यह कहना है चीन के ताइवान में अंडर-18 गर्ल्स एशिया रग्बी फुटबॉल खेलकर लौटी सुशीला खोथ का। उन्होंने कहा- मैंने 3 माह तक घरवालों से छुपकर रग्बी फुटबाल खेला। बाड़मेर पहुंचने पर सुशीला का परिवार और गांव के लोगों ने भव्य स्वागत किया।
इस मौके पर सुशीला ने भास्कर से खास बातचीत की। उन्होंने बताया- जब घरवालों को पता चला कि मैं रग्बी फुटबॉल खेलना चाहती हूं तो एक बार तो मना कर दिया। फिर मेरी दादी, मम्मी और स्कूल टीचर ने परिवार को समझाया। इसके बाद उन्होंने मुझे खेलने भेजा। तब से पीछे मुड़कर नहीं देखा। पढ़िए पूरी बातचीत…

एशिया कप खेलने के बाद बाड़मेर पहुंचने पर मां से लिपटकर रोई इंडियन प्लेयर सुशीला खोथ।
सवाल: इंडिया की क्या पोजिशन रही, आपने किस तरीके से टूर्नामेंट खेला? सुशीला: एशिया कप में 11 देशों ने भाग लिया, जिसमें हमारी चौथी पोजिशन रही। हमने बहुत संघर्ष किया। लेकिन इस बार मेडल नहीं ला पाए। अगली बार इंडिया के लिए मेडल जरूर लेकर आएंगे।
सवाल: किन-किन टीमों के बीच आपके मैच हुए थे? सुशीला: पहला मैच जापान, कजाकिस्तान, मलेशिया के बीच मैच हुए थे। लेकिन हम थर्ड पोजिशन के लिए हांगकांग से लड़े थे। हम दो पॉइंट की वजह से मेडल लाने से चूक गए। अगली बार अच्छी मेहनत करके जाएंगे। मेडल लेकर आएंगे।
सवाल: राजस्थान से कितने खिलाड़ी थे? सुशीला: राजस्थान मेरे अलावा विजयश्री राठौड़ और मुस्कान थी।
सवाल: पूरी टीम में किसका प्रदर्शन सबसे अच्छा रहा? सुशीला: टीम में सातों खिलाड़ी खेलते है तो सभी का प्रदर्शन अच्छा रहा। हमारी कप्तान अंशु कुमारी का प्रदर्शन अच्छा रहा था। अकेले से कुछ नहीं होता है, टीम स्पिरिट से खेलना होता हैं। सभी को 100 फीसदी देना पड़ता है। अकेला खिलाड़ी कुछ भी नहीं कर सकता है।

बाड़मेर पहुंचने पर परिजनों और ग्रामीणों ने किया जोरदार स्वागत।
सवाल: आगे किसके साथ मैच या टूर्नामेंट है? सुशीला: अभी खेलो इंडिया वूमेन लीग होने वाली हैं, यह अजमेर में होगी। अगले महीने वहां खेलने जाऊंगी।
सवाल: आपका संघर्ष बहुत रहा है, क्या गांव में ताने तक सुने? सुशीला: ऐसे तो ताने बहुत सुने। बेटियां शॉट्स पहन रही हैं। बेटियां कहां जाएगी। मेरे मम्मी पापा ने मेरे को कभी किसी चीज के लिए मना नहीं किया।
उन्होंने हमेशा कहा- हमारी बेटी तो खेलेगी। कभी मुझे बोझ नहीं समझा। हमारी बेटी खुद अपने पैरों पर खड़ी होगी। उन्होंने मुझे रसोई तक सीमित नहीं रखा, बाहर भेजा। मेरे पापा दूसरे मैच वगैरह देखते है, उनको आगे बढ़ता देखकर कहते थे कि तू कब इंडिया खलेगी? तू क्या करेगी?
आज मेरे पापा को भी खुशी हुई है, जो मैच वो फोन में देखते थे, आज उनकी बेटी ने उनको मौका दिया है। इंटरनेशनल मंच तक उनकी बेटी जाकर आई हैं।
सवाल: आपके पापा ने कहा- गांव वाले बोलते है, शॉट्स पहनकर घुमा रहे हो, आपको कैसा लगा? सुशीला: मेरे पापा को यही बोला जाता था, लेकिन मेरे पापा, मम्मी, दादा-दादी ने कभी मना नहीं किया। हमारी बेटी खेलेगी। शुरुआत से मैं अकेले प्रैक्टिस करती थी। गेम में सबसे ज्यादा मम्मी-पापा का सहयोग रहा है। उन्होंने मुझे विश्वास करके बाहर भेजा। मेरे दादा-दादी और परिवार को खुश होने का ऑप्शन बना है। जो लोग ताने देते थे, उनको सुनाने के लिए ऑप्शन बना है।
आज मैं ताने देने वालों को कहना चाहती हूं कि तुम अपनी बेटियों को ताने सुनाकर भेजो। आज हमारे पास ग्राउंड नहीं है। अगर मिल जाए तो आने वाले 4-5 सालों में 6-7 प्लेयर तैयार कर दूंगी। अभी प्लेयर्स को बाहर आने का मौका नहीं मिलता है।

