मुख्य पात्रों में एलाइजा डूलिटिल की भूमिका प्रिन्सी शर्मा ने निभाई।
कानोड़िया पी.जी. महिला महाविद्यालय, जयपुर के 60 गौरवशाली वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में बुधवार को आर.ए. पोद्दार ऑडिटोरियम में प्रसिद्ध अंग्रेजी नाटक ‘पिगमेलियन’ का मंचन किया गया। यह नाटक जॉर्ज बर्नार्ड शॉ द्वारा रचित है, जिसे 1939 में ऑस्कर अवार्ड मि
नाटक में भाषा, सामाजिक वर्ग और स्त्री अस्मिता जैसे विषयों को व्यंग्यात्मक शैली में प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम में महाविद्यालय निदेशक डॉ. रश्मि चतुर्वेदी, प्राचार्य डॉ. सीमा अग्रवाल, प्रबंध समिति के सदस्य, वर्तमान और सेवानिवृत्त व्याख्याताएँ, छात्राएँ और उनके अभिभावक उपस्थित थे।

र्यक्रम में महाविद्यालय निदेशक डॉ. रश्मि चतुर्वेदी, प्राचार्य डॉ. सीमा अग्रवाल, प्रबंध समिति के सदस्य, वर्तमान और सेवानिवृत्त व्याख्याताएँ, छात्राएँ और उनके अभिभावक उपस्थित थे।
महाविद्यालय निदेशक ने कहा कि ऐसे सांस्कृतिक कार्यक्रम छात्राओं के समग्र विकास के लिए आवश्यक हैं। प्राचार्य डॉ. सीमा अग्रवाल ने छात्राओं के अभिनय और सामाजिक संदेशों की प्रशंसा करते हुए इसे रचनात्मक प्रतिभा का उत्कृष्ट उदाहरण बताया।
नाटक का निर्देशन डॉ. प्रीति शर्मा (विभागाध्यक्ष अंग्रेजी विभाग) द्वारा किया गया। उनके निर्देशन और कलात्मक दृष्टिकोण ने दर्शकों को पूरी तरह से बांधे रखा। सह-निर्देशन ऋषिता शर्मा, भव्या पुरी और अदिति पंकज द्वारा किया गया।

कानोड़िया पी.जी. महिला महाविद्यालय, जयपुर के 60 गौरवशाली वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में बुधवार को आर.ए. पोद्दार ऑडिटोरियम में प्रसिद्ध अंग्रेजी नाटक ‘पिगमेलियन’ का मंचन किया गया।
मुख्य पात्रों में एलाइजा डूलिटिल की भूमिका प्रिन्सी शर्मा ने निभाई। उन्होंने एक साधारण फूल बेचने वाली लड़की के सामाजिक रूपांतरण को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। प्रोफेसर हिगिन्स की भूमिका नियोनिका महर्षि और कर्नल पिकरिंग की भूमिका पलक जैन ने निभाई।
इस नाटक को सफल बनाने में डॉ. टीना सिंह भदौरिया, डॉ. प्रेरणा सिंह लवानिया, डॉ. योगिता सोलंकी समेत कई अन्य शिक्षकों की महत्वपूर्ण भूमिका रही। कॉस्ट्यूम, मेकअप, संपादन, दृश्यकला और प्रबंधन समितियों की छात्राओं ने भी अपनी सक्रिय भूमिका निभाई।
नाटक ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि भाषा किसी उच्च वर्ग की विशेषता नहीं, बल्कि समाज में एक सत्ता का रूप बन चुकी है। स्त्री की पहचान केवल उसकी वाणी से नहीं, बल्कि आत्मसम्मान, विचार और आत्मबल से होती है।
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