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चित्तौड़गढ़ में सांवलिया जी की 3 प्रतिमाएं स्थापित हैं। मान्यता है कि इसमें से एक दुनिया इकलौती ऐसी प्रतिमा है जिनके सीने पर भृगु ऋषि के पैरों का निशान हैं। ऐसा दावा है कि ऋषि भगवान विष्णु को सोता देख नाराज हो गए थे।

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उन्हें लगा कि वे (विष्णु भगवान) उन्हें देख कर सोने का बहाना कर रहे हैं। ऐसे में उन्होंने गुस्से में भगवान विष्णु के सीने पर पैर रख दिया था।

जब तीन प्रतिमाएं एक ग्वाले को मिली तो इन्हें सांवलिया सेठ के रूप में पूजा जाने लगा। तीनों प्रतिमाएं एक ही स्वरूप की थीं। जो चित्तौड़गढ़ में अलग-अलग स्थानों पर स्थापित की गईं।

इसमें से सबसे प्रसिद्ध मंडफिया के सांवरा सेठ हैं। बागुंड और भादसोड़ा के सांवरा सेठ के दर्शनों के लिए दुनियाभर से भक्त पहुंचते हैं। तीनों मूर्तियों का आकार अलग-अलग है।

भादसोड़ा में रखी प्रतिमा पर मौजूद चरण चिन्ह के दर्शन केवल दिन में 10 मिनट के लिए होते हैं। इसके बाद प्रभु को पोशाक पहना दी जाती है।

कहा जाता है कि विष्णु और भृगु ऋषि के प्रसंग को दर्शाने वाली यह दुनिया की इकलौती मूर्ति है। जलझूलनी एकादशी पर पढ़िए चित्तौड़गढ़ में स्थित इस अनोखी प्रतिमा की कहानी…

पहले देखिए- भगवान सांवलिया सेठ के 3 स्वरूप

चित्तौड़गढ़ की इन प्रतिमाओं से जुड़ी मान्यता

सांवलिया प्रबंध कार्यकारिणी समिति के अध्यक्ष गोपाल सिंह तंवर बताते हैं- चित्तौड़गढ़ के बागुंड में करीब 250 से 300 साल पहले जंगल हुआ करता था।

एक दिन मंडफिया में रहने वाला ग्वाला भोलीराम गुर्जर अपने गायों को बागुंड के जंगल में चराने के लिए ले गया था। जंगल में आराम करने के दौरान सपने में भगवान सांवलिया सेठ आए और बोले कि मैं यहां दबा हूं, मुझे बाहर निकालो।

तंवर बताते हैं- उसके बाद उन्होंने आसपास के लोगों को बताया और खुदाई शुरू करवाई। इस खुदाई में 3 मूर्तियां प्रकट हुईं। तीनों मूर्तियां एक जैसी ही थीं।

ग्रामीणों ने नारायण के इस स्वरूप को श्रीकृष्ण के रूप में माना। श्याम वर्ण होने के कारण कृष्ण के इस स्वरूप को सांवलिया सेठ कहा जाने लगा।

ग्राफिक में समझिए मंदिरों का इतिहास

चबूतरे पर होती थी मूर्तियों की पूजा: तंवर बताते हैं- 40 साल तक बागुंड के प्राकट्य स्थल पर ही एक चबूतरे पर तीनों मूर्तियों की पूजा की जाती रही। इसके बाद फिर भादसोड़ा के ग्रामीण एक मूर्ति को अपने गांव ले आए और एक केलुपोश मकान में स्थापित कर दिया। वहीं, एक मूर्ति मंडफिया लाई गई थी। तंवर बताते हैं- इन्हीं मूर्तियों में से एक मूर्ति के सीने पर पैर का निशान था। मान्यता है कि यह भृगु ऋषि के पैर हैं।

तस्वीर भादसोड़ा सांवलिया जी की है। यह एकमात्र ऐसी प्रतिमा है जिनके पैरों के दर्शन संभव हैं।

तस्वीर भादसोड़ा सांवलिया जी की है। यह एकमात्र ऐसी प्रतिमा है जिनके पैरों के दर्शन संभव हैं।

अब पढ़िए- भृगु ऋषि से जुड़ी मान्यता

इस मूर्ति पर जो चरण चिन्ह है, उसके पीछे एक कथा है। कथा के अनुसार, एक बार सभी ऋषियों ने मिलकर एक यज्ञ किया। विचार किया कि इस यज्ञ का फल ब्रह्मा, विष्णु या महेश, इनमें से किसे दिया जाए।