स्वागत के बाद गाड़ियों का काफिला पहुंचा उसके घर।
सवाल: क्या रग्बी फुटबॉल बहुत स्ट्रॉन्ग गेम है? सुशीला: यह ऐसा गेम है, इसके लिए फाइटिंग करनी पड़ती है। जो ज्यादा फाइटिंग करेगा, उसी का मैच है। एक बॉल, जिसके पास ज्यादा रहती है, वो मैच जीत जाता है।
सवाल: गांव में कैसे प्रैक्टिस करते थे? सुशीला: मैं रोजाना सुबह चार बजे उठकर रनिंग के लिए जाती थी। साथ ही शाम को भी दौड़ लगाती थी। अकेले ही प्रैक्टिस किया करती थी। जब ग्राउंड में आते थे, तब सबके साथ प्रैक्टिस करती थी। हमें एक ग्राउंड मिल जाए तो वादा करती हूं कि मेरी जैसी बहुत जल्द 6-7 प्लेयर तैयार कर दूंगी।
सवाल: क्या दादा ने आपको मना कर दिया था? सुशीला: दादा ने सामाजिक प्रेशर की वजह से मना किया था। तब मैंने परिवार को कहा था कि आप मुझ पर विश्वास करिए…मैं जीत कर आऊंगी। इंडिया के लिए खेलकर आऊंगी। इंडियन टीम में 30 प्लेयर्स सलेक्ट हुए थे। उसमें से कट कट के 12 प्लेयर सलेक्ट हुए थे। बहुत ज्यादा संघर्ष करना पड़ा। मैंने खुद से ज्यादा मेरे अपने गांव और अपने राजस्थान के लिए खेला है।

सुशीला के साथ इंडियन टीम में राजस्थान के 3 खिलाड़ी थे।
सवाल: क्या ऐसा भी है कि दादी ने कहा बकरियां चराने के लिए भेजते थे, लेकिन गेम खेलती थी? सुशीला: प्रैक्टिस के लिए एक बॉल थी। मैं परिवार को नहीं बताती थी। जब बकरियां चराने के लिए जाती थी, तब साथ में प्रैक्टिस भी करती थी।
सवाल: ऐसे कितने समय तक प्रैक्टिस की? सुशीला: चुपके- चुपके तीन माह तक प्रैक्टिस की, जब दादी को पता चल गया, तब मैं अच्छा करने लगी। तब स्कूल के सर ने भी परिवार को बताया कि अच्छा कर रही है। बाहर भेजो तो यह कर सकती है। यहां तक बेटियों को बाहर नहीं भेजा जाता है, फिर भी मेरे परिवार ने मुझे पर विश्वास किया और मुझे इस खेल में आगे बढ़ाया। इसी के कारण मैं नेशनल और अब इंटरनेशनल लेवल पर खेल रही हूं।
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राजस्थान की बेटी 13 सितंबर से चीन में होने वाले रग्बी एशिया कप में भारत के लिए खेलेगी। दादी कहती हैं- हमें तो बिटिया ने अमर कर दिया। बहुत रोकती थी कि ये लड़कों का खेल है। मालूम नहीं था कि वो छुप-छुप कर ट्रेनिंग लेगी और इतना आगे चली जाएगी। (पढ़ें पूरी खबर)
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बाड़मेर जिले के छोटे से गांव भूरटिया की रहने वाली सुशीला अब चीन में होने वाले एशिया कप में भारत की टीम से खेलेगी। उनके सिलेक्शन के बाद गांव समेत जिलेभर में खुशी का माहौल है। (पढ़ें पूरी खबर)
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