राजस्थान हाईकोर्ट ने हत्या के एक मामले में निचली अदालत के फैसले को बदलते हुए आरोपी को उम्रकैद की सजा से मुक्त कर दिया है। जस्टिस मनोज कुमार गर्ग और जस्टिस रवि चिरानिया की खंडपीठ ने संजय कुमार की अपील स्वीकार करते हुए अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में कहा कि
कोर्ट ने कहा-

यह एक स्थापित नियम है कि दुश्मनी एक दोधारी हथियार है। एक तरफ यह मकसद देती है, तो दूसरी तरफ इससे झूठे इल्ज़ाम लगने की संभावना भी बनी रहती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि बिना ठोस सबूत के दुश्मनी के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

इससे पहले सिरोही की अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अदालत ने 3 मई 2016 को संजय कुमार को आईपीसी की धारा 302 के तहत आजीवन कारावास और 25,000 रुपए जुर्माने की सजा सुनाई थी। आरोप था कि उसने मदन झा की हत्या पीकअप वैन से टक्कर मारकर की थी।
सिरोही के पिंडवाड़ा थाना क्षेत्र का घटनाक्रम
मामला 20 अप्रैल 2015 का है, जब संजीत झा ने पिंडवाड़ा थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। शिकायत में कहा गया कि संजय कुमार ने पहले भी मदन झा की पत्नी रंजू झा के साथ गलत हरकतें करने की कोशिश की थी। इस कारण दोनों में दुश्मनी थी। शिकायतकर्ता के अनुसार 19 अप्रैल की शाम करीब 7 बजे संजय ने रंजू झा को धमकी दी थी कि वह उसके पति को फैक्ट्री से छूटने के बाद मार देगा।
रात 9:50 बजे के करीब सूचना मिली कि किसी पीकअप वाहन ने मदन झा को टक्कर मार दी है। उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां उसकी मौत हो गई। पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर मामले की जांच शुरू की।
गवाहों के बयान में गंभीर खामियां
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कई महत्वपूर्ण खामियों की ओर इशारा किया। मुख्य गवाह संजीत झा (शिकायतकर्ता) ने कहा था कि उसे पत्रकार विक्रम पुरोहित ने फोन पर घटना की सूचना दी थी, लेकिन वह पत्रकार अदालत में पेश नहीं किया गया। दूसरी ओर मृतक की पत्नी रंजू झा ने कहा था कि उसे परवेज ने घटना की जानकारी दी थी।
गवाह परवेज को अदालत में पक्षद्रोही घोषित किया गया और उसने पूर्ण अज्ञानता व्यक्त की। उसने कहा कि वह मृतक को नहीं जानता और न ही उसे पता कि किसने उसे टक्कर मारी। यह मुख्य गवाह रंजू झा के दावे को झुठलाता है।
दुश्मनी की कहानी में दम नहीं
अभियोजन पक्ष ने रंजू झा के साथ गलत संबंध बनाने की कोशिश की बात बताते हुए पुरानी दुश्मनी का दावा किया था। इसी वजह से विवाद हुआ था। लेकिन कोर्ट ने पाया कि इसके पक्ष में कोई ठोस दस्तावेजी सबूत नहीं था। एकमात्र दस्तावेज 14 फरवरी 2014 की पुलिस रिपोर्ट में किसी अवैध संबंध की बात नहीं कही गई थी।
परिस्थितिजन्य साक्ष्य में कमी
यह मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित था क्योंकि कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं था। हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के शरद बिर्धीचंद सारडा बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में निर्धारित पांच अहम सिद्धांतों का उल्लेख किया। इन सिद्धांतों के अनुसार परिस्थितियां पूर्णतः स्थापित होनी चाहिए, केवल आरोपी के दोषी होने की परिकल्पना का समर्थन करनी चाहिए और निर्णायक प्रकृति की होनी चाहिए।
कोर्ट ने पाया कि इस मामले में साक्ष्य की श्रृंखला अधूरी है। न तो ‘लास्ट सीन थ्योरी’ सिद्ध हुई और न ही मजबूत परिस्थितिजन्य साक्ष्य मिले। पीकअप वैन पर पेंट के निशान और साइकिल की टक्कर के सबूत अकेले दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं थे।
न्यायालय के निर्देश
हाईकोर्ट ने संजय कुमार को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है, बशर्ते वह किसी अन्य मामले में वांछित न हो। कोर्ट ने संजय कुमार को 25,000 रुपए की व्यक्तिगत जमानत और इतनी ही राशि की जमानती के साथ 6 महीने के लिए बांड भरने का निर्देश दिया है।
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