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गुरुद्वारा बुढ़ा दल में आयोजित शहीदी जोड़ मेले में हजारों श्रद्धालुओं ने शिरकत की।
नगर के ऐतिहासिक गुरुद्वारा शहीद बाबा सुखा सिंह-बाबा महताब सिंह छावनी बुढ़ा दल में मंगलवार को सालाना शहीदी जोड़ मेला बड़ी श्रद्धा और उत्साह से मनाया गया। यह मेला संगतों के सहयोग से पंथ रतन सिंह साहब जत्थेदार बाबा बलवीर सिंह जी 96 करोड़ी मुखी बुढ़ा दल की अग
अखंड पाठ और खुले दीवान से हुई शुरुआत
सुबह 10 बजे लड़ीवार अखंड पाठ साहिब के भोग डाले गए। इसके बाद फोर्ट स्कूल ग्राउंड में खुले दीवान सजाए गए, जिसमें हजारों की संख्या में संगत शामिल हुई। भारी भीड़ के कारण नगर में यातायात व्यवस्था बिगड़ गई और लंबी-लंबी कतारों में वाहन फंसे रहे। पुलिस प्रशासन और सेवादारों ने मिलकर यातायात व्यवस्था को संभाला।
शहीदी इतिहास से जुड़ी यादें
गुरुद्वारा के सेवादार बाबा जोगा सिंह और बाबा जग्गा सिंह ने बताया कि वर्ष 1739 में अफगान शासक नादिरशाह की सेना ने अत्याचार की सारी हदें पार कर दी थीं। उस समय लाहौर के जनरल जकरीया खां ने ‘मस्सेरंगड़’ को श्री हरमंदर साहिब का मुखी नियुक्त किया, जिसने दरबार साहिब को अय्याशी का अड्डा बना दिया।
यह बात बुढ़ा दल के चौथे मुखी और श्री अकाल तख्त के जत्थेदार बाबा जस्सा सिंह अहलुवालिया को पता चली तो उन्होंने हनुमानगढ़ की धरती से शहीद बाबा सुखा सिंह और शहीद बाबा महताब सिंह को मस्सेरंगड़ को सबक सिखाने अमृतसर भेजा। दोनों वीरों ने मस्सेरंगड़ का वध कर उसका सिर बरछे पर टांगा और वापसी में हनुमानगढ़ में विश्राम किया। उनकी उसी शहादत और बलिदान की स्मृति में हर वर्ष यह शहीदी मेला मनाया जाता है।
संत महापुरुषों के प्रवचन
मेले में आयोजित धार्मिक दीवानों में बाबा मनमोहन सिंह बारनवाले, बाबा जोगा सिंह करनाल वाले, बाबा मोर सिंह, बाबा नादर सिंह होशियारपुर, भााई सुखजीत सिंह कन्हैया,भाई हरजीत सिंह इंग्लैण्ड यू.के. हरमंदिर साहिब से पहुंचे रागी जत्थे भाई शुभदीप सिंह, कथा वाचक लखविंदर सिंह पारस टाढ़ी जत्था और लखबीर सिंह कोटकपूरा ने कथा-कीर्तन द्वारा संगत को निहाल किया। जत्थेदार बाबा बलवीर सिंह ने गुरु इतिहास पर प्रकाश डालते हुए कहा कि सिख इतिहास बलिदान, त्याग और धर्मनिष्ठा का जीवंत उदाहरण है।
उन्होंने बताया कि गुरु नानक देव जी ने सत्य, नाम सिमरन और सेवा का मार्ग दिखाया। उनके बाद आए सभी गुरुओं ने मानवता, न्याय और समानता के लिए कार्य किया। गुरु अर्जुन देव जी ने सत्य की राह में शहादत स्वीकार की, वहीं गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने मीरी-पीरी का संदेश दिया। गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने धर्म की रक्षा के लिए अपना शीश बलिदान कर दिया। अंत में गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की और “चढ़दी कला” का संदेश दिया।
उन्होंने कहा कि सिख गुरुओं की यह परंपरा केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक और मानवीय मूल्यों पर आधारित थी। उन्होंने निस्वार्थ सेवा, भाईचारे और इंसाफ का मार्ग प्रशस्त किया। शहीद बाबा सुखा सिंह और बाबा महताब सिंह जैसे वीरों ने भी इस परंपरा को जीवित रखते हुए अपने प्राण न्यौछावर किए। जत्थेदार जी ने संगत को संदेश दिया कि हमें अपने गुरुओं के उपदेशों और शहादतों से प्रेरणा लेकर जीवन में सच्चाई, सेवा और परोपकार के मार्ग पर चलना चाहिए।
बाबा मनमोहन सिंह बारनवाले ने अपने प्रवचन में संगत को नशा त्यागने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि नशा मनुष्य की सामाजिक, पारिवारिक और धार्मिक प्रवृत्ति को नष्ट करता है। युवाओं को खेलों से जुड़कर स्वस्थ जीवन जीने और समाज को प्रेरित करने का आह्वान किया।
अमृत संचार और सेवामेले के दौरान बुढ़ा दल से पहुंचे पाँच प्यारों ने 102 श्रद्धालुओं को अमृत संचार कराकर गुरु वाले बनाया। संगतों के लिए जगह-जगह भंडारे और छबीलों का आयोजन किया गया। शहीद भगत सिंह फाउंडेशन क्लब, श्री सिंधी समाज, गुरुद्वारा श्री कलगीधर साहिब इंदिरा कॉलोनी, गुरुद्वारा गुरुनानकसर प्रेमनगर सहित विभिन्न धार्मिक और सामाजिक संस्थाओं ने ठंडी लस्सी, मीठा पानी, पकोड़े, बैड पकोड़े, जलजीरा, भेलपुरी और बूंदी के भंडारे लगाए।
मेले का समापन और आभार
गुरद्वारा प्रबंधक बाबा जोगा सिंह और बाबा जग्गा सिंह ने मेले में शामिल हुई संगतों, पुलिस प्रशासन, जिला प्रशासन और सभी धार्मिक संस्थाओं का धन्यवाद व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि यह मेला न केवल शहीदों की शौर्यगाथा को याद दिलाता है बल्कि वर्तमान पीढ़ी को पंथ, धर्म और समाज की सेवा के लिए प्रेरित करता है। इस प्रकार हनुमानगढ़ की ऐतिहासिक धरती पर आयोजित यह शहीदी जोड़ मेला श्रद्धा, भक्ति और सेवा भाव की मिसाल बन गया।
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