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जेडीए ने पांच साल पहले जोधपुर नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में एक बिल्डिंग सीज कर दी। ऐसे गंभीर मामले में याचिकाकर्ता अल्लाबेली खान को राहत मिली राजस्थान हाईकोर्ट से। मंगलवार को सुनवाई करते हुए जस्टिस सुनील बेनीवाल की कोर्ट ने जेडीए द्वारा बिना अधिकार
इस बिल्डिंग पर मोबाइल टॉवर लगाने के विरोध को लेकर मिली शिकायत को जेडीए ने पहले तो उचित कार्रवाई के लिए नगर निगम को भेजी। इसके बाद खुद जेडीए ने ही क्षेत्राधिकार के बाहर जाकर उसी शिकायत पर कार्रवाई करते हुए उस प्रोपर्टी को सीज कर दिया, वो भी बिना सुनवाई का मौका दिए।
रामनगर में घर की छत पर लग रहा था मोबाइल टॉवर
चौपासनी रोड लाल पुलिया के निकट 10 दुकान के पीछे रहने वाले अल्ला बेली खान ने 14 नवंबर 2006 को चौपासनी खसरा नंबर 112 रामनगर योजना में प्लॉट खरीदा था। उन्होंने उचित अनुमति प्राप्त कर भवन का निर्माण किया था। बाद में एक टेलीकॉम कंपनी ने मोबाइल टावर लगाने के लिए संपर्क किया और एग्रीमेंट हुआ।
हालांकि, कुछ पड़ोसियों ने “निजी कारणों से” जेडीए के समक्ष मोबाइल टावर की स्थापना का विरोध करते हुए शिकायत दर्ज कराई। जेडीए ने 25 फरवरी 2020 के पत्राचार के माध्यम से यह शिकायत जोधपुर नगर निगम के आयुक्त को अग्रेषित की, क्योंकि संपत्ति नगर निगम के अधिकार क्षेत्र में आती है।
जेडीए से नोटिस, उसी दिन निर्माण हटाने व जब्ती का आदेश
याची की ओर से अधिवक्ता मनीष पटेल ने कोर्ट में बताया कि “अधिकार क्षेत्र नहीं होने के बावजूद, जेडीए ने राजनीतिक प्रभाव के तहत याचिकाकर्ता के विरुद्ध मामला दर्ज किया।’ जेडीए ने 17 मार्च 2020 को नोटिस जारी किया और उसी दिन कथित अवैध निर्माण हटाने और संपत्ति की जब्ती का आदेश पारित कर दिया। यह कार्रवाई “याचिकाकर्ता को अपना बचाव प्रस्तुत करने का अवसर दिए बिना’ की गई।
कोर्ट ने पाया कि, ‘25 फरवरी 2020 की शिकायत विचाराधीन थी, जेडीए ने 12 मार्च 2020 के लिए शो कॉज नोटिस जारी किया। उस दिन याचिकाकर्ता के वकील ने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा और मामला 24 मार्च 2020 के लिए स्थगित हो गया। लेकिन इस बीच 15 मार्च 2020 को निरीक्षण रिपोर्ट तैयार की गई और “याचिकाकर्ता को सूचित किए बिना’ मामले की तारीख बदलकर 17 मार्च 2020 कर दी गई।
कोर्ट भी जेडीए की कार्रवाई से अचंभित
जस्टिस सुनील बेनीवाल ने अपने फैसले में कहा: “यह वास्तव में आश्चर्यजनक है कि जब मोबाइल टावर लगाने को लेकर की गई शिकायत केवल न्यायाधिकार के आधार पर नगर निगम को अग्रेषित की गई थी, फिर भी निर्माण अनुमति के कथित उल्लंघन को जेडीए द्वारा कैसे निपटाया गया है?” कोर्ट ने कहा कि “जेडीए के वकील द्वारा दिया गया यह तर्क कि मूल निर्माण अनुमति जेडीए द्वारा दी गई थी, स्वीकार नहीं किया जा सकता।’
न्यायालय ने स्पष्ट किया: “एक बार प्रश्नगत क्षेत्र का नगर निगम, जोधपुर को स्थानांतरण हो जाने के बाद, कोई भी शिकायत; चाहे वह अनुमति की शर्तों के उल्लंघन या बिना अनुमति निर्माण के संबंध में हो, पूर्णतः नगर निगम, जोधपुर के क्षेत्राधिकार में आती है, न कि जेडीए के।’
हालांकि, जेडीए की ओर से वकील ने तर्क दिया कि चूंकि याचिकाकर्ता ने पहले से ही समान राहत के लिए सिविल सूट दायर कर दिया है, इसलिए रिट पिटीशन मेंटेनेबल नहीं है। इस पर याचिकाकर्ता के वकील पटेल ने बताया कि “सूट पहले ही वापस ले लिया गया है और इस प्रकार रिट पिटीशन इस न्यायालय के समक्ष पूर्णतः मेंटेनेबल है”।
कोर्ट- राजनीतिक दबाव में अधिकार क्षेत्र से बाहर कार्रवाई गलत
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा: “दोनों पक्षों की चर्चा के मद्देनजर, रिट पिटीशन स्वीकार की जाती है। 17 अप्रैल 2020 का विवादित आदेश रद्द और निरस्त किया जाता है। इसके साथ ही जेडीए को याचिकाकर्ता की प्रोपर्टी जब्ती खत्म करने का निर्देश दिया जाता है।”
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