निर्णय के लिए भृगु ऋषि को चुना गया। वे सबसे पहले भगवान विष्णु के पास पहुंचे, जो उस समय निंद्रा में थे और माता लक्ष्मी उनके चरण दबा रही थीं।

भृगु ऋषि को यह लगा कि भगवान विष्णु उन्हें देखकर भी सोने का बहाना कर रहे हैं, इसलिए उन्होंने क्रोधित होकर भगवान विष्णु के सीने पर लात मार दी।

भगवान तुरंत उठे और ऋषि के पैर पकड़ लिए, क्षमा मांगते हुए बोले– मेरा शरीर कठोर है, कहीं आपके कोमल चरणों को चोट तो नहीं आई? भगवान की यह विनम्रता और सहनशीलता देखकर भृगु ऋषि ने उन्हें त्रिदेवों में श्रेष्ठ माना और यज्ञ का फल उन्हें ही समर्पित किया।

चतुर्भुज स्वरूप में विराजित ठाकुर जी की पूजा सांवरा सेठ के रूप में होती है, इसलिए 2 हाथ वस्त्रों के अंदर ढके होते हैं।

चतुर्भुज स्वरूप में विराजित ठाकुर जी की पूजा सांवरा सेठ के रूप में होती है, इसलिए 2 हाथ वस्त्रों के अंदर ढके होते हैं।

सिर्फ 10 मिनट के लिए होते हैं दर्शन

तंवर बताते हैं- इस अनूठी मूर्ति के चरण चिन्ह के दर्शन करना भी अनूठा है। इसके दर्शन केवल भक्तों को 10 मिनट के लिए होते हैं। इसके लिए सुबह 4.50 बजे से 5 बजे तक का समय रखा गया है।

इसके बाद इन चरण चिन्ह को भगवान के वस्त्रों से ढक दिया जाता है। यह विशेषता देश-दुनियाभर में किसी अन्य मूर्ति में नहीं पाई जाती, जिससे यह मूर्ति और भी विशेष बन जाती है।

विवाह की पहली पत्रिका भी पहले ठाकुर जी को अर्पित की जाती है। लोग मानते हैं कि इनका आशीर्वाद लेने के बाद ही कोई भी कार्य सफल होता है। इस बड़ी मूर्ति में ही ठाकुर जी के चरणों के दर्शन संभव हैं। अन्य 2 मूर्तियों में यह सुविधा नहीं है।

मान्यता के अनुसार, भादसोड़ा सांवलिया जी के सीने पर भृगु ऋषि के पैर हैं।

मान्यता के अनुसार, भादसोड़ा सांवलिया जी के सीने पर भृगु ऋषि के पैर हैं।

पूरा भगत के अनुरोध पर हुआ था जीर्णोद्धार

तंवर बताते हैं- इस मंदिर का वर्तमान ढांचा करीब 3000 स्क्वायर फीट क्षेत्र में फैला हुआ है। मंदिर पहले गांव के एक केलूपोश मकान में था, जिसे बाद में भिंडर रियासत के राजा मदन सिंह भिंडर ने जीर्णोद्धार करवाया।

इसके पीछे भी एक रोचक कथा है। राजा मदन सिंह एक बार बेट द्वारका में नाव यात्रा कर रहे थे। यात्रा के दौरान नाव बीच समंदर में फंस गई। नाव में मौजूद लोगों ने पूरा भगत की जय का उद्घोष किया, जिससे नाव डूबने से बच गई।

इस चमत्कार के पीछे का रहस्य जानने पर राजा को पता चला कि पूरा भगत भादसोड़ा गांव के निवासी है। इसके बाद राजा ने पूरा भगत से मुलाकात की और उनकी इच्छा अनुसार मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया।

आज मनाएंगे जलझूलनी एकादशी

आज जलझूलनी एकादशी पर मंदिर में ठाकुर जी के बाल विग्रह को सुबह 11:00 जुलूस के साथ प्राकट्य स्थल लाया जाएगा। यहां प्राकट्य स्थल पर कुंड के जल में झूला झुलाया जाएगा।

फिर उन्हें यहां प्राकट्य स्थल के ठाकुर जी के साथ विराजमान करवाया जाएगा। उनकी यही पर पूजा की जाएगी। फिर तेरस के दिन उन्हें वापस भादसोड़ा गांव ले जाया जाएगा।

वीडियो क्रेडिट: अर्जुन आचार्य, अनिल गाडरी, सहयोगी सुरेश आचार्य।



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