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आदित्य सागर मुनि महाराज ने कहा- टेक्नोलॉजी स्वयं बुरी नहीं है। उनके अनुसार यदि इसका सही उपयोग किया जाए तो यह बहुत उपयोगी हो सकती है।

टोंक रोड स्थित जैन मंदिर में 1008 आदित्य सागर मुनि महाराज (ससंघ) के सानिध्य में आध्यात्मिक शावक संस्कार शिविर का आयोजन किया जा रहा है। इस दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण विषयों पर अपने विचार व्यक्त किए।

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आदित्य सागर मुनि महाराज ने कहा- टेक्नोलॉजी स्वयं बुरी नहीं है। उनके अनुसार यदि इसका सही उपयोग किया जाए तो यह बहुत उपयोगी हो सकती है। उन्होंने सोनोग्राफी का उदाहरण देते हुए बताया कि इसे गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य की जांच के लिए बनाया गया था। लेकिन लोगों ने इसका दुरुपयोग लिंग परीक्षण के लिए किया।

सभी को अपनी बात रखने का अधिकार- आदित्यसागर मुनिमहाराज

सोशल मीडिया के संदर्भ में उन्होंने कहा कि हाल ही में इंस्टाग्राम वीडियो बिना किसी कारण के ब्लॉक कर दिया गया। उनका मानना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सभी के लिए खुला होना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि सभी को अपनी बात रखने का अधिकार होना चाहिए।

आदित्य मुनि सागर महाराज ने भारत के बीफ निर्यात पर भी नाराजगी व्यक्त की। उन्होंने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि भारत विश्व में दूसरे नंबर का बीफ बेचने वाला देश बन गया है। उनके अनुसार इस तरह से भारत कभी भी विश्व गुरु नहीं बन पाएगा।

उन्होंने कहा कि भारत को विश्व गुरु बनाने के लिए हमें अभी और अच्छा काम करना होगा। उनका मानना है कि भारत को विश्व गुरु बनने के लिए अहिंसा और सत्य की राह पर चलना होगा। उन्होंने यह भी कहा कि जिस स्तर पर अभी हम जी रहे हैं, वह अधूरा सच है।

23 और 24 को संस्कार शिविर का आयोजन होगा। यह संस्कार शिविर माता-पिता और बच्चों के होंगे।

23 और 24 को संस्कार शिविर का आयोजन होगा। यह संस्कार शिविर माता-पिता और बच्चों के होंगे।

आदित्य मुनि सागर महाराज बोले- डिजिटल युग में बच्चों को सही दिशा देना जरूरी

उन्होंने किसानों के लिए कहा- आज के समय में यदि किसान की स्थिति कमजोर हो जाती है, तो उसका असर पूरे समाज पर पड़ता है। इसी तरह, बच्चों और युवाओं की मानसिकता पर भी आधुनिक तकनीक और सोशल मीडिया का गहरा प्रभाव पड़ता है। इसलिए हमें इस डिजिटल युग में बच्चों को सही दिशा देना जरूरी है। फोन और इंटरनेट की मदद से बच्चों को उनके क्षेत्र से संबंधित ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। वे कई तरह की उपयोगी जानकारियां आसानी से हासिल कर सकते हैं।

हालांकि, यह भी सच है कि फोन और डिजिटल प्लेटफॉर्म से बच्चों को समाज से दूर नहीं किया जा सकता। इसलिए हमें अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी कि हम बच्चों को सही रास्ता दिखाएं। डिजिटल मार्केट को पूरी तरह रोकना संभव नहीं है, लेकिन अपनी सुविधाओं और इच्छाओं के अनुसार हम जो सही जानकारी और शिक्षा उन्हें देंगे, वह उनकी सोच और जीवन में सकारात्मक बदलाव ला सकती है। इस तरह, बच्चों और समाज के लिए हम एक सही मार्गदर्शन प्रदान कर सकते हैं जो उन्हें भविष्य में बेहतर और सशक्त बना सके।

23 और 24 को संस्कार शिविर का होगा आयोजन

इससे पहले उन्होंने कार्यक्रम की जानकारी देते हुए कहा- साधुओं का समागम संस्कार की वृद्धि के लिए होता है। जब साधु मिलते हैं तो संस्कार बढ़ते है, संसार घटते हैं। उन्होंने बताया कि आने वाले निकटतम समय में यह 23 और 24 को संस्कार शिविर का आयोजन होगा। यह संस्कार शिविर माता-पिता और बच्चों के होंगे।

उन्होंने बताया- सबसे पहले माता-पिता का संस्कार शिविर है और उसके बाद बच्चों का संस्कार शिविर।क्योंकि जब माता-पिता संस्कारित होंगे तो बच्चे भी संस्कारी होंगे। इसलिए पहले माता-पिता का संस्कार शिविर होगा उसके बाद बच्चों का।संस्कार शिविर की प्रक्रिया में कहीं ना कहीं हम अपने अभिभावक और बच्चों को आने वाले समय में कैसे भारतीय सभ्यता और जैन दर्शन को सुरक्षित रखना है उसके उपक्रम बताएंगे।

1008 आदित्यसागर मुनिराज ने कहा- चातुर्मास के समय श्रावकों को जो बुद्धों की सेवा करते हैं, उन्हें भगवान की भक्ति करने का विशेष अवसर मिलता है।

1008 आदित्यसागर मुनिराज ने कहा- चातुर्मास के समय श्रावकों को जो बुद्धों की सेवा करते हैं, उन्हें भगवान की भक्ति करने का विशेष अवसर मिलता है।

ये होंगे कार्यक्रम

1008 आदित्यसागर मुनिराज ने कहा- चातुर्मास के समय श्रावकों को जो बुद्धों की सेवा करते हैं, उन्हें भगवान की भक्