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जोधपुर में काजरी की और से मोठ की नई वैरायटी तैयार की गई है।

जोधपुर स्थित केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी) के वैज्ञानिकों ने मोठ की एक नई किस्म मोठ 4 विकसित की है। यह किस्म कम बारिश की स्थिति में भी किसानों को अच्छी पैदावार देने में सक्षम है। वैज्ञानिकों का दावा है कि यदि बुवाई के बाद 40 दिनों त

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काजरी के वैज्ञानिकों के अनुसार, यदि फसल उगाने के 50-55 दिनों बाद बारिश हो जाती है, तो यह किस्म अतिरिक्त नमी का उपयोग करके मूंग की तरह फैल जाती है और उसकी ऊंचाई भी बढ़ जाती है। इससे किसानों को और भी अधिक फायदा मिल सकता है।

मोठ की खेती राजस्थान के चूरू, बीकानेर, नागौर, बाड़मेर और जोधपुर जिलों में प्रमुख रूप से की जाती है। प्रदेश में इस फसल की लगभग 10 लाख हेक्टेयर भूमि पर खेती की जाती है, जिसमें से 90 प्रतिशत क्षेत्र इन्हीं जिलों में स्थित है। काजरी द्वारा विकसित की गई यह नई किस्म किसानों को मोठ की अच्छी पैदावार प्राप्त करने में मदद कर सकती है।

काजरी के वैज्ञानिक HR मेहला ने इस नई वैराइटी (नई किस्म) को तैयार किया है।

काजरी के वैज्ञानिक HR मेहला ने इस नई वैराइटी (नई किस्म) को तैयार किया है।

1. फसलों के बेहतर उत्पादन के लिए रिसर्च

काजरी के प्रधान वैज्ञानिक एचआर मेहला ने बताया कि काजरी की ओर से फसलों के बेहतर उत्पादन को लेकर लगातार रिसर्च की जाती है। पश्चिमी राजस्थान में मोठ एक प्रमुख फसल है, लेकिन यहां बारिश का संतुलन कभी सही नहीं रहता है। ऐसे में काजरी की ओर से रिसर्च कर इस फसल को तैयार किया गया है।

2. कम बारिश में भी अच्छी पैदावार देने वाली किस्म डॉ. मेहला ने बताया कि उनका प्रयास था कि पुरानी जो फसलें यहां होती थीं, उनमें पौधा ज्यादा फैलता नहीं था। वह पौधा 60-65 दिन में पक जाता था, लेकिन मरुस्थलीय इलाके में वर्षा का वितरण बहुत असामान्य है। इसलिए यदि 40 दिन के बाद भी बारिश नहीं हो तो यह नई वैरायटी फसल 5 से 6 क्विंटल पैदावार दे सकती है।

3. अतिरिक्त नमी का उपयोग कर मूंग की तरह बढ़ने वाली किस्म

डॉ. मेहला ने बताया कि आजकल जो जलवायु परिवर्तन हो रहा है, उसमें हमने रिसर्च में पाया कि यदि इस फसल को उगाने के बाद 50-55 दिन बाद भी बारिश हो जाती है तो ये पौधे पूरी तरह से फैल जाते हैं और ऊंचाई भी मूंग की तरह बढ़ती है। यह किस्म अतिरिक्त नमी का उपयोग करके मूंग की तरह बढ़ना शुरू हो जाती है।

4. मोठ और ग्वार को भी पानी की जरूरत

डॉ. मेहला ने बताया कि 60 से 65 दिन का समय बीतने के बाद इसमें अतिरिक्त उपज होना शुरू हो जाती है। हमारे यहां की परिस्थितियों में मोठ को लेकर धारणा बन गई थी कि मोठ और ग्वार की फसल को पानी की जरूरत नहीं है, ऐसा सही नहीं है। उन्हें भी पानी और नमी की जरूरत रहती है।

मोठ की नई वैराइटी बारिश की कमी के बावजूद पैदावार दे सकेगी।

मोठ की नई वैराइटी बारिश की कमी के बावजूद पैदावार दे सकेगी।

मोठ की नई किस्मों का विकास: काजरी का प्रयास राजस्थान में पहले मोठ की खेती कृषि विश्वविद्यालय बीकानेर की आरएमओ सीरीज से होती थी, जिसमें RMO 257, 40, 435 प्रमुख थीं। ये फसलें 60 से 70 दिन में तैयार हो जाती थीं और 90 के दशक में आई थीं। 2000 के दशक की शुरुआत में काजरी ने मोठ पर अनुसंधान कार्य शुरू किया और 1999 में किस्म 1, 2002 में किस्म 2 और 2005 में किस्म 3 को तैयार किया। हालांकि, इसके बाद एक लंबा अंतराल आ गया।

साल 2017 में नई वेरायटी के लिए प्रयास शुरू किए गए, जिसके परिणामस्वरूप पिछले तीन सालों में काजरी ने तीन नई वैराइटी विकसित कीं, जिन्हें काजरी मोठ 4, 5, 6, 7 के नाम से जाना जाता है और जिन्हें राष्ट्रीय स्तर पर भारत सरकार की कमेटी ने अनुमोदित किया है। वहीं, काजरी 8 और 9 को इस बार दुर्गापुरा कृषि अनुसंधान केंद्र में हुई कार्यशाला में अनुमोदन मिला है।



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