NCERT की 8वीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की किताब में छपे नक्शे में मेवाड़ सहित सभी 19 रियासतों को मराठा साम्राज्य में दिखाने को लेकर आज उदयपुर में मेवाड़ क्षत्रिय महासभा संस्थान ने अपना विरोध जताया। उन्होंने कहा कि NCERT ने नक्शे में सम्पूर्ण राजपूतान
महासभा के पदाधिकारियों ने कहा- मराठा जब भी आए चौथ वसूली के लिए आए। हम लूटेरों को सम्राट घोषित नहीं कर सकते। उन्होंने कहा- ऐसा लगता है NCERT में बैठे हुए लोगों को इतिहास की एबीसीडी नहीं आती है। उन्होंने क्या आधार बनाकर नक्शा बनाया।
महासभा के अध्यक्ष अशोक सिंह मेतवाला और पूर्व अध्यक्ष, वल्लभनगर के पूर्व विधायक रणधीर सिंह भींडर और महामंत्री भवानी सिंह ताणा ने सोमवार को उदयपुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस में कई तथ्यों को सामने रखते हुए कहा- इस पुस्तक में जो गलती की है उसे ठीक किया जाए।

प्रेस कान्फ्रेंस को संबोधित करते मेवाड़ क्षत्रिय महासभा संस्थान के पदाधिकारी
मेवाड़ क्षत्रिय महासभा संस्थान के अध्यक्ष मेतवाला ने बताया- छत्रपति महाराज शिवाजी ने हिन्दू पद पादशाही की स्थापना का स्वप्न देखा व स्वराज की परिकल्पना की। औरंगज़ेब द्वारा जज़िया मांगने पर शिवाजी का यह कहना कि पहले मेरे बड़े भाई महाराणा राज सिंह से जज़िया लो दर्शाता है कि वे अपनी उत्पत्ति मेवाड़ से मानते थे।
मेतवाला ने कहा- छत्रपति साहू द्वारा मेवाड़ से किसी राजकुमार को दत्तक पुत्र के रूप में भेजने की प्रार्थना भी की थी। जो दर्शाता है कि मराठा मेवाड़ सम्बन्ध अटूट व अच्छा था। परन्तु बाद में लूटमार दस्ते ने न केवल इन सम्बन्धों को ठेस पहुंचाई बल्कि आम जनजीवन को त्रस्त कर दिया।
मेतवाला और भींडर ने कहा कि बाजीराव पेशवा जब महाराणा जगत सिंह द्वितीय के समय मेवाड़ आए तो कुलीन ब्राह्मण होने और दूसरी रियासत के मंत्री होने कि वजह से उदयपुर के पुरोहित के साथ राज गद्दी के सामने गद्दे पर बिठाया। मराठों ने मेवाड़, मारवाड़ व आमेर और हाड़ौती के राज्यों में पहले तो उत्तराधिकार संघर्षों में धन लेकर लड़ाई करने की भूमिका अदा की व बाद में लूटमार कर निरीह जनता को परेशान करते थे।
उन्होंने बताया कि क्षिप्रा 1769, तूंगा 1787, पाटन 1790, मालपुरा 1800 ये सभी युद्ध राजाओं द्वारा मराठों के खिलाफ ही लड़े थे। यदि राजपूताना मराठा साम्राज्य का हिस्सा होता तो ये युद्ध क्यों होते। यदि राजस्थान मराठा साम्राज्य का अंग था तो फिर यह आरोप क्यों लगाया जाता है कि पानीपत के तीसरे युद्ध में राजस्थान ने मराठों का साथ नहीं दिया। यदि राजस्थान मराठों के अन्तर्गत था तो यह क्यों कहा जाता है कि राजस्थान के राजाओं ने अंग्रेजों से सन्धियां की फिर तो कहा जाना चाहिए कि मराठों ने अंग्रेजों को देश बेचा।
अध्यक्ष मेतवाला ने बताया कि राजपूताना के राजाओं व मराठों के बीच ऐसा कोई सन्धि पत्र नहीं है। जिसे उक्त रियासतों द्वारा अधीनता स्वीकार करने की शर्त लिखी गई हो।

नक्शे में मराठा साम्राज्य को कोल्हापुर से उत्तर में पेशावर और कटक तक दर्शाया है। इसमें जैसलमेर, मेवाड़ आदि को भी मराठा साम्राज्य में दिखाया गया है।
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