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खेजड़ली शहीदी राष्ट्रीय पर्यावरण संस्थान द्वारा हरे वृक्ष रक्षार्थ 363 शहीदों की स्मृति में 2 सितंबर को भादवा सुदी दशमी के दिन आयोजित होने वाले विश्व के एकमात्र पर्यावरण मेले की तैयारियों को लेकर 24 अगस्त रविवार को सुबह 11 बजे आम सभा का आयोजन किया जा
बलिदान की गाथा-“सिर सांठे रुंख रहे तो भी सस्तो जाण”
प्रवक्ता लोल ने बताया कि सैकड़ों वर्ष पूर्व राजशाही शासन में खेजड़ी के पेड़ों की कटाई की तैयारी की जाने लगी थी। इसकी सूचना खेजड़ली, फिटकासनी, गुड़ा बिश्नोईयान के आसपास 84 खेड़ा बिश्नोई समाज के लोगों को लगी। यह सुनकर बिश्नोई समाज एकत्रित हुआ और मां अमृतादेवी बिश्नोई के नेतृत्व में महाराजा की फौज का सामना करने की तैयारी करके खेजड़ी के पेड़ों की कटाई नहीं करने की घोषणा कर दी।
मां अमृतादेवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 लोगों ने “सिर सांठे रुंख रहे तो भी सस्तो जाण” का नारा देकर पेड़ों से चिपककर अपने प्राण न्यौछावर कर दिए और पेड़ काटने नहीं दिए। इस महान बलिदान ने पर्यावरण संरक्षण के इतिहास में एक अमिट छाप छोड़ी है।
1978 से लगातार आयोजन
इस बलिदान को लोगों में प्रेरणास्रोत के रूप में दर्शित करने के लिए 1978 से बिश्नोई समाज के वरिष्ठ नेता पूर्व मंत्री स्वर्गीय रामसिंह बिश्नोई, पूर्व विधानसभाध्यक्ष पूनमचंद बिश्नोई, जीव रक्षा बिश्नोई सभा के अध्यक्ष स्वर्गीय संतकुमार राहड़, स्वर्गीय भभूतराम बाबल, महीराम धारणीया ने मिलकर लोगों को एकत्रित कर पर्यावरण मेले की शुरुआत की। 1978 से आज तक प्रति वर्ष हरे वृक्ष रक्षार्थ शहीदों की स्मृति में यह मेला भरा जाता है।
आयोजन समिति और धार्मिक नेतृत्व
24 अगस्त रविवार को सुबह 11 बजे खेजड़ली शहीदी स्थल खेजड़ली शहीदी राष्ट्रीय पर्यावरण संस्थान के अध्यक्ष मलखानसिंह बिश्नोई की अध्यक्षता में खेजड़ली धाम महंत अशोकानंद महाराज, श्रीमहंत रुंकली शिवदास महाराज सहित साधू संतों के सानिध्य में बिश्नोई समाज और पर्यावरण प्रेमियों की आम सभा होगी।
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