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झालावाड़ स्कूल हादसे पर हाईकोर्ट ने प्रसंज्ञान लेते हुए केंद्र और राज्य सरकार से 14 बिंदुओं पर रिपोर्ट मांगी है। जस्टिस अनूप ढंड की कोर्ट ने इसे ‘दिल झकझोर देने वाली घटना’ बताया।

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कोर्ट ने राज्य सरकार पर टिप्पणी करते हुए कहा- सरकार अपने कुल बजट का 6 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करती है। उसके बाद भी सरकार लगातार बुनियादी ढांचे के विकास में पिछड़ रही है।

कोर्ट ने कहा- एक सर्वे कहता है कि राजस्थान सहित 12 राज्यों में संचालित 22 प्रतिशत स्कूलों की बिल्डिंग जीर्ण-शीर्ण हालात में हैं। 31 प्रतिशत स्कूलों की बिल्डिंग में दरारें चल रही हैं।

कोर्ट ने कहा- राजस्थान के 32 प्रतिशत स्कूलों में बिजली नहीं हैं। 9 प्रतिशत स्कूलों में पीने के पानी की सुविधा नहीं है। 9 प्रतिशत स्कूलों में बॉयज टॉयलेट नहीं है।

हर जिले में ऑनलाइन पोर्टल शुरू किया जाए कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए कहा- सरकार प्रदेश के सभी शैक्षणिक संस्थाओं का व्यापक सर्वे करवाकर पता करें कि इनके भवन जर्जर न हो। जिला स्तर पर ऑनलाइन पोर्टल और वेबसाइट विकसित की जाए, जिसमें पेरेंट्स और स्टूडेंट किसी भी सरकारी अथवा निजी स्कूल की जर्जर इमारत के फोटो-वीडियो अपलोड करके शिकायत कर सकें।

इन शिकायतों के निवारण के लिए निवारण तंत्र फोरम विकसित किया जाए। स्कूल में घटिया निर्माण कराने वालों की जिम्मेदारी तय की जाए। इस तरह की घटना होने पर उनसे निर्माण लागत वसूल की जाए। उनके खिलाफ विभागीय और क्रिमिनल एक्शन लिया जाए।

निजी स्कूलों में भी बुनियादी ढांचे की कमी अदालत ने कहा कि समस्या केवल सरकारी स्कूलों तक ही सीमित नहीं है। निजी स्कूलों में भी जरूरी बुनियादी ढांचे की कमी है। प्रदेश में चालीस हजार स्कूलों पर दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए सुगम सुविधाएं नहीं होने के लिए जुर्माना लगाया गया है। वहीं आधे स्कूल जरूरी शारीरिक शिक्षा प्रदान नहीं करते।

अदालत ने कहा कि पिछली राज्य सरकार ने 3737 हिंदी माध्यम स्कूलों को अंग्रेजी मीडियम में बदला, ताकि अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा दिया जा सकते। हालांकि इसके पांच साल बाद यह महत्वाकांक्षी पहल खराब बुनियादी ढांचे, प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी और विद्यार्थियों की रुचि में कमी के कारण असफलता का सामना कर रही है।

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