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जैन समाज के रथोत्सव के दूसरे दिन रात में गरबा डांडिया खेला गया।
डूंगरपुर में जैन समाज के रथोत्सव के दूसरे दिन रात में गरबा डांडिया खेला गया। महिलाएं, पुरुष और युवाओं में डांडिया को लेकर जबरदस्त उत्साह दिखा। आधी रात को गरबा के साथ गैपसागर की पाल से दोनों रथ लेकर मंदिरों में भंडार किया गया। जबकि घाटी मंदिर से गाजे
जैन समाज के पर्यूषण पर्व की समाप्ति पर 3 दिवसीय रथोत्सव के तहत रात्रि में गैपसागर की पाल पर डांडियों की धूम रही। वहीं दिन भर रथों में विराजित देव प्रतिमाओं के दर्शन के लिए लोगों की भीड़ लगी रही। गैपसागर की पाल पर देर रात तक गेर और भुलमणी पर युवक और युवतियों की टोलियां भगवान की स्तुति में नाचते रहे। श्रद्धालुओं ने पूजा अर्चना की। डांडिया नृत्य के बाद रात 12 बजे दोनों रथ वापस शहर की ओर रवाना हो गए। कोटडिया मंदिर का रथ भंडार किया गया। मामा-भानजा मंदिर का रथ 2 घंटे माणक चौक में रहा। वहां भी श्रद्धालुओं ने डांडिया नृत्य का लुत्फ लिया। इसके बाद रथ को माणक चौक से फौज का बड़ला होते हुए घाटी स्थित मामा-भानजा मंदिर ले जाकर भंडार किया गया। दूसरी ओर फौज का बड़ला उण्डा मंदिर से रथ निकाला गया जो गैपसागर की पाल पर पहुंचा।
पीठ के रथोत्सव की धूम पीठ कस्बे में रथोत्सव का यह पर्व सदियों से चला आ रहा है। काष्ठ का 200 वर्ष पुराना रथ देखकर हर कोई हैरत हो जाता है। भारी भरकम दो मंजिला रथ की कारीगरी बेहद अद्भुत है। रथ पर राजा का दरबार, ऐरावत हाथी, घोड़े, मृदंग बजाते युवक, ढोल बजाते लोग के साथ काष्ठ की विभिन्न कलाकृतियां हैं। रथ को 200 वर्ष जैन समाज के पूर्वजों ने वागड़ के ही सेमलिया गांव के भोगीलाल सुथार की मदद से तैयार कराया था। रथ की कारीगरी पीढ़ियों से इस पर्व को खास बनाती आ रही है। पीठ कस्बे में रथ को जनजाति समुदाय के लोग पीढ़ियों से उठाते हुए आए हैं। जैन समाज जिसे रथ कहता है, उसे जनजाति समुदाय देव रवाडी के नाम से पूजता है। हर साल भगवान को चढ़ाने के लिए फलों का राजा आम भी कहीं न कहीं से पहुंचता है। रथोत्सव की इस परंपरा के साथ ही तीर्थंकर भगवान को आम गुच्छ चढ़ाया जा रहा है।
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