जयपुर में आयोजित तीन दिवसीय इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस इंडिया वॉल्व्स 2025 का समापन हुआ।
एओर्टिक स्टेनोसिस की बीमारी से जूझ रहे लोगों को अब नॉनसार्जिकल तकनीक से वॉल्व लगाया जाने लगा है जिसकी उम्र 15 साल तक होती है। इसके बाद उन्हें वापस वॉल्व लगाना पड़ता है जोकि एक जटिल प्रोसीजर होता है। इसके लिए अब नई जनरेशन के बायोप्रोस्थेटिक वॉल्व आ गए

कॉन्फ्रेंस के कोर्स डायरेक्टर डॉ. रविन्द्र सिंह राव ने बताया कि कॉन्फ्रेंस में तीन दिनों में सैंकड़ों सत्र आयोजित हुए।
कॉन्फ्रेंस के कोर्स डायरेक्टर डॉ. रविन्द्र सिंह राव ने बताया कि कॉन्फ्रेंस में तीन दिनों में सैंकड़ों सत्र आयोजित हुए जिसमें देश विदेश से आए जाने माने हृदय रोग विशेषज्ञों ने अपनी रिसर्च और अनुभव साझा किए। इस दौरान 1500 से अधिक डेलीगेट्स शामिल हुए और वर्कशॉप में जटिल प्रोसीजर करना सीखा। अंत में इंडिया वाल्व – केस कॉन्टेस्ट हुआ जिसमें देशभर से आए युवा डॉक्टरों ने अपने केस प्रस्तुत किए। इस सत्र का संचालन डॉ. अशोक सेठ, डॉ. रविन्द्र सिंह राव और डॉ. समीन शर्मा जैसे विशेषज्ञों ने किया। कॉन्टेस्ट में टॉप 3 डॉक्टर्स को सम्मानित किया गया।
25 साल चलेगा नई जनरेशन का वॉल्व
यूएसए से आए डॉ. राज मक्कड़ ने बताया कि अब नई पीढ़ी के हार्ट वॉल्व आए हैं जो बायोप्रोस्थेटिक तकनीक से बने हैं। इसमें खास टिश्यू का इस्तेमाल किया गया है। इस पर कैल्शियम जमाव बेहद धीमा होता है, इसलिए यह वॉल्व सामान्य वॉल्व की तुलना में कहीं ज्यादा टिकाऊ है। यह इंप्लांट होने के बाद 25 साल तक चलते हैं। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि भविष्य में अगर मरीज को दोबारा इलाज की ज़रूरत पड़े तो इसी वॉल्व के अंदर नया वॉल्व इंप्लांट किया जा सकता है, जिससे बड़ा ऑपरेशन टल सकता है।
नई जांच से और सुरक्षित होंगे ट्रांसकैथेटर प्रोसीजर डॉ. अशोक सेठ ने बताया कि किसी भी इंटरवेंशनल प्रक्रिया से पहले टीईई (ट्रांसईसोफेजियल इकोकार्डियोग्राफी) जांच मरीज की सुरक्षा सुनिश्चित करने का सबसे अहम कदम है। यह जांच दिल की आंतरिक संरचना, वॉल्व की कार्यक्षमता और रक्त प्रवाह की स्थिति को अत्यंत स्पष्ट रूप से सामने रखती है। इससे स्ट्रक्चरल हार्ट डिज़ीज़, कार्डियक फेलियर या किसी भी जटिलता की पहले ही पहचान हो जाती है। इससे प्रोसीजर की प्लानिंग भी अधिक सटीक और सुरक्षित बनती है।
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