14 अगस्त 1947 को भारत का विभाजन हुआ और सिंध प्रांत, पाकिस्तान में चला गया। यह सिंधी समाज के लिए न केवल भौगोलिक विभाजन था, बल्कि उनकी आत्मा पर गहरा आघात था।
सोचिए, जिस घर में कई पीढ़ियों से रह रहे थे, जहां के हर कोने में यादें बसी थीं, वहां से अचानक निकलने को कहा गया। लोगों को धमकी दी गई – भाग जाओ, वरना मारे जाओगे।
सिंधी परिवारों को मजबूरी में अपना सब कुछ छोड़कर भागना पड़ा। अपना घर, दुकान, खेत-खलिहान, रिश्तेदार, दोस्त – सब कुछ पीछे छूट गया। बस जान बचाकर भारत आ गए।
हर साल 14 अगस्त को ‘सिंध स्मृति दिवस’ मनाते हैं। इस दिन सभी सिंधी एक साथ मिलते हैं, अपनी पुरानी यादों को याद करते हैं। अपनी भाषा और रीति-रिवाजों को जिंदा रखते हैं, और यह सपना देखते हैं कि एक दिन सिंध फिर से हमारे भारत का हिस्सा बने।

14 अगस्त को सिंध स्मृति दिवस के रूप में मनाया जाता है।
विभाजन के समय सिंध छोड़ने वालों की कहानी पढ़िए…
अमरकोट से पाली होते हुए ब्यावर पहुंचे अजमेर के रीजनल कॉलेज से रिटायर्ड फार्मासिस्ट किशन टेवाणी (84) ने विभाजन की दर्दनाक यादों को साझा किया। विभाजन के समय उनकी उम्र मात्र 5 वर्ष थी और वे अमरकोट शहर में रहते थे। हमें केवल इतना कहा गया कि तुम्हें यहां से भाग जाना है। आगे मार-काट शुरू हो गई है। भारत के टुकड़े हो गए हैं। सिंध को छोड़कर जाना है। अपने देश को छोड़कर तुरंत यहां से भाग जाओ, नहीं तो मारे जाओगे।
परिवार ने हैदराबाद से एक ट्रेन का कोच बुक करवाया। बचते-बचते ट्रेन से पाली और फिर ब्यावर पहुंचे। जगह न होने के कारण ट्रेन के डिब्बों के ऊपर बैठना पड़ा। स्टीम इंजन से निकलते अंगारों को झेलते हुए यात्रा की। ब्यावर पहुंचने पर भी कर्फ्यू लगा हुआ था।
किशन टेवाणी ने बताया कि उनके पिता वाधुमल कांग्रेस के नेता थे और पहले से ही अंडरग्राउंड थे। उनका वारंट निकला हुआ था। परिवार के लोग हमें छुपाते हुए लाए। बस कानों में ‘इनको काट दो’ की आवाजें आ रही थीं। सारा सामान, घर और देश को छोड़कर आए थे। बड़ी मुश्किलों से यहां बसना पड़ा। आज भी वतन की याद आती है और वे दृश्य आंखों के सामने घूमते रहते हैं। कुछ लोग आज भी वहां हैं, लेकिन उनकी स्थिति के बारे में कोई जानकारी नहीं है।

बाहर निकलना बिल्कुल मना था अजमेर निवासी टीकमदास कोटवानी ने बताया कि उस समय मेरी उम्र करीब 4 साल की थी। मुझे सिर्फ इतना बताया गया कि यहां पर मारपीट हो रही है और रातों-रात यहां से जाना पड़ेगा। पिता ने बड़ी मुश्किलों से व्यवस्था करके छिपाते हुए लेकर आए थे। पिता की ओर से की व्यवस्था के बाद सभी जोधपुर पहुंच गए थे।
कुछ समय उधर रहने के बाद पिता सदमे में आ गए थे। कर्फ्यू लगा हुआ था। घरों में बंद रहकर रहना पड़ता था। बाहर निकलने के लिए बिल्कुल मना कर दिया था। पिता के जाने के बाद मां ने मजदूरी कर बड़ा किया था।
सिंध से आए बुजुर्गों का सम्मान आज भारतीय सिंधु सभा की ओर से आज सिंध स्मृति दिवस मनाया जाएगा। 70 से ज्यादा उन बुजुर्गों का सम्मान होगा जो सिंध से भारत आए। कार्यक्रम अजमेर के अजय नगर के ईश्वर मनोहर उदासीन आश्रम में होगा। कार्यक्रम में विभाजन की विभीषिका के संस्मरण व सिंध के इतिहास पर चर्चा होगी।
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