प्रदेश में डिजिटल अरेस्ट साइबर अपराध का नया रूप बन गया है। बोते डेढ़ साल में 300 से अधिक मामले सामने आए हैं, जिनमें 50 से 73 वर्ष आयु वर्ग के बुजुर्गों से 50 करोड़ रुपए से ज्यादा की ठगी हुई। विशेषकर सेवानिवृत्त कर्मचारियों को ठगों ने निशाना बनाया।
जांच में सामने आया कि ढंग पहले बैंक खातों में सेंध लगाकर यह पता कर लेते हैं कि पीड़ित के खाते में कितनी रकम जमा है। जिन खातों में ज्यादा रकम होती है, उन्हीं बुजुर्गों को टारगेट किया जाता है।
संदिग्ध कॉल आते ही 1930 पर कॉल करें
- साइबर एक्कापटूर्स का कहना है कि जागरुकता सबसे बड़ा बचाव है।
- एजेंसी फोन पर डिजिटान अरेस्ट नहीं कर सकती। पुलिस/सीबीआई जैसी एजेंसियां लिखित नोटिस या आधिकारिक पत्र से ही संपर्क करती हैं।
- संदिग्ध कॉल आए तो तुरंत 1930 पर साइबर हल्पलाइन या cybercrime.gov.in पर शिकायत करें। किसी भी अनजान कॉल पर बैंक डिटेल, आधार, पैन, ओटीपी साझा न करें।
- मोबाइल में किसी भी तरह का स्क्रीन शेयरिंग एप पेनी डेस्क, टीग बीबर को डावनलोड न करें

बजाज नगर के व्यापारी को फर्जी पासपोर्ट, झोटवाड़ा के बुजुर्ग को सीबीआई का डर दिखाया
केस ।: जयपुर के बजाज नगर निवासी 67 वर्षीय व्यापारी से हेरोइन और फर्जी पासपोर्ट के बहाने 50 लाख रुपए 9 राज्यों में ट्रांसफर करवा लिए।
केस 2: मानसरोवर निवासी 75 वर्षीय बुजुर्ग से मनी लॉन्डिंग का डर दिखाकर 23 लाख रुपए की ठगी।
केस 3: झोटवाड़ा निवासी 70 वर्षीय बुजुर्ग से एनआईए-सीबीआई का डर दिखाकर 56 लाख रुपए विभिन्न खातों में ट्रांसफर करवा लिए।
क्यों मुश्किल है कार्रवाई?
साइबर सेल अधिकारियों के अनुधार ठग बीओआईपी और वीपीएन तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। इंटरनेट कॉलिंग से प्रास्तविक प्लकेशन ट्रेस नहीं होती। वीपीएन से उग लोकेशन डिया लेते हैं।
क्रिप्टोकरेंसी लेन-देन पैसा ट्रैक करना लगभग असंभव हो जाता है। कई गिरोह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय है, जिससे कानूनी कार्रवाई और कठिन हो जाती है।
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