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राजस्थान हाईकोर्ट ने भीलवाड़ा के एक सामुदायिक झगड़े के मामले में 6 आरोपियों को धारा 307 (हत्या का प्रयास) के आरोप से राहत दी है। इस मामले में कोर्ट ने 26 अगस्त को फैसला सुरक्षित रखा था। बुधवार को जस्टिस संदीप शाह ने अपना फैसला सुनाया। इसमें कोर्ट ने

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मामला 29 अप्रैल 2022 की रात 1:30 बजे भीलवाड़ा के सुभाष नगर थाने में दर्ज हुआ था। जिसमें शिकायतकर्ता मुस्ताक सिलावट ने बताया था कि वह अपने भाई समीर और दोस्त आवेश के साथ कृष्णा हॉस्पिटल से बागर हॉस्पिटल की तरफ मोटरसाइकिल से जा रहा था। रास्ते में उन्होंने देखा कि 15-20 लोग मारुति कॉलोनी के 2-3 लोगों को मार रहे हैं। जब वे रुके तो इन लोगों ने उन्हें भी लाठी और पत्थरों से मारा।

कोर्ट ने माना- अचानक हुई लड़ाई में हत्या का इरादा नहीं

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में लिखा कि यह कोई पूर्व नियोजित अपराध नहीं था, बल्कि अचानक हुई लड़ाई का मामला है। पीड़ित मुस्ताक की मौजूदगी भी वहां संयोग से थी। जस्टिस शाह ने कहा कि इतने सारे लोग मौजूद होने के बाद भी पीड़ित के शरीर पर केवल सिंपल इंजरी होना यह दर्शाता है कि आरोपियों का हत्या का इरादा नहीं था।

कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि सभी चोटें कुंद हथियार (blunt weapon) से लगी हैं और सिर पर लगी चोट को छोड़कर बाकी चोटें शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर नहीं हैं। यहां तक कि सिर की चोटों में भी एक ही जगह बार-बार मारने का सबूत नहीं मिला। डॉक्टर अनुपम बंसल की रिपोर्ट के अनुसार मुस्ताक को कुल 9 चोटें आई थीं, जो सभी सिंपल नेचर की थीं।

पुलिस जांच में मिले सबूत अपर्याप्त

पुलिस ने याचिकाकर्ता जयशंकर शर्मा से धारा 27 के तहत एक लाठी बरामद की थी। लेकिन कोर्ट ने माना कि गांव के लगभग हर घर में लाठी होती है और सिर्फ लाठी का मिलना आरोपियों को अपराध से जोड़ने के लिए पर्याप्त नहीं है। पुलिस ने मुस्ताक सिलावट, मोहम्मद आवेश, मोहम्मद रिहान, समीर सिलावट, रिहान सिलावट, शाहिद निलगार, शाहरुख सिलावट, मोहम्मद सादाब और अयान रंगरेज के बयान दर्ज किए थे।

दिलचस्प बात यह है कि सभी गवाहों ने कहा था कि उन्हें पता नहीं था कि मुस्ताक पर हमला किसने किया। बाद में किसी ने उन्हें बताया कि ये 6 युवक शामिल थे। लेकिन पुलिस यह साबित नहीं कर पाई कि गवाहों को कैसे पता चला कि ये लोग ही अपराधी थे।

धारा 307 के लिए जरूरी शर्तें पूरी नहीं

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि धारा 307 के मामले में आरोपी का हत्या प्रयास का इरादा या यह जानकारी होना जरूरी है कि उसका कृत्य मौत का कारण बन सकता है। हरि सिंह बनाम सुखबीर सिंह केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अचानक हुई लड़ाई में धारा 307 का प्रयोग सामान्यतः नहीं होता।

वसंत विठु जाधव बनाम महाराष्ट्र राज्य केस में भी स्पष्ट किया गया था कि धारा 307 के लिए सिर्फ गंभीर चोट का होना जरूरी नहीं है बल्कि आरोपी का इरादा मुख्य है। इस केस में भी कोर्ट ने पाया कि न तो कोई पूर्व शत्रुता थी, न ही किसी तेज धार वाले हथियार का इस्तेमाल हुआ था।

अन्य धाराओं में मुकदमा चलेगा

हाईकोर्ट ने भीलवाड़ा के अतिरिक्त सेशन जज नंबर 2 द्वारा 10 अक्टूबर 2023 को पारित आदेश को केवल धारा 307 के संदर्भ में रद्द किया है। धारा 143 (गैरकानूनी सभा), 341 (गलत तरीके से रोकना), 323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना) और 336 (लापरवाही से जीवन को खतरे में डालना) के आरोप बरकरार रखे गए हैं।

चूंकि ये सभी अपराध मजिस्ट्रेट की अदालत में सुनवाई योग्य हैं, इसलिए हाईकोर्ट ने मामले को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट भीलवाड़ा को ट्रांसफर कर दिया है। सभी 6 आरोपियों को 24 सितंबर को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने का निर्देश दिया गया है।

धारा 307 से इन आरोपियों को मिली राहत

इस मामले में जयशंकर शर्मा, शिवराज गुर्जर, राहुल बैरागी, मोनू सुथार, हिमांशु सेन और सत्तू माली को हाईकोर्ट से आईपीसी की धारा 307 से राहत मिली है। हालांकि, इनके खिलाफ अब भी शेष अन्य धाराओं में लोअर कोर्ट में केस जारी रहेगा। केस में वकील रघुवीर सिंह चुंडावत ने सभी छह आरोपियों की ओर से पक्ष रखा। जबकि, सरकारी वकील नरेंद्र गहलोत और ओपी चौधरी ने राज्य सरकार की तरफ से पैरवी की।



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