भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी का वर्चस्व और प्रभाव बढ़ने लगा तो मारवाड़ी सक्रिय राजनीति को छोड़कर पूर्णतः अपने कारोबार में रुचि लेने लगे। वर्ष 1772 से 1785 के बीच भारत के पहले गवर्नर जनरल रहे वारेन हेस्टिंग्स ने मारवाड़ियों की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं
हेस्टिंग्स ने मारवाड़ियों की राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओं का दमन करने के लिए उनका ध्यान व्यापार एवं कारोबार की ओर मोड़ने की नीति अपनाई। उन्होंने मारवाड़ियों को ब्रिटिश में बने माल को भारत में बेचने का प्रस्ताव दिया, जिसे स्वीकार कर लिया गया। इससे मारवाड़ियों की राजनीतिक आकांक्षाएं दब गईं। इसके बाद मारवाड़ी लम्बे समय तक केवल व्यापार में ही रुचि लेते रहे।
व्यावसायिक इतिहासज्ञ एवं वरिष्ठ लेखक व मारवाड़ियों पर रिसर्च करने वाले डॉ. डीके टकनेत का कहना है कि विडम्बना यह रही कि यही अंग्रेज बाद में अपने व्यापारियों का पक्ष लेते हुए मारवाड़ियों के साथ सौतेला व्यवहार करने लगे। इसके कारण मारवाड़ी इतने आहत व कुंठित अनुभव करने लगे कि उन्होंने एक बार पुनः राजनीति में रुचि लेनी शुरू कर दी। अब वे मारवाड़ के राजा मानसिंह के खुलकर समर्थन में आ गए। जिन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बजा दिया था। बाद में 1857 में मारवाड़ियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया तो अंग्रेजों ने सिपाहियों का विद्रोह या गदर कहकर वास्तविकता को नकारने का प्रयास किया। इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण विद्यमान हैं कि ढ़ाई सौ से अधिक मारवाड़ी इस संग्राम में फांसी पर चढ़ा दिए गए थे।
क्रांतिकारी मारवाड़ियों के मेहमान बनते रहे थे
गांधीजी के अहिंसावादी आंदोलन के साथ-साथ कुछ मारवाड़ी युवा क्रांतिकारी गतिविधियों की ओर भी आकर्षित होने लगे थे। टकनेत ने अपनी बुक मारवाड़ी विरासत में इसका उल्लेख भी किया है। उन्होंने बताया कि ऐसा करने वाले वे अकेले नहीं थे, देश के अनेक उत्साही युवा उन दिनों एक सशस्त्र क्रांति का सपना देखने लगे थे। 1928 में लाला लाजपतराय के निधन के बाद स्वतंत्रता संग्राम के दौर में मारवाड़ी आर्थिक सहायता के अतिरिक्त और भी विभिन्न तरीकों से क्रांतिकारियों की सहायता करने लगे थे। वर्ष 1930 में चंद्रशेखर आजाद नौ महीने तक मानोपुर में मारवाड़ी रामचन्द्र मुसद्दी के साथ रहे थे। क्रांतिकारियों का मारवाड़ी घरों में मेहमान बनना नियमित प्रक्रिया का हिस्सा था।
फिरोजपुर के गुरुदास राम अग्रवाल ने तो गांधी जी के अवज्ञा आंदोलन में हिस्सा लेने के बाद स्वयं का एक क्रांतिकारी दल ही बना लिया था। इसी दल की सहायता से उन्होंने 31 अक्टूबर 1930 को जेल पर बम फेंककर सनसनी फैला दी थी। अंग्रेजों की नजर के इस अपराध के लिए उन्हें तीन वर्ष के कारावास का दंड दिया गया। जेल में यातनाएं झेलने के बाद उनका स्वास्थ्य इतना बिगड़ गया कि ब्रिटिश सरकार को उन्हें रिहा करना ही पड़ा। हालांकि वे ज्यादा समय जी नहीं पाए और 27 मई 1934 को उनकी मृत्यु हो गई।
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