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जालोर में ग्रेनाइट स्लरी का पहाड़। अब बन रही हैं टाइलें।

विश्व की सबसे बड़ी ग्रेनाइट मंडी कहलाने वाले जालोर जिले के लिए 10 साल पहले ग्रेनाइट की कटिंग से निकलने वाला पाउडर (स्लरी) आफत बन गया था। जालोर में सैकड़ों फैक्ट्रियों से निकली स्लरी से हवा, मिट्‌टी और पानी का प्रदूषण होता था। ये स्लरी जहां डाली जाती वह

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लेकिन गुजरात ने राजस्थान के इस वेस्ट को ‘बड़ा प्रोडक्ट’ बना दिया है। गुजरात के मोरबी शहर में ग्रेनाइट स्लरी से सनमाइका टाइल्स बनाई जाती हैं। अब सिर्फ स्लरी बेचकर जालोर के ग्रेनाइट उद्योग को सालाना 2 करोड़ की इनकम हो रही है। इस धनराशि को ग्रेनाइट एसोसिएशन मजदूरों के हितों के काम में खर्च कर रही है।

ग्रेनाइट स्लरी से टाइल्स बनाने के इस काम से सबसे बड़ा फायदा पर्यावरण को हुआ है। जिस पाउडर से हवा-मिट्‌टी प्रदूषित होती थी, वह अब नहीं होती।

पहले केरोसीन से, अब पानी से चलती हैं यूनिट

जालोर ग्रेनाइट एसोसिएशन के सचिव सुरेश चौधरी ने बताया- जालोर में ग्रेनाइट की 1200 यूनिट चल रही थी। पॉल्यूशन फैलने के कारण काम कम हो गया। स्लरी के कारण लोग विरोध करते थे। खेत बंजर हो जाते थे। 30 परसेंट फैक्ट्रियों में एक शिफ्ट में काम रह गया। व्यापारी और उद्योग स्लरी की समस्या के कारण दूसरी जगहों पर शिफ्ट हो गए।

जहां तक स्लरी पाउडर की बात है तो पहले इससे काफी प्रदूषण फैलता था।

उन्होंने कहा- करीब 7-8 साल में सारी यूनिटें पानी से चलने लगी हैं। वर्तमान में एक भी ऐसी फैक्ट्री जालोर में नहीं है, जिससे केरोसीन से ग्रेनाइट की कटिंग हो रही हो।

पहले यूनिटों से निकली स्लरी को डंप करने की बड़ी समस्या थी। इस पाउडर से वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण और मृदा प्रदूषण होता था। लेकिन अब यह स्लरी गुजरात के मोरबी शहर जा रही है। वहां इससे टाइलें बनाई जा रही हैं। ये मान लीजियो की स्लरी निकलते ही ट्रकों में लोड हो जाती है। जालोर जिले में रोजाना 60 ट्रक लोड होते हैं। एक ट्रक में 35 से 42 टन स्लरी होती है।

हम मिनिमम चर्ज पर स्लरी बेचते हैं। 800 रुपए की स्लिप कटती है और जीएसटी लिया जाता है। इससे सालाना 2 करोड़ की कमाई हो जाती है। यह पैसा ग्रेनाइट के काम में लगे मजदूरों के हित में और ग्रेनाइट इकाइयों के विकास में लगाया जाता है।

जालोर में ग्रेनाइट की स्लरी की पहाड़ कभी बहुत ऊंचे होते थे। अब ये सिमटते जा रहे हैं।

जालोर में ग्रेनाइट की स्लरी की पहाड़ कभी बहुत ऊंचे होते थे। अब ये सिमटते जा रहे हैं।

स्लरी के कारण काफी परेशानी थी, अब रास्ता मिला

जालोर ग्रेनाइट एसोसिएशन के सचिव सुरेश चौधरी ने बताया- स्लरी सिरदर्द बन गई थी। ग्रेनाइट के काम में स्लरी तो निकलती ही थी। यह किसी काम की नहीं थी। हमने सरकार से आग्रह भी किया था कि इसका कुछ करें। जिला उद्योग केंद्र को रिपोर्ट बनाकर दी। कहा कि इसे सड़कें बनाने के काम में ले लो। लेकिन एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष नरेंद्र की पहल पर मोरबी में टाइल निर्माण में इस स्लरी को खपाने की शुरुआत हुई।

अब सारी स्लरी मोरबी जा रही है और वहां कई तरह की टाइलें बन रही हैं। पहले मोरबी में राजस्थान के बीकानेर से मिट्‌टी जा रही थी। इस मिट्‌टी में हार्डनेस नहीं थी। इसलिए विकल्प के तौर पर जालोर की ग्रेनाइट स्लरी का उपयोग किया गया। ग्रेनाइट हार्ड पत्थर होता है। इसकी स्लरी की हार्डनेस अच्छी है। इसलिए टाइल निर्माण में यह परफेक्ट साबित हुई।

कभी जालोर में स्लरी के सफेद पहाड़ नजर आते थे, अब ये पहाड़ कटकर समतल होते जा रहे हैं।

जालोर के ग्रेनाइट उद्योग का इतिहास

जालोर ग्रेनाइट एसोसिएशन के सचिव सुरेश चौधरी ने बताया- जालोर में ग्रेनाइट उद्योग की शुरुआत 1970 के दशक में हुई। इस दौरान यहां करीब 1200 से अधिक इकाइयां थीं। इसके साथ ही जालोर के ग्रेनाइट पत्थर ने कुछ ही समय में विश्व भर में अपनी जगह बनाई और जालोर सबसे बडी ग्रेनाइट मंडी बन गया। जहां से जालोर को ग्रेनाइट नगरी की पहचान मिली।

अब जालोर की स्लरी से गुजरात में बनी टाइलें देश-दुनिया में जा रही हैं। 40 टन टाइल्स का ट्रक मार्केट में 30 से 35 लाख रुपए में बिक रहा है।



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