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राजस्थान विधानसभा मार्च 1952 में अस्तित्व में आई। इसके बाद से पुरानी विधानसभा यानी टाउन हॉल में ही सत्र की बैठकें हुआ करती थीं। राज्य के सीएम रहते भैरोंसिंह शेखावत के समय नए भवन का निर्माण शुरू हुआ था, हालांकि वे सीएम रहते नए भवन में नहीं पहुंच पाए।
बेड रेस्ट पर करीब तीन माह रहे। इसी दौरान जनसंघ को छोड़ शेष विपक्ष ने राजस्थान बंद का आह्वान किया हुआ था। आंदोलन हुआ, बंद का नेतृत्व कर रहे कम्युनिस्ट नेता व तब के विधायक रामानंद अग्रवाल और प्रो. केदार लगातार मीडिया को फीड कर रहे थे। वरिष्ठ पत्रकार श्याम आचार्य ने प्रश्न पूछ लिया- भैरोंसिंह शेखावत ने आंदोलन को विफल करने में क्या भूमिका निभाई? ब्रीफिंग के बाद जब ये मीडियाकर्मी इसके करीब एक घंटे बाद भैरोंसिंह से मिले और कहा कि रामानंद अग्रवाल कह रहे थे कि आप आंदोलन को विफल कराने में लगे थे। इस पर शेखावत ने तुरंत टोका।
बोले- उन्होंने नहीं, आपने यह प्रश्न पूछा, जिसका उत्तर दिया गया। बत्रा ने बताया कि कोई फोन नहीं, सोशल मीडिया नहीं, टीवी पर अपडेट नहीं, इसके बावजूद शेखावत का नेटवर्क गजब का था कि उन्होंने प्रश्न का एक-एक शब्द हूबहू बोल दिया। यानी उन्हें कोई न तो बरगला सकता था और न ही उनकी नजरों से कुछ छिपा रह सकता था।
सुस्त बहस में चुटकियां
3 मई 1967 से 20 मार्च 1972 तक निरंजन नाथ आचार्य राजस्थान विधानसभा के अध्यक्ष थे। गुलाब बत्रा ने बताया कि इसी दौरान भैरोंसिंह शेखावत और तब के विधायक सतीशचंद्र अग्रवाल के बीच बेहतरीन तालमेल था। निरंजन नाथ आचार्य को भी वे अपनी तिकड़ी का हिस्सा मानते थे। एक सत्र के दौरान सुस्त बहस चल रही थी। बहुत कम सदस्य थे और जो थे वे भी पूरी तरह बोरियत महसूस कर रहे थे।
भैरोंसिंह को पान खाने का शौक था। वे कागज की कुल्हड़ी बनाकर उसी में पीक डाल देते। सदन में भी ऐसा करने लगे ही थे कि आचार्य की नजर पड़ गई। सदन में सुस्ती मिटाने वे एकदम आसन से खड़े हुए और जोर से बोले- माननीय सदस्य, ये क्या कर रहे हैं आप। इस पर हड़बड़ाहट में शेखावत के मुंह का सारा मसाला उनके कुर्ते पर फैल गया। वे खांसते हुए बाहर निकले। पूरे सदन में ठहाका गूंज उठा।
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