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विधाशीष हथकरघा पर साड़ी बनाते कारीगर।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हुनरमंद बुनकरों के हुनर को दुनिया के सामने लाने की अपील का असर राजस्थान के टोंक में दिखाई दे रहा हैं। टोंक जिले के आवां कस्बे के आशीष जैन ने लोन लेकर एक समिति की स्थापना की। महज 7 सालों में उनकी समिति का टर्नओवर 50 लाख पह

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दरअसल, आज (7 अगस्त) ‘राष्ट्रीय हथकरघा दिवस’ है। आशीष ने न सिर्फ टोंक जिले के हथकरघा उद्योग में जान डाल दी, बल्कि लोगों को रोजगार भी दिया। पीएम मोदी की अपील और संत विद्यासागर व मुनि सुधासागर महाराज के हथकरघा को बढ़ावा देने के संबोधन को सुनने के बाद हथकरघा के क्षेत्र में लोगों को साथ लेकर अपना बिजनेस शुरू करने की ठानी।

आशीष जैन द्वारा जयपुर में खोली गई कपड़ों की दुकान में साड़ी खरीदती महिला।

आशीष जैन द्वारा जयपुर में खोली गई कपड़ों की दुकान में साड़ी खरीदती महिला।

सालाना 50 लाख का टर्नओवर इसके लिए आशीष ने मध्यप्रदेश की अधिकृत संस्था से हथकरघा की ट्रेनिंग ली। फिर 3 लाख रुपए का लोन लेकर आचार्य विद्यासागर हथकरघा प्रशिक्षण एवं उत्पादन समिति की स्थापना की। आज इसी समिति का सालाना करीब 50 लाख का टर्न ओवर है। 20- 25 लोग गांव में काम करते है। जबकि करीब 200 लोगों को चिह्नित कर रोजगार भी दिया।

समिति ने 100 से ज्यादा युवाओं को हथकरघा की ट्रेनिंग दी। अब आंवा साड़ी के नाम से उनके कपड़ों की दो दुकान जयपुर में है। एक साड़ी 5 से 10 हजार रुपए तक की है। उनकी साड़ियों को सचिवालय की महिला अफसर से लेकर बिजनेसमैन की वाइफ तक पसंद कर रही हैं। वहीं समिति के बने कपड़ों को रिलायंस, रेमंड्स समेत कई बडी कंपनियां भी खरीद चुकी हैं।

समिति के बनाए कपड़ों को रेमंड्स समेत कई बडी कंपनियां भी खरीद चुकी हैं, जिससे हथकरघों की संख्या भी बढ़ी है।

समिति के बनाए कपड़ों को रेमंड्स समेत कई बडी कंपनियां भी खरीद चुकी हैं, जिससे हथकरघों की संख्या भी बढ़ी है।

देशभर में मिले पुरस्कार आशीष हथकरघा में 27 हथकरघा लूम से बेडशीट, चद्दर, टॉवल, दुपट्टा, जूट बैग आदि का निर्माण कर रहे हैं। अच्छी बुनाई कला के लिए यहां के युवा बुनकर दुर्गाशंकर गुर्जर, पारस सैनी, सोनू मीणा, भागचंद सैनी, संतोष बलाई विमला ने जिला और राज्य स्तर पर भी पुरस्कार प्राप्त किए हैं।

टॉवल, साड़ी, बेडशीट की देश के अनेक हिस्सों में डिमांड है। वहीं हथकरघा उद्योग से युवा समेत कई लोग अपने ही गांव में रोजगार भी प्राप्त कर रहे हैं, जिससे इनका पलायन भी रुक रहा हैं।

हथकरघे से बना रहे आकर्षक कपड़े हथकरघा में सबसे पहला काम ताना बनाने का होता है। धागे को रेशों के माध्यम से कंघी से गुजारते हुए ताना ड्रम पर एक निश्चित चौड़ाई में लंबाई के अनुसार में धागा लपेटा जाता है। अलग- अलग डिजाइन के लिए अलग- अलग रंग के धागों का उपयोग किया जाता है। ताना ड्रम पर ताना पूरा करने के बाद उसे हथकरघे के ताना बीम पर लपेटा जाता है। ताने के धागे 2 लेयर में बंटे होते हैं और डिज़ाइन के हिसाब से इसमें धागे डाले जाते हैं।

हथकरघा मशीन को पेडल से चला कर धागों को ऊपर नीचे उठाया जाता है, जिसे दम बनाना कहते है। इस तरह से दम बनाते हुए शटल के माध्यम से बाने में धागे को डालकर कपड़ा बनाया जाता है और हत्थे के सहारे कपड़े को लपेटा जाता है।

हथकरघा आवां मे कपड़ा बनाते कारीगर।

हथकरघा आवां मे कपड़ा बनाते कारीगर।

प्लास्टिक पॉलिथीन से बनाए जा रहे है बैग प्लास्टिक की थैलियों से होने वाले नुकसान में कमी लाने एवं पर्यावरण प्रदूषण को रोकने की दिशा में भी समिति ने नवाचार किया है।

समिति के चेयरमैन आशीष जैन ने बताया- हमारे यहां पॉलिथीन से बैग बनाने का कार्य शुरू किया है। इस पहल में हथकरघा के माध्यम से जूट और प्लास्टिक की थैलियों से बनी पट्टियों द्वारा रेगुलर काम आने वाले बैग (थैला) बनाए जा रहे हैं।

समिति की ग्रामीण महिला सदस्यों द्वारा ये बैग बनाए जा रहे हैं, जिससे उन्हें स्थानीय स्तर पर ही घरेलू कामकाज के साथ रोजगार के अवसर प्राप्त हो रहे हैं। साथ ही पर्यावरण प्रदूषण से भी बच रहे हैं।

हथकरघा आवां में बनाया गया दूध की वेस्ट थैलियों से बैग।

हथकरघा आवां में बनाया गया दूध की वेस्ट थैलियों से बैग।



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