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राजस्थान हाईकोर्ट ने पूर्व आईएएस अधिकारी निर्मला मीणा की याचिका खारिज कर दी है, जिसमें उन्होंने सरकार द्वारा दी गई अभियोजन स्वीकृति (प्रॉसिक्यूशन सैंक्शन) रद्द करने की मांग की थी। जस्टिस सुनील बेनीवाल की कोर्ट ने अपने रिपोर्टेबल जजमेंट में कहा कि अभि

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जोधपुर की सबसे पॉश उम्मेद हेरिटेज निवासी याचिकाकर्ता निर्मला मीणा के खिलाफ 2 नवंबर 2017 को एसीबी ने एफआईआर दर्ज की गई थी। उस समय वह जिला रसद अधिकारी के पद पर तैनात थीं। इसमें गेहूं के दुरुपयोग और उनके निर्देश पर अतिरिक्त सप्लाई करके करोड़ों की गड़बड़ी से संबंधित है।

पहले चार्जशीट, क्लीनचिट, फिर दूसरी एफआईआर

मामला सामने आने के बाद विभाग ने भी चार्जशीट जारी की थी। हालांकि, विस्तृत जांच के बाद जांच अधिकारी ने मीणा को बरी करने की सिफारिश करते हुए कहा था कि इनके खिलाफ कोई भी आरोप सिद्ध नहीं हुआ। इसके बाद निर्मला मीणा के खिलाफ एक और एफआईआर दर्ज की गई, जो भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 13(1)(e) और 13(2) तथा आईपीसी की धारा 109 के तहत थी।

पहली एफआईआर के संबंध में जांच एजेंसी ने 30 जनवरी 2023 को सक्षम अदालत के समक्ष निगेटिव फाइनल रिपोर्ट दाखिल की। लेकिन दूसरी एफआईआर में जांच एजेंसी ने बिना अभियोजन स्वीकृति प्राप्त किए चार्जशीट दाखिल कर दी थी। याचिकाकर्ता को पता चला कि प्रिंसिपल सेक्रेटरी (कार्मिक विभाग) और मुख्य सचिव ने अभियोजन स्वीकृति नहीं देने की सिफारिश की थी और प्रस्ताव को तत्कालीन मुख्यमंत्री के पास अनुमोदन के लिए भेजा था।

27 जनवरी 2025 को मिली अभियोजन स्वीकृति

रिट याचिका में कहा गया था कि एक ओर, विभागीय जांच अधिकारी ने बरी करने की सिफारिश की, और दूसरी ओर अभियोजन स्वीकृति के प्रस्ताव को पहले अस्वीकार किया गया था, फिर भी कार्मिक विभाग ने पिछली अस्वीकृति पर विचार किए बिना और रिकॉर्ड पर कोई नई सामग्री के बिना 8 जनवरी के आदेश के माध्यम से अभियोजन स्वीकृति दे दी। अंततः 27 जनवरी 2025 को अभियोजन स्वीकृति जारी की गई। इसी आधार पर निर्मला मीणा ने वर्तमान रिट याचिका दायर की थी।

7 साल की देरी को बताया मनमाना

मीणा के वकीलों ने कोर्ट में तर्क दिया कि वर्तमान मामले में एफआईआर वर्ष 2017 में दर्ज की गई थी और चार्जशीट वर्ष 2018 में दाखिल की गई थी। चार्जशीट दाखिल करने के लगभग 7 साल बाद 27 जनवरी 2025 को दी गई अभियोजन स्वीकृति पूरी तरह से मनमानी है और शक्ति के अनुचित प्रयोग को दर्शाती है। रिकॉर्ड पर उपलब्ध तमाम साक्ष्य के आधार पर चार्जशीट दाखिल की गई थी।

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि पहले अभियोजन स्वीकृति से इनकार किया गया था और इसकी नोट शीट मुख्यमंत्री कार्यालय को भेजी गई थी। इसलिए मामले को फिर से खोलने का कोई औचित्य नहीं था। अभियोजन स्वीकृति आदेश पारित करते समय याचिकाकर्ता की दलीलों पर विचार नहीं किया गया।

सरकार की दलील- करोड़ों रुपए का गेहूं गबन किया, जेल में रहीं

सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता व AAG राजेश पंवार व एडवोकेट मीनल सिंघवी ने कोर्ट में तर्क दिया कि अभियोजन स्वीकृति देने या इनकार करने के आदेश में हस्तक्षेप का दायरा बहुत सीमित है। उन्होंने बताया कि निर्मला मीणा के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी। उनके खिलाफ गबन का गंभीर आरोप लगाया गया है। याचिकाकर्ता, जो उस समय जिला रसद अधिकारी के पद पर तैनात थीं, ने अपनी ताकत और पद का दुरुपयोग किया और करोड़ों रुपये के गेहूं का गबन किया। याचिकाकर्ता लगभग एक महीने तक जेल में रही थीं।

कोर्ट के फैसले के मुख्य बिंदु

जस्टिस बेनीवाल ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपने फैसले में दिए मुख्य बिंदु-

  • पहले इस मुद्दे पर निर्णय लिया कि क्या वर्तमान मामले में पहले अभियोजन स्वीकृति से इनकार किया गया था या नहीं? कोर्ट ने पाया कि नोट-शीट में लिखा गया था- “निर्मला मीणा आईएएस, तत्कालीन जिला रसद अधिकारी, जोधपुर प्रथम के विरूद्ध प्रथम दृष्टया प्रकरण बनना नहीं पाये जाने से धारा 197 दण्ड प्रकिया संहिता के तहत प्रदत शक्तियों के अनुसरण में निर्मला मीना, आईएएस के विरूद्ध आईपीसी की विभिन्न धाराओं में सक्षम कोर्ट में अभियोग नहीं चलाये जाने हेतू अभियोजन की मनाही हेतु प्रस्तुत है।”
  • कोर्ट ने कहा कि उपर्युक्त नोट-शीट का अवलोकन और जवाब में की गई दलीलों से यह राय है कि हालांकि याचिकाकर्ता के खिलाफ अभियोजन स्वीकृति नहीं देने की सिफारिश करते हुए नोटिंग दर्ज की गई थी, लेकिन रिकॉर्ड पर कुछ भी ऐसा नहीं है, जो यह सुझाव दे कि इस सिफारिश को कभी सक्षम प्राधिकारी द्वारा स्वीकार किया गया था। सरकार ने बाद में प्रस्तुत किया कि अभियोजन स्वीकृति देने से इनकार करने का कोई औपचारिक आदेश जारी नहीं किया गया था और नोटिंग आंतरिक विचार-विमर्श और पत्राचार का हिस्सा बनी रही।
  • कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता भी सक्षम प्राधिकारी द्वारा अभियोजन स्वीकृति देने से इनकार करने का कोई औपचारिक आदेश का कोई भौतिक साक्ष्य प्रस्तुत करने में विफल रही है। इससे स्पष्ट है कि अभियोजन स्वीकृति कभी अस्वीकार नहीं की गई थी।
  • कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा दायर रिट याचिका में कोई ठोस आधार नहीं है, इसलिए इसे खारिज किया जाता है। इसके साथ ही सभी लंबित आवेदन, यदि कोई हो, भी निस्तारित माने जाएंगे।



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