ये दर्द है जयपुर के हरमाड़ा निवासी पवन सैनी का। ऐसे कई परिवार हैं, जिनके परिवार पाकिस्तान में पले आतंकियों की गोली का शिकार हो गए। एशिया कप में भारत-पाकिस्तान के बीच रविवार को खेले जाने वाले क्रिकेट मैच से पहले भास्कर टीम ने ऐसे पीड़ित परिवारों से बातचीत कर उनका दर्द जाना।
वैष्णो देवी के दर्शन कर लौटते समय हमला हुआ था पवन सैनी पिछले साल जून में अपनी पत्नी ममता और करीब 2 साल के बच्चे किट्टू के साथ माता वैष्णो देवी के दर्शन करने गए थे। लौटते वक्त शिव खोड़ी के पास इन्होंने मंदिर में दर्शन किए और बस में बैठकर कुछ किलोमीटर ही चले थे। रियासी मोड़ के पास आर्मी की ड्रेस में खड़े आतंकियों ने उनकी बस पर ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं। बस गहरी खाई में जा गिरी। फिर भी आतंकी गोलियां बरसाते रहे। इससे उनकी पत्नी और बच्चे की मौत हो गई।

पवन सैनी अपने बेटे किट्टू और पत्नी ममता के साथ। (फाइल फोटो)
पवन सैनी ने बताया कि परिवार आज भी उसे हादसे को नहीं भूल पाया है। किट्टू की याद में उसकी दादी दिन-रात आंसू बहाती हैं। कमरे में लगी उसकी तस्वीर को देखकर बार-बार फरियाद करती हैं कि उनका किट्टू आएगा और उनकी छाती से लग जाएगा।
उन्होंने कहा- इतने बड़े आतंकी हमले के बाद भी अगर देश की राष्ट्रीय टीम पाकिस्तान के साथ क्रिकेट मैच खेलती है तो इससे उनके जख्म फिर से हरे हो गए हैं। सरकार को चाहिए कि इस तरह क्रिकेट मैच खेल कर पीड़ितों की तकलीफों को बढ़ाने की बजाय पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को जड़ से खत्म करे। तभी पीड़ित परिवारों और आतंकी हमले में मारे गए लोगों की आत्मा को शांति मिलेगी।

अपने बेटे किट्टू के साथ पवन सैनी।
भाई-भाभी, बेटी और दोहिते को खोया चौमूं (जयपुर) की पांच्यावाला ढाणी के राजेंद्र प्रसाद सैनी, उनकी पत्नी ममता सैनी, उनकी भतीजी पूजा और दोहिता किट्टू बीते साल 6 जून को पहली बार वैष्णो देवी दर्शन को गए थे। 9 जून को परिवार कटरा से वापस लौट रहा था। शिवखोड़ी में दर्शन करने के बाद बस जब रियासी मोड़ पर पहुंची तो पहले से आर्मी ड्रेस में इंतजार कर रहे दो आतंकियों ने बस पर एके-47 से ताबड़तोड़ फायरिंग शुरू कर दी। इस हमले से बैलेंस बिगड़ते ही बस खाई में गिर गई। आतंकी फिर भी गोलियां दागते रहे।

शिवखोड़ी (जम्मू) में दर्शन करने के बाद रियासी मोड़ पर आतंकवादियों ने बस पर ताबड़तोड़ फायरिंग की थी। हादसे में राजेंद्र सैनी, उनकी पत्नी ममता, बेटी पूजा और दोहिते की मौत हो गई थी।
हादसे में राजेंद्र सैनी, उनकी पत्नी ममता, बेटी पूजा और दोहिते की मौत हो गई थी। परिवार में अब राजेंद्र के दो बेटे और एक बेटी ही बचे हैं। बड़े बेटे ने पढ़ाई छोड़कर पिता का कपड़ों की दुकान संभाल ली है ताकि छोटे भाई बहन की पढ़ाई डिस्टर्ब न हो। चौमूं में जब हमने उनसे बात करनी चाही तो बेटी भावुक होकर अंदर चली गई।
छोटे बेटे लकी ने मायूसी से कहा कि सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि जिस टीम के साथ मैच खेल रहे हैं उनके हाथ देश के नागरिकों के खून से सने हैं। ऐसे आयोजनों से हमारे दिल पर क्या बीतती है यह हम ही जानते हैं। मां-बाप, नए घर की खुशियां, बेटी की नौकरी और परिवार की भलाई के लिए दर्शन करने गए थे। आतंकियों की गोली ने एक पल में हमारी सारी खुशियां छीन ली।

