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राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्रसिंह भाटी और जस्टिस दिनेश मेहता की बेंच ने सरकार के अधिकारियों की लापरवाही पर जताई नाराजगी।
प्रदेश की न्यायालयों के लिए मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने को लेकर पिछले साढ़े चार साल में राजस्थान हाईकोर्ट ने अलग-अलग स्तर पर 13 बार सरकार को निर्देश जारी किए, लेकिन समाधान नहीं निकला। इसे गंभीरता से लेते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस डॉ. पुष्पेंद्र
दरअसल, बांसवाड़ा बार एसोसिएशन की ओर ये दायर याचिका में छह अन्य मामले जुड़े हैं और इस पर सोमवार को सुनवाई हुई। इसमें अधिवक्ताओं ने कोर्ट को बताया कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने कई बार कहा है कि न्यायालयों के लिए भवन और मूलभूत सुविधाएं, परिवादियों व अधिवक्ताओं और जजेज के लिए मूलभूत सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं है। लेकिन केंद्र और राज्य सरकार द्वारा न सिर्फ इसकी अनदेखी की जा रही है, बल्कि कोर्ट को ही सिर्फ आश्वासन दिए जा रहे हैं।
कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने कहा कि राज्य के महाधिवक्ता और एएसजी अब तक किए गए कार्यों के बारे में बताएं, बल्कि उन अधिकारियों की भी सूची अगली सुनवाई से पहले कोर्ट को उपलब्ध कराएं तथा यदि उनके द्वारा कार्य नहीं किया गया है, तो उनके खिलाफ क्या कार्यवाही की गई, वो भी बताएं।
कोर्ट में यह भी सामने आया कि, नए जिले बन गए हैं, लेकिन वहां न्यायालयों के लिए इमारत नहीं बनी है। इनमें जैसलमेर, बांसवाड़ा, भीलवाड़ा, जोधपुर जिला कोर्ट, आबू रोड, राजगढ़ व अजमेर में यह समस्या बहुत है।
कोर्ट ने साफ कहा है कि राज्य और केंद्र सरकार की बार-बार गलती से न्याय के काम में दिक्कत हो रही है। अब सरकार के बड़े अधिकारी महाधिवक्ता और सॉलिसिटर जनरल के जरिए बताएं कि अब तक क्या किया है और आगे क्या करने का प्लान है। जो अधिकारी कोर्ट के आदेश नहीं मान रहे, उनकी लिस्ट भी देनी होगी और बताना होगा कि उनके खिलाफ क्या कार्रवाई की जाएगी।
मामले में अगली सुनवाई 26 अगस्त को निर्धारित की गई है। कोर्ट ने कहा है कि अगर उचित जवाब नहीं मिला तो वे उन अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेंगे जो काम नहीं कर रहे।
174 जगह जमीन के मामले लटके पड़े हैं
हाईकोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. सचिन आचार्य ने बताया कि न्यायालय भवन और न्यायिक आवास के लिए पूरे प्रदेश में 174 जगह जमीन के मामले अलग-अलग स्तर पर राज्य सरकार में अभी भी अटके हुए हैं। जबकि, मई 2024 में ही यह तय हो गया था कि न्यायालय भवनों के लिए जमीनों के मामले छह महीने में हल हो जाएंगे। जिसका मुख्य सचिव व अन्य अधिकारियों द्वारा भी अनुमोदन किया गया था। लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ। इनमें 21 मामले राज्य स्तर पर, 23 मामले निदेशक, स्थानीय निकाय में और 130 मामले कलेक्टर के पास लटके हुए हैं।
सरकार से पैसे की मंजूरी नहीं मिल रही
न्यायालय और जजों के घर बनाने के लिए 324.29 करोड़ रुपए की मंजूरी की जरूरत है, लेकिन राज्य सरकार ने अभी तक स्वीकृति नहीं दी है। मई 2024 में कहा गया था कि 40 करोड़ रुपए देंगे, लेकिन अभी तक सिर्फ 10 करोड़ रुपए की मंजूरी दी है। बाकी 30 करोड़ रुपए अभी भी रुके हुए हैं।
पुराने प्रोजेक्ट में भी दिक्कत
जो इमारतें बन रही हैं, उनमें भी 59.28 करोड़ रुपए की दोबारा मंजूरी चाहिए। ऐसा इसलिए क्योंकि सरकार मंजूरी देने में 2-4 साल लगा देती है और इस बीच सामान महंगा हो जाता है। सरकार का अपना नियम है कि हर साल 7% महंगाई बढ़ाकर पैसे देने चाहिए।
वकीलों के लिए हॉल नहीं बन रहा
वकीलों के हॉल और चैंबर बनाने के लिए 85.04 करोड़ रुपए की जरूरत है, लेकिन मंजूरी नहीं मिली। तिजारा, रायसिंहनगर, संगोद जैसी जगहों पर कोर्ट भवन तो बन गया, लेकिन वकीलों के हॉल के लिए 39.37 करोड़ रुपए की मंजूरी अभी भी नहीं मिली।
वर्ष 2020 से अब तक क्या हुआ
यह मामला दिसंबर 2020 से चल रहा है। कोर्ट ने कई बार कहा है लेकिन सरकार ने ठीक से काम नहीं किया। मार्च 2025 में कोर्ट ने कहा था कि मुख्य सचिव और अन्य अधिकारी तीन महीने में काम पूरा करें। मई 2025 में कोर्ट ने कहा कि महिलाओं के लिए टॉयलेट, छोटे बच्चों की देखभाल की जगह जैसी जरूरी चीजें भी बनाई जाएं।
उल्लेखनीय है कि इससे पहले गत 8 मई को हुई सुनवाई में भी यह तथ्य सामने आया था कि सरकार द्वारा लोगों को न्याय की पहुंच प्रदान करने के लिए जरुरी मुद्दों को हल करने का कोई वास्तविक प्रयास नहीं किया गया। उस दौरान अधिवक्ता ने दस्तावेजों का संकलन प्रस्तुत करते हुए कोर्ट को बताया गया कि सरकार द्वारा 15 अप्रैल की कार्यवाही केवल आंखों में धूल झोंकना है।
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