राजस्थान में रात 9:57 बजे से साल का दूसरा और आखिरी चंद्रग्रहण शुरू हो गया। यह पूर्ण ग्रहण यानी ब्लड मून है, जिसे पूरे राजस्थान में कहीं से भी देखा जा सकता है।
चंद्रग्रहण का नजारा रात करीब 9:57 बजे से शुरू होकर 3 घंटे 28 मिनट तक दिखाई देगा। 82 मिनट तक पूर्ण चंद्रग्रहण (ब्लड मून) रहेगा, जिसके दौरान पृथ्वी सूर्य और चंद्रमा के बीच आ जाएगी।
चंद्रमा पर पृथ्वी की छाया पड़ेगी और वह लाल-नारंगी रंग का दिखाई देगा। इसे ही ब्लड मून कहा जाता है।
जयपुर के श्री गोविंददेवजी मंदिर में इस बार चंद्रग्रहण के दौरान पट खुले हैं। मंदिर प्रशासन ने बताया कि सूतक काल दोपहर 12:57 बजे से शुरू हो गया।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण से 9 घंटे पहले लगने वाले सूतक काल के दौरान मंदिरों के कपाट बंद रहे और पूजा-अर्चना नहीं की गई।
राजस्थान में चंद्रग्रहण तस्वीरों में…
चंद्रग्रहण शुरू

पूर्ण चंद्रग्रहण

ब्लड मून

जयपुर में चंद्रग्रहण के बाद ब्लड मून का नजारा।

सीकर में पूर्ण चंद्रग्रहण ।
खाटूश्यामजी समेत कई मंदिर बंद रहे सीकर के खाटूश्यामजी मंदिर में भी भक्तों के लिए दर्शन बंद कर दिए गए हैं। ग्रहण समाप्ति के बाद श्याम बाबा की विशेष झांकी और भोग की व्यवस्था की जाएगी। पुष्कर के ब्रह्मा मंदिर, नाथद्वारा के श्रीनाथजी मंदिर और अजमेर स्थित अन्य प्रमुख मंदिरों में भी आज शाम से ही कपाट बंद रखे गए हैं।

कोटा में चंद्रग्रहण के दौरान भगवान का पालकी उत्सव निकाला गया।

अजमेर में चंद्रग्रहण के समय मंदिरों के पट बंद रहे।

सबसे पहले जानिए, चंद्रग्रहण क्या है
- पृथ्वी और सभी दूसरे ग्रह गुरुत्वाकर्षण बल यानी ग्रेविटेशनल फोर्स की वजह से सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। सूर्य के चक्कर लगाने के दौरान कई बार ऐसी स्थिति बनती है जब पृथ्वी, सूर्य और चंद्रमा के बीच में आ जाती है। इस दौरान सूर्य का प्रकाश चंद्रमा तक नहीं पहुंच पाता है और पृथ्वी की छाया चंद्रमा पर पड़ने से चंद्रग्रहण होता है।
- चंद्रग्रहण की घटना तभी होती है जब सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा एक सीध में हों, खगोलीय विज्ञान के अनुसार ये केवल पूर्णिमा के दिन ही संभव होता है। इसी वजह से चंद्रग्रहण केवल पूर्णिमा के दिन होते हैं।
श्राद्ध पक्ष की शुरुआत इंडियन एस्ट्रोलॉजी के ज्योतिष पंडित पवन शर्मा ने बताया इस बार चंद्रग्रहण के साथ ही पितृपक्ष की शुरुआत हुई। पूर्णिमा का श्राद्ध सूतक से पहले ही निकालना आवश्यक था। पितृपक्ष आश्विन अमावस्या यानी 21 सितंबर को समाप्त होंगे। जिन पूर्वजों की तिथि ज्ञात नहीं होती या किसी कारण श्राद्ध छूट जाता है, उनका श्राद्ध पूर्णिमा को ही किया जाता है। ऐसे में आज दिन में 12 बजे तक श्राद्धकर्म और ब्राह्मण भोजन पूर्ण करने की परंपरा रही।

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