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मौसमी रोग नियंत्रण के लिए मिश्रण तैयार करते राकेश।

जयपुर के विराटनगर स्थित बिलवाड़ी गांव में 37 साल के राकेश सिंधु (गुर्जर) नर्सरी में पौधे बेचते-बेचते खुद बागवान बन गए। अब आसपास के किसान उनसे बागवानी के गुर सीखने आते हैं। राकेश ने बताया, मेरे पास साढ़े पंद्रह बीघा का खेत है। जमीन रेतीली थी तो 150 ट्रॉ

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इससे जमीन इतनी उपजाऊ हो गई कि दूसरे किसानों से ज्यादा गेहूं व मटर होते हैं। पहली बार बागवानी लगाने पर बकरियों की खाद खेत में डालनी चाहिए। यह पौधों की जड़ें जमाने में सहायक है। बरसात के दिनों में मौसमी में डायबैक रोग लगता है, जिसे दूर करने के लिए खास मिश्रण बनाता हूं। 220 लीटर के मिश्रण के लिए 15-20 किलो नीम की पत्तियां, 5 किलो आकड़े के पत्ते, 30-35 किलो अडूसा, 5-6 किलो धतूरा लेता हूं। मशीन से इनकी कुट्‌टी करके गड्‌ढे में तिरपाल बिछाकर मिश्रण डाल देता हूं। मौसम साफ होने पर छानकर स्प्रे करता या बिना छाने ही जड़ों में डाल देता हूं। इससे फंगस नहीं लगती। जड़ों की बढ़वार अच्छी होती है।

नीला थोथा कॉपर का काम करता है। इसे पीसकर 15-16 लीटर पानी में 40-50 ग्राम पाउडर मिलाकर स्प्रे करता हूं। इससे फंगस नहीं लगती। पौधों में कैल्शियम की कमी पूरी करने के लिए भट्‌टे पर मिलने वाली चूने की कली लाता हूं। इसे पानी में डालकर 3-4 दिन में अच्छी तरह घुलने देता हूं। इसकी गर्मी कम होने पर नीला थोथा मिलाकर जड़ों में डालता हूं। पशुओं की खेली में चूने की कली डालकर पशुओं में भी कैल्शियम की पूर्ति करता हूं।

मिर्च, टमाटर में कैमिकल युक्त दवाओं का साइड इफेक्ट हो जाए या पौधों की पत्तियों पर कैमिकल जमा हो जाए तो चूने की कली वाले इस घोल का स्प्रे करने से कैमिकल का प्रभाव खत्म हो जाता है। बागवानी में सभी तरह के पेड़-पौधों में साल में 2 बार (फरवरी, अक्टूबर-नवंबर में) 5-5 लीटर चूने की कली मिला पानी देता हूं। फरवरी-मार्च में नींबू में केनर्टेड रोग लगने से फल पर दाने उभर आते हैं। इससे क्वालिटी घट जाती है।

इसे दूर करने के लिए धतूरा, नीम ऑयल, नीला थोथा का स्प्रे करता हूं। नींबू में मच्छरों की समस्या दूर करने के लिए नीम की छाल को पीसकर उसे सड़ाने के बाद पानी में मिलाकर स्प्रे करता हूं। बारिश में जून से जुलाई के बीच नींबू के पत्ते नावनुमा या उलटे सिकुड़ जाएं तो उसमें भी यह स्प्रे कारगर साबित होता है। इससे मकड़ी भी नहीं लगती। लेसवा में मकौड़े का रोग दूर करने के लिए नीला थोथा-चूने का मिश्रण बनाकर पेड़ के तनों से नीचे तक पुताई करता हूं। करौंदे में बारिश के दिनों में मच्छरों की बीमारी आने पर भी नीम की पत्तियों से बने मिश्रण का उपयोग करता हूं। आंवले में डायबैक, कैंकर्ड, कीड़ा लगने पर फुटान रुक जाता है। इसे दूर करने में भी नीम की पत्तियों, अडूसा, धतूरे वाला स्प्रे उपयोगी होता है।



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