राजस्थान के सरकारी हॉस्पिटलों में जन्म लेने वाले बच्चों के बर्थ सर्टिफिकेट हॉस्पिटल में ही बनाए जाते हैं। इन बच्चों के माता-पिता को ये सर्टिफिकेट हॉस्पिटल से छुट्टी (डिस्चार्ज) करने के दौरान ही दिए जाते हैं। लेकिन हॉस्पिटल प्रशासन की तरफ से अधिकांश ज
हाल में मेडिकल हेल्थ डिपार्टमेंट की एक बैठक में जब इसकी रिपोर्ट नेशनल हेल्थ मिशन (NHM) डायरेक्टर ने रखी तो इसका खुलासा हुआ। NHM डायरेक्टर अमित यादव ने रिपोर्ट पेश करते हुए बताया- राज्य में इस साल अप्रैल से अगस्त तक कुल 3 लाख 23 हजार 304 जीवित बच्चों को जन्म के बाद हॉस्पिटल से डिस्चार्ज किया गया।

रिपोर्ट में बताया कि ये तब है कि जब राज्य सरकार ने स्पष्ट आदेश दिए हुए हैं कि इंस्टीट्यूशन डिलीवरी के बाद पहचान पोर्टल के जरिए उन बच्चों को हॉस्पिटल से ही सर्टिफिकेट जारी किए जाए। ताकि बच्चों जन्म, मृत्यु का रियल टाइम डेटा केन्द्र और राज्य सरकार तक पहुंच सके। वहीं इन नवजात बच्चों के माता-पिता को बाद में बर्थ सर्टिफिकेट के लिए निकायों के चक्कर नहीं काटने पड़े।

72 हॉस्पिटल में एक भी बच्चे का नहीं जारी किया सर्टिफिकेट इस रिपोर्ट में NHM निदेशक ने बताया- 214 पीएचसी, सीएचसी, जिला हॉस्पिटल, उप जिला हॉस्पिटल, सैटेलाइट हॉस्पिटल या मेडिकल कॉलेज से अटैच हॉस्पिटल ऐसे हैं, जहां 1 अप्रैल 2025 से 31 अगस्त तक 300 या उससे अधिक जीवित बच्चों ने जन्म के बाद डिस्चार्ज कार्ड जारी किया। लेकिन इनमें से 72 हॉस्पिटल ऐसे हैं। जिनमें एक भी बर्थ सर्टिफिकेट जारी नहीं हुआ।
इसमें अजमेर के नसीराबाद का सरकारी हॉस्पिटल, अलवर के दो (रामगढ़ और काला कुंआ सैटलाइट हॉस्पिटल), बांसवाड़ा के 12, बाड़मेर के 2, ब्यावर के 2, भरतपुर का एक, भीलवाड़ा के 6, बीकानेर के 2, चित्तौड़गढ़ का एक, चूरू के 2, डीडवाना-कुचामन का एक, डीग के 6, डूंगरपुर के 4, जयपुर के 2, जैसलमेर का एक, झालावाड़ के 3, जोधपुर के 7, खैरथल के 2, कोटपूतली-बहरोड़, सीकर, सवाई माधोपुर, सिरोही, राजसमंद का एक-एक और प्रतापगढ़, टोंक, सलूंबर के 2-2 हॉस्पिटल शामिल है।
डीग-फलोदी में सबसे बुरी स्थिति जिलेवार रिपोर्ट देखे तो डीग, फलोदी में सबसे बुरी स्थिति है। यहां तमाम हॉस्पिटलों में क्रमश: 0.34 फीसदी और 1.19 फीसदी बच्चों के ही सर्टिफिकेट पिछले 5 महीने में जारी किए गए हैं। वहीं डीडवाना-कुचामन, बालोतरा, प्रतापगढ़, खैरथल-तिजारा, ब्यावर, बांसवाड़ा और जैसलमेर भी ऐसे जिले हैं जहां 10 फीसदी से भी कम बच्चों के बर्थ सर्टिफिकेट जारी हुए हैं।

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