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तीर्थों के तीर्थ पुष्कर की पावन धरा केवल ब्रह्माजी की यज्ञस्थली ही नहीं, बल्कि भक्तिरस की अमर ज्योति मीरा बाई की आध्यात्मिक यात्रा की भी साक्षी रही है। पुष्कर न केवल मीरा को उनके जीवन के लक्ष्य गिरधर गोपाल तक पहुंचाने वाला पड़ाव रहा, बल्कि यहीं उन्हे
पुष्कर के पवित्र ब्रह्म सरोवर के जल को भगवान नारायण का रूप माना जाता है। मीरा बाई को उनके गिरधर गोपाल तक पहुंचने का मार्ग बताने वाले और उन्हें वैष्णवी दीक्षा देने वाले गुरु भी उन्हें पुष्कर में ही मिले थे। यह वही गुरु हैं, जिनसे प्राप्त भगवान कृष्ण की दिव्या प्रतिमा को मीरा बाई अपने गिरधर गोपाल मानकर सेवा और पूजा किया करती थीं। पुष्कर में ब्रह्म घाट के नजदीक परशुराम द्वारा मंदिर, जो मीरा के गिरधर गोपाल के मंदिर से विख्यात है। यहां भगवान गिरधर गोपाल भी विराजते हैं. निंबार्क पीठ के अधीन मंदिर में लगे शिलालेख में भी मीरा बाई की दिव्य प्रतिमा के बारे में उल्लेख मिलता है।
मीराबाई का पुष्कर से गहरा नाता
- परशुराम देवाचार्य ने मीरा को पुष्कर में दी थी वैष्णवी दीक्षा।
- गुरु के कहने पर पुष्कर से वृंदावन गई मीरा।
- मीरा द्वारकाधीश में हुई थी देह समेत अंतर्ध्यान।
- यहां मीरा को पहली बार भगवान कृष्ण के हुए थे दर्शन।
- परशुराम द्वारा ही गिरधर गोपाल के मंदिर से हुआ विख्यात।
पुष्कर में मिला आश्रय
मीरा ससुराल से मेड़ता होते हुए पुष्कर आईं और गुरु परशुराम देवाचार्य की शरण में रहीं। गुरु की सलाह पर मीरा वृंदावन गईं। मीरा ने वृंदावन से द्वारका की यात्रा में अपने साथ रही गिरधर गोपाल की सेव्य प्रतिमा निंबार्क संप्रदाय के पीठाधीश्वर को भेंट की। द्वारका में जब वे कृष्ण की मूर्ति में देह सहित समा गईं, तब उनके गुरु परंपरा के अनुसार पुष्कर के परशुराम द्वारा मंदिर में गिरधर गोपाल की प्रतिमा की स्थापना की गई।
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