राजेंद्र के छोटे भाई ओमप्रकाश सैनी कहते हैं- उदयपुर के कन्हैयालाल आतंकी हमले में मारे गए। उनके बेटों को सरकारी नौकरी मिली, लेकिन हमारे बच्चों को मुआवजे के नाम पर तसल्ली देकर अकेले संघर्ष करने को छोड़ दिया गया। आज भी परिवार संघर्ष कर रहा है। सरकार हमारी सुनने की बजाय दुश्मन देश के साथ क्रिकेट मैच खेल रही है।
इससे ज्यादा विरोधाभास और क्या हो सकता है। हम तो यही कहेंगे कि सरकार क्रिकेट मैच में खर्च होने वाले रुपयों से आतंकी हमलों में अपनों खो चुके लोगों की मदद करे तो ही हमें सुकून मिलेगा।
इलाज के लिए घर तक बेचना पड़ा जयपुर के पठानों का चौक निवासी तबरेज अपनी पत्नी और परिवार के अन्य सदस्यों के साथ बीते साल मई में कश्मीर घूमने गए थे। 18 मई को 45 लोगों का ग्रुप रात करीब 9.30 बजे अनंतनाग से पहलगाम पहुंचा था। एक कैंप रिसॉर्ट में परिवार डिनर कर रहा था। तभी आतंकियों ने एके-47 से गोलियां दागनी शुरू कर दी। हमले में कुल 17 गोलियां चलीं। तबरेज को दाईं आंख में लगी गोली नाक के हिस्से को चीरती हुई बाईं आंख से बाहर निकल गई। उनकी पत्नी फरहा खान के दाएं कंधे में धंसी गोली भी पार हो गई।

पहलगाम में आतंकवादियों की गोलियों का शिकार हुए प्रॉपर्टी डीलर तबरेज खान को अपनी आंख गंवानी पड़ी थी।
हादसे में तबरेज की दाईं आंख पूरी तरह खराब हो गई, जबकि दूसरी आंख की विजिबिलिटी 10% ही बची है। मई 2024 से सितंबर 2025 तक तबरेज के इलाज में 20 लाख रुपए से ज्यादा खर्च हो चुके हैं।
फरहा कहती हैं- हादसे के बाद से ही तबरेज पूरी तरह परिवार पर आश्रित हो गए हैं। घर से बाहर जाने के लिए भी परिजनों को साथ ले जाना पड़ता है। 20 दिन बाद दोबारा ऑपरेशन होना है। कंधे की सर्जरी के बाद मेरी जिंदगी पहले जैसी नहीं है। बच्चों को खिला-पिला नहीं पाती। घर के काम नहीं कर पाती।

बस से उतर कर इस रिसॉर्ट में खाना खाने जा रहा था परिवार। इस दौरान आतंकियों ने गोली मारी।
तबरेज के भाई आरिफ खान कहते हैं- जिस देश में जन्म लेने वाले आतंकियों ने हमारी जिंदगी को नर्क बना दिया उस देश के साथ किसी भी तरह का रिश्ता रखना हम पीड़ितों के साथ नाइंसाफी है। सिर्फ पैसा कमाने के लिए अपने देश के नागरिकों की तकलीफ को भुला देना सही नहीं है। लीजेंड टूर्नामेंट में सीनियर खिलाड़ियों ने भी पाकिस्तान से मैच खेलने से मना कर दिया था तो भारतीय टीम, बीसीसीआई और भारत सरकार की ऐसी क्या मजबूरी है?

तबरेज और उनकी पत्नी कहते हैं- हम रोज पाकिस्तान के आतंकवाद के जख्मों के साथ जी रहे हैं। जिंदगी बदतर हो गई है। कोई सरकार मदद को नहीं आई। हमें हमारे हाल पर छोड़ दिया। पहला चेक 2 लाख 21 हजार का मिला। इसके अलावा न तो कोई सरकारी मदद मिली न कोई संविदा पर नौकरी। इलाज भी हम अपना घर बेचकर करवा रहे हैं। ऐसे में पाकिस्तान से क्रिकेट मैच खेलना हमारे घावों को कुरेदने जैसा है।
जून 2024 में हुए आतंकी हमले की जिम्मेदारी कई आतंकी संगठनों ने ली लेकिन बाद में इनकार कर दिया था।
द रेसिस्टेंस फ्रंट (TRF): लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के इस सहयोगी संगठन ने हमले के तुरंत बाद सोशल मीडिया (टेलीग्राम) पर जिम्मेदारी ली और पर्यटकों पर आगे के हमलों की धमकी भी दी। हालांकि, कुछ घंटों बाद ही TRF ने अपना दावा वापस ले लिया। भारतीय पुलिस और खुफिया एजेंसियों के अनुसार, TRF ही इसके पीछे का मुख्य संगठन माना जा रहा है।
पीपुल्स एंटी-फासिस्ट फ्रंट (PAFF) और रिवाइवल ऑफ रेसिस्टेंस: ये दोनों जैश-ए-मोहम्मद (JeM) से जुड़े समूह हैं। इन दोनों ने भी शुरुआत में सोशल मीडिया पर हमले की जिम्मेदारी ली, लेकिन बाद में इनकार कर दिया।
जांच और अन्य विवरण : जम्मू-कश्मीर पुलिस ने हमले को LeT से जोड़ा है, जबकि NIA (नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी) ने जांच संभाली है। सितंबर 2024 तक 50 से अधिक संदिग्धों को हिरासत में लिया गया था।
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