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हमारी जेब में या पर्स में रखी हुई नकदी (भारतीय मुद्रा) का उपयोग हमारे लिए किसी संक्रमण या बीमारी का कारण बन सकती है। वह भी ऐसा, जिसका अक्सर पता भी नहीं चल पाता है। यह खुलासा नोटों की जांच में हुआ है। भास्कर ने यह नकदी दूध वालों, पताशी ठेलों, दुकानों,

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लैब में हुई जांच के नतीजों में 10 रुपए से लेकर 100 रुपए तक के नोटों पर पांच तरह के खतरनाक फंगस पेनीसिलियम, क्लेडोस्पोरियम, फ्यूजेरियम, एस्परजिलस,ट्राइकोडर्मा मिले हैं। इसके अलावा 4 तरह के बैक्टीरिया ई कोलाइ, स्टैफिलोकोकस, क्लेबसिएला, स्यूडोमोनास भी पाए गए हैं। ये फंगस और बैक्टीरिया सेहत के लिए खतरनाक हैं।

भास्कर ने चाय-दूध-पताशी की दुकानों, पेट्रोल पंप और अस्पतालों से लिए नोट, इनकी जांच रिपोर्ट में 5 तरह के फंगस और 4 तरह के रोगाणु मिले

  • फंगस; पेनीसिलियम, क्लेडोस्पोरियम, फ्यूजेरियम, एस्परजिलस व ट्राइकोडर्मा। {बैक्टीरिया; ई कोलाइ, स्टैफिलोकोकस, क्लेबसिएला, स्यूडोमोनास।

10 रुपए- सभी तरह के बैक्टीरिया-फंगस मिले। इनकी संख्या 500 तक

20 रुपए- इसमें भी सभी बैक्टीरिया फंगस लगभग वैसी ही स्थिति में मिले।

50 रुपए- बैक्टीरिया-फंगस 150-200 की संख्या में पाए गए।

100 रुपए- बैक्टीरिया-फंगस तो मिले, कम चलन से संख्या भी 4 गुना कम।

भास्कर ने रिसर्च के लिए स्टडी लेबोरेट्री ऑफ बायोटेक्नोलॉजी की रिसर्च लैब में नोट दिए। पहली बार में 10 रुपए के, दूसरी बार में 20, 50 और 100 के नोट ​दिए। जैव प्रोद्योगिकी विभाग ने मार्फोलॉजिकल स्टडी (संरचना) कर बताया कि नोटों में बीमारी फैलाने वाले फंगस मिले हैं।

नोटों में बैक्टीरिया-फंगस जांचने की प्रक्रिया 6 स्तर पर हुई, इसमें 15 दिन लगे

1. सबसे पहले मानक सूक्ष्मजीव विज्ञान विधि से कार्बन-नाइट्रोजन स्रोतों से युक्त विशेष माध्यम तैयार किया। जांच के लिए रैंडम कुछ नकदी रखी। 2. नोटों को सेनेटाइज्ड कपास से पोछा गया। 3. बाहरी संक्रमण का असर ना रहे, इसलिए पूरी प्रक्रिया लैमिनर फ्लोहुड के भीतर ही की गई। 4. कपास बड से लिए नोट को ठोस एगर प्लेट पर स्ट्रिक किया, ताकि मौजूद जीवाणु माध्यम पर आ जाएं। 5. एगर प्लेट्स को 37 डिग्री सेल्सियस तापमान पर लगभग 8-9 घंटे तक इनक्यूबेटर में रखा। 6. निर्धारित समय के बाद प्लेट्स पर बैक्टीरियल कॉलोनी के रूप में बड़ी संख्या में वृद्धि देखी गई।

अमेरिकन करेंसी में भी मिल चुकी बीमारियां

प्लॉस वन पत्रिका में प्रकाशित 2017 के एक अध्ययन के मुताबिक- न्यूयॉर्क से करंसी लेकर जांच कराई। उसमें सूक्ष्मजीवों की प्रजातियां मिलीं। सर्वाधिक वो जीव थे, जो मुंहासे पैदा करते हैं। कुछ नोटों पर ई कोलाइ, साल्मोनेला और स्टैफिलोकोकस ऑरियस जैसे रोगाणु पाए गए, जो गंभीर बीमारी का कारण बन सकते हैं।

भास्कर एक्सपर्ट- डॉ. जयकांत एसोसिएट प्रोफेसर, सेंट्रल यूनिवर्सिटी

डॉ. जन्मेजय असिस्टेंट प्रोफेसर, सेंट्रल यूनिवर्सिटी

जितनी संख्या में फंगस-बैक्टीरिया मिले हैं, ये चौंकाने वाले हैं। दरअसल, हमारी मुद्रा कॉटन पेपर से बनी होती है, जो नम होता है और चिपकता भी है। ये बैक्टीरिया और फंगस को आकर्षित करता है। चिपकने के कारण लोग थूक लगाते हैं। फंगस (फंगल स्पोर) जहां होती है वो 3-4 साल तक खत्म नहीं होती। जीवाणु जीभ, नाक, आंख के संपर्क से सक्रिय हो जाते हैं। आम तौर पर हमारे यहां नकदी का कीटाणु-शोधन नहीं है। छोटे नोट तेजी से आदान-प्रदान होते हैं। अगर किसी को टीबी है तो उसके बैक्टीरिया नकदी पर 24-48 घंटे तक जीवित रहते हैं। इसी दरम्यान ये किसी को यह बीमारी तक दे सकते हैं।



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