जारी रखी जा सकती है। यही नहीं, शिक्षा मंत्री मदन दिलावर सहित प्रभारी मंत्रियों, सांसद, विधायक, प्रभारी सचिव एवं कलेक्टरों को तत्काल प्रभाव से दौरे करने चाहिए। सरकार को तत्काल प्रभाव से दो हजार स्कूलों की मरम्मत के लिए बजट में किए गए प्रावधान की स्वीकृतियां जारी कर देना चाहिए।

बड़ा प्रश्न: स्कूल-अस्पतालों में स्थाई इंजीनियर क्यों नहीं लगाए जाते? स्कूल एवं अस्पतालों के लिए भी अलग से इंजीनियरिंग की विंग होनी चाहिए। ऐसी व्यवस्था नहीं होने के कारण भवनों की स्थिति का पता ही नहीं चल पाता। अभी जिन विभागों के इंजीनियर लगाए जाते हैं, वे एक बार निर्माण के बाद कभी बिल्डिंग देखने तक नहीं आते। वे अपने ट्रांसफर, पोस्टिंग में ही उलझे रहते हैं।

मंत्री, सचिव हरेक जिले का दौरा कर देखें हालात प्रदेश के 41 जिलों में प्रभारी मंत्रियों, 41 प्रभारी सचिव और 41 कलेक्टरों को एक-एक गांव का दौरा कर स्कूलों के हालात देखना चाहिए। विधायक, जिला प्रमुख एवं प्रधान भी एक अभियान चलाकर निरीक्षण करेंगे तो वास्तविक स्थिति सामने होंगी।

14वीं विधानसभा जैसा निर्णय हो, विधायकों से निरीक्षण कराएं 14वीं विधानसभा में सभी सदस्यों ने एक स्वर में अध्यक्ष और सरकार को अतिवृष्टि की स्थिति बताई थी। फिर एक राय बनी। सदन में दो दिन अवकाश रखा गया और सभी विधायकों ने अतिवृष्टि वाले क्षेत्रों का दौरा कर नुकसान का आंकलन किया। सदन में चर्चा की। सरकार या विधानसभा अध्यक्ष चाहें तो फिर ऐसा कर सकते हैं।

जनप्रतिधि चाहें तो…

  • 200 विधायक, 25 लोकसभा, 10 राज्यसभा सांसद हैं।
  • क्षेत्र में स्थानीय कार्य के लिए 5 करोड़ सालाना मिलते हैं। यानी 1175 करोड़ रुपए।
  • सांसद-विधायक इसमें से कुछ हिस्सा स्कूलों पर खर्च करें तो स्थिति बदल जाएगी।



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