जैसलमेर। शिकारी पक्षी टॉनी ईगल पर लगाया गया टैग।
जैसलमेर के थार रेगिस्तान में शिकारी पक्षियों की गतिशीलता और पारिस्थितिकी को समझने के निरंतर प्रयासों के क्रम में, एक और शिकारी पक्षी ईगल को टैग किया गया। जैसलमेर के डेजर्ट नेशनल पार्क में गहरे भूरे रंग के चील (टॉनी ईगल) को जीपीएस ट्रांसमीटर लगाया गया
वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के वैज्ञानिक वरुण खेर बताते हैं- इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य थार क्षेत्र में पाए जाने वाले शिकारी पक्षियों जैसे बाज, मृत पशुओं को खाने वाले गिद्धों (स्कैवेंजर वल्चर-मृत भक्षी गिद्ध) की पारिस्थितिकी को समझना है।

टॉनी ईगल पर जीपीएस लगाकर उसे आजाद करते वरुण खैर।
शिकारी पक्षियों पर हो रहा रिसर्च
इस रिसर्च के तहत पहली बार थार क्षेत्र में रैप्टर प्रजातियों पर जीपीएस ट्रांसमीटर आधारित टेलीमेट्री अध्ययन शुरू किया गया है। वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के वैज्ञानिक वरुण खेर ने बताया कि जैसलमेर का डेजर्ट नेशनल पार्क रैप्टर पक्षियों के लिए देश का बहुत ही महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जहां इनकी संख्या देश के अन्य हिस्सों की तुलना में बहुत अधिक है। यह अध्ययन इन प्रजातियों की आवाजाही, निवास स्थान, प्रजनन व्यवहार और खतरों को समझने में मदद करेगा।
पक्षियों की लोकेशन मिलती रहेगी
इसी प्रोजेक्ट के तहत पिछले सप्ताह 1 इजिप्शियन वल्चर और 1 टॉनी ईगल को जीपीएस ट्रांसमीटर लगाए गए हैं। जीपीएस ट्रांसमीटर की मदद से इन दोनों पक्षियों की लोकेशन रिसर्च टीम को मिलती रहेगी, जिससे ग्राउंड पर मॉनिटरिंग करने नें मदद होगी। दोनों पक्षी अभी स्वस्थ हैं और डेजर्ट नेशनल पार्क में विचरण कर रहे हैं। अब एक और ईगल को टैग किया गया है। जिससे इनपर शोध करने में लगातार मदद मिलती रहेगी।
शिकारी पक्षियों के संरक्षण में मिलेगी मदद
इसके लिए 6 प्रमुख प्रजातियों को चुना गया है, जिसमें रेड हैडेड वल्चर, व्हाइट रम्प्ड वल्चर, इजिप्शियन वल्चर, इंडियन वल्चर, टॉनी ईगल और लग्गर फाल्कन भी शामिल है। इन सभी पक्षियों में ट्रांसमीटर लगाने की अनुमति मिल चुकी है। वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के वरुण खेर ने बताया कि-जीपीएस सिस्टम लगाकर शिकारी पक्षियों पर रिसर्च करना अपने आप में एक उपलब्धि रहेगी।

इससे पहले 2 शिकारी पक्षियों पर लगाया गया था जीपीएस ट्रांसमीटर।
जीपीएस में मिलेगी पूरी डिटेल
जीपीएस से यह पता लगा पाएगा कि यह गिद्ध किस मौसम में कहां आते-जाते हैं, उनकी दिनचर्या क्या है, क्या खाते हैं। साथ ही इससे शिकारी गिद्धों के संदर्भ में डेटा एकत्रित हो पाएगा जिससे गिद्ध संरक्षण में एक बड़ी मदद मिलेगी। टेलीमेट्री के साथ-साथ रिसर्च टीम घोंसलों की निगरानी कर रही है, और क्षेत्र में इन पक्षियों को होने वाले खतरों की पहचान भी कर रही है। इससे संरक्षण की दिशा में ठोस कदम उठाने में सहायता मिलेगी। 5 वैज्ञानिक कर रहे प्रोजेक्ट पर काम वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के 5 वैज्ञानिक मिलकर इस प्रोजेक्ट में काम कर रहे हैं। पिछले हफ्ते ट्रांसमीटर लगाने का काम शुरू किया गया है। जीपीएस ट्रांसमीटर आधारित टेलीमेट्री अध्ययन एक शक्तिशाली उपकरण है, जिसका उपयोग वन्यजीवों के व्यवहार, आवास उपयोग और स्वास्थ्य को समझने के लिए किया जाता है। यह अध्ययन संरक्षण प्रयासों, पारिस्थितिक अनुसंधान और मानव-वन्यजीव संघर्षों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
2 प्रकार की तकनीकों का करते है उपयोग वन्यजीव जीवविज्ञानी वन्यजीवों और पक्षियों का अध्ययन और उन पर नज़र रखने के लिए 2 प्रकार की तकनीकों का उपयोग करते हैं, पहला रेडियो-टेलीमेट्री और दूसरा जीपीएस (ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम)।
गिद्धों के लिए महत्वपूर्ण गिद्ध पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे मरे हुए जानवरों को खाकर सफाई करते हैं। उनकी आबादी में गिरावट एक गंभीर चिंता का विषय है, और इस अध्ययन से उनके संरक्षण के लिए महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है।

बॉडी पर लगाया जाता है जीपीएस ट्रांसमीटर।
उत्तराखंड में भी गिद्धों पर अध्ययन शुरू किया जैसलमेर से पहले उत्तराखंड वन विभाग और WLI-इंडिया ने हाल ही में उत्तराखंड में गिद्धों पर एक उपग्रह टेलीमेट्री अध्ययन शुरू किया है। इस अध्ययन में, गिद्धों को जीपीएस ट्रांसमीटर लगाए गए हैं ताकि उनकी गतिविधियों को ट्रैक किया जा सके।
इस अध्ययन में, वैज्ञानिक गिद्धों के प्रवास मार्गों, भोजन के स्रोतों, और उनके आराम करने के स्थानों के बारे में जानकारी एकत्र कर रहे हैं। इसके अलावा, वे शिकार और जहरीले पदार्थों जैसे खतरों की भी पहचान करने की कोशिश कर रहे हैं। यह अध्ययन गिद्धों के संरक्षण के प्रयासों को मजबूत करने में मदद कर सकता है, जैसे कि उनके आवासों की रक्षा करना, उनके लिए भोजन उपलब्ध कराना, और उनके लिए खतरों को कम करना।
कैसे काम करती है तकनीक गिद्धों पर जीपीएस ट्रांसमीटर टेलीमेट्री एक ऐसी तकनीक है जिसमें गिद्धों की गतिविधियों को ट्रैक करने के लिए जीपीएस और सैटेलाइट ट्रांसमीटर का उपयोग किया जाता है। इससे शोधकर्ताओं को गिद्धों के प्रवास पैटर्न, व्यवहार, भोजन की तलाश और खतरों का पता लगाने में मदद मिलती है।

शिकारी पक्षियों पर चलेगा 2 साल रिसर्च।
टेलीमेट्री कैसे काम करती है:
ट्रांसमीटर: एक छोटा, हल्का जीपीएस ट्रांसमीटर गिद्ध की पीठ पर या पंखों पर लगाया जाता है। उपग्रह संचार: ट्रांसमीटर एक उपग्रह को गिद्ध की सटीक भौगोलिक स्थिति (अक्षांश, देशांतर, ऊंचाई) का डेटा भेजता है। डेटा संग्रह: शोधकर्ता उपग्रह से प्राप्त डेटा को डाउनलोड करते हैं और गिद्धों की गतिविधियों का विश्लेषण करते हैं। विश्लेषण: डेटा से शोधकर्ता गिद्धों के उड़ान पथ, आवास उपयोग, भोजन के स्रोतों और शिकार के क्षेत्रों का पता लगा सकते हैं।
जीपीएस ट्रांसमीटर टेलीमेट्री के लाभ
प्रवासन पैटर्न: गिद्धों के प्रवास मार्गों और मौसमी आवासों की पहचान करता है। व्यवहार: भोजन की तलाश, सामाजिक व्यवहार और अन्य गतिविधियों का अध्ययन करने में मदद करता है। खतरे की पहचान: गिद्धों के लिए संभावित खतरों जैसे कि बिजली लाइनों, पवन टर्बाइनों और जहर के स्रोतों की पहचान करता है। संरक्षण: गिद्धों के संरक्षण प्रयासों को निर्देशित करने के लिए डेटा प्रदान करता है। जोखिम मूल्यांकन: गिद्धों के लिए जोखिमों को कम करने और उनके आवासों की सुरक्षा के लिए उपाय करने में मदद करता है।

वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के 5 वैज्ञानिक कर रहे रिसर्च।
Discover more from Kuchaman City Directory
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
Comments