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जोधपुर के विशेष अपर मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (पीसीपीएनडीटी एक्ट), जोधपुर महानगर ने दहेज प्रताड़ना और स्त्रीधन हड़पने के 10 साल पुराने मामले में आरोपी पति भूपेंद्र (निवासी- पंचेटिया, पाली; वर्तमान- विजय नगर, कलेवाड़ी, पुणे) को संदेह का लाभ देते हुए दोषम
दरअसल, परिवादिया मंजू का विवाह पहले कुलदीप के साथ हुआ था, लेकिन दोनों का वर्ष 2008 में तलाक हो गया। इसके बाद मंजू के पिता ने भूपेन्द्र (भी तलाकशुदा) से बेटी का विवाह 12 दिसंबर 2010 को नाता-प्रथा के आधार पर कराया। शादी के दौरान परिवार ने नकद, गहने, घरेलू सामान आदि भूपेन्द्र को दिए। शादी के बाद मंजू पुणे ससुराल चली गई। कुछ महीने ठीक रहने के बाद मंजू ने आरोप लगाए कि पति व सास-ससुर ने दहेज की अतिरिक्त मांग की और मानसिक व शारीरिक प्रताड़ना दी। आरोप है कि लगातार दहेज की मांग पूरी न होने पर मारपीट भी हुई। जून 2014 में भूपेन्द्र ने मंजू को इलाज के लिए जोधपुर छोड़ दिया और सामान वापसी से इनकार किया गया।
जोधपुर के महिला थाना पश्चिम में दहेज प्रताड़ना केस
मंजू ने जनवरी 2015 में महिला थाना पश्चिम, जोधपुर में भूपेंद्र व अन्य के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का केस दर्ज कराया। जांच व ट्रायल के दौरान अभियोजन पक्ष ने मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत किए, लेकिन अधिकांश आरोपों व दावे स्वतंत्र गवाहों या डॉक्टर/मेडिकल प्रमाण, बिलों एवं स्पष्ट जब्ती के अभाव में पुष्ट नहीं हो सके। खुद पीड़िता ने चार साल ससुराल में रहते हुए पुलिस में रिपोर्ट या मेडिकल नहीं कराया, न ही दिए सामान के पक्के बिल पेश किए। गवाहों की अधिकतर बातें भी सुनी-सुनाई या संदेहास्पद पाई गई।
परिवादिया व भाई के बयानों में ही विरोधाभास
विशेष मजिस्ट्रेट लोचन खिड़िया देवल ने पाया कि अभियोजन पक्ष लगाए गए आरोपों को “संशय से परे” प्रमाणित नहीं कर सका और प्रमुख साक्ष्य गवाह-परिवादिया मंजू और उसके भाई राजेंद्र कुमार के बयानों में कई विरोधाभास मिले। कोर्ट में यह सामने आया कि:
- अभियोजन के गवाहों (मंजू, उसके भाई व महिला थाना अधिकारी) के बयान में बड़े विरोधाभास थे। सीधे मारपीट या दहेज मांग की घटना का कोई स्वतंत्र या प्रत्यक्ष गवाह नहीं था।
- मंजू ने खुद स्वीकार किया कि ससुराल में चार साल तक रही, मगर कभी पुलिस रिपोर्ट या मेडिकल नहीं कराया।
- पीहर या अन्य कोई स्वतंत्र गवाह मुकदमे के दावे (पाँच लाख रुपये की मांग, मारपीट) का समर्थन नहीं कर सका।
- दिए गए दहेज या स्त्रीधन का कोई पक्का बिल, फोटोग्राफ, या मेडिकल दस्तावेज नहीं पेश किए गए।
- अधिकांश शिकायतें व मुकदमा पति द्वारा तलाक का मुकदमा दायर किए जाने के बाद ही दायर हुए।
- जाँच अधिकारी ने यह भी माना कि नाता-प्रथा में दहेज देने का चलन नहीं होता।
दोनों पक्षों ने खुद स्वीकार किया कि पहले भी तलाक व दहेज केस हो चुके हैं, लेकिन वर्तमान मामले में पीड़िता के आरोप संदेहजनक थे। इन्हीं तथ्यों के आधार पर कोर्ट ने संदेह का लाभ देते हुए भूपेंद्र को दोनों धाराओं में दोषमुक्त कर दिया।
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