पाली की एक मिठाई शॉप में सजी घेवर की मिठाई।
रक्षाबंधन को लेकर पाली शहर का बाजार तरह-तरह की मिठाइयों से सजा हुआ। वैसे तो पालीवासियों की मिठाई में सदाबहार पसंद यहां का फेमस गुलाब हलुआ है। लेकिन पाली की एक खास मिठाई ऐसी भी है जो रक्षा बंधन पर हलुआ से भी काफी ज्यादा बिकती है। उस मिठाई की नाम है घे

पाली में एक मिठाई शॉप पर मिठाई खरीदने के लिए लगी भीड़।
घेवर जो खासतौर सावन के मौसम में खाया जाता है। पाली में यह हरियाली तीज से पहले बनना शुरू हो जाता है। यूं तो पूरे प्रदेश के कई शहरों में घेवर बनता है लेकिन पाली में बनने वाले घेवर की बात ही कुछ अलग है। यहां से घेवर इस सीजन में देश भर में एक्सपोर्ट होता है। राखी के सीजन में पाली जिले में 90 से एक करोड़ रुपए का घेवर बिक जाते हैं। घेवर के बिना तीज और रक्षाबंधन का त्योहार अधूरा माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि महिलाएं इन त्योहारों पर इस मिठाई को अपने मायके लेकर जाती हैं। घेवर को राजस्थान की प्रमुख पारंपरिक मिठाई माना जाता है।

पाली में एक मिठाई शॉप के गोदाम में तैयार किए जा रहे घेवर।
हरियाली तीज से पहले बनना शुरू हो जाता है घेवर पाली में बनने वाले घेवर की बात करें तो शुद्ध देसी घी में बनने वाली यह मिठाई खास तौर पर हरियाली तीज से पहले पाली में हलवाई बनाना शुरू कर देते है। पाली जिले में कई मिठाई विक्रेता इस मिठाई को बनाते हैं। पाली शहर में बर के घेवर काफी फेमस हैं। पाली में यह किलो के भाव से नहीं पर पीस के हिसाब से मिलते हैं। पाली में सादा घेवर के भाव 350 से 500 रुपए तक है और रबड़ी वाला घेवर 450-500 रुपए के भाव है।

पाली में एक मिठाई शॉप पर तैयार किए जा रहे घेवर।
15-20 मिनट में बनते हैं 4 घेवर हलवाई धर्माराम गुर्जर ने बताया कि घी, बेसन, मैदा, दूध को मिलाकर घोल बनाया जाता है। उसे एक मात्रा में गाढ़ा किया जाता है। उसके बाद भट्टी पर देसी घी से भरी कढ़ाई में घेवर बनाने के 4 संचे रखे जाते है। एक निश्चित आंच पर घी को गर्म किया जाता है। उसके बाद उन चारों सांचों में थोड़ा-थोड़ा करके घोल डाला जाता है। बाद में पूरा घेवर बनने के बाद उसे देसी घी से निकाला जाता है। बाद में इस पर बादाम, पिस्ता, केसर लगाई जाती है और रबड़ी के घेवर की डिमांड पर उस पर रबड़ी लगाकर ग्राहकों को दिया जाता है।
10 से 15 दिन तक खराब नहीं होता पाली का घेवर मिठाई विक्रेता राजकुमार मेड़तिया ने बताया कि पाली में राखी के त्योहार पर ज्यादातर घेवर, मालपुआ और बेसन की चक्की बिकती है। इसमें ज्यादातर घेवर बिकते हैं। हरियाली अमावस्या के पहले से घेवर बनाना शुरू कर देते हैं। सादे घेवर पाली से देश भर में एक्सपोर्ट होते है।

पाली में एक मिठाई शॉप पर तैयार किए जा रहे घेवर।
गाय के दूध से बनाते है रबड़ी मिठाई विक्रेता भवानी सिंह राजपुरोहित बताते है कि रक्षा बंधन पर ज्यादातर लोग रबड़ी के घेवर खरीदना पंसद करते है। बाहर भेजने के लिए सादे घेवर जिस पर ड्राई फ्रूट लगा होता है वह खरीदना पसंद करते है। गाय के दूध से रबड़ी बनाकर घेवर पर लगाते है। यह घेवर करीब 10 से 15 दिन तक खराब नहीं होता।

मिठाई विक्रेता राजकुमार मेड़तिया, भवानी सिंह राजपुरोहित और खरीदार दिनल सोनी।
भाई-भाभी को पंसद है पाली का घेवर
दिनल सोनी ने बताया कि रक्षा बंधन को लेकर उसने अपने भाई-भाभी के लिए राखियों के साथ मिठाई के रूप में पाली के स्पेशल घेवर खरीदे है। यह मिठाई उन्हें बहुत पंसद है इसलिए रक्षाबंधन पर घेवर खरीदना ही पसंद करती हूं।
इम्यूनिटी बूस्टर है घेवर राजस्थान के कुछ मिठाई वाले इसे ईरान की एक मिठाई से प्रेरित व्यंजन बताते हैं। इम्यूनिटी बूस्टर कही जाने वाली यह मिठाई देखने में बिल्कुल मधुमक्खी के छत्ते जैसी नजर आती है। यही वजह है कि इसे इंग्लिश में हनी कॉम्ब डेजर्ट के नाम से जाना जाता है। इम्यूनिटी बढ़ाने में कारगर यह मिठाई खासतौर पर सावन में इसलिए खाई जाती है, ताकि यह शरीर को रोगों से लड़ने की ताकत देता है।
मानसून में क्यों खाया जाता है घेवर घी से बनने वाली यह डिश खासतौर पर मानसून में खाई जाती है। इसके पीछे बेहद खास वजह है। दरअसल, बरसात के मौसम में अक्सर वात और पित्त की शिकायत हो जाती है। साथ ही इस मौसम में शरीर मे सूखापन या एसिडिटी हो जाती है, जिससे थकान और बेचैनी होने लगती है। ऐसे में घी से बनी यह मिठाई शरीर में फैट संतुलित कर शरीर की ड्राइनेस को कम करती है।
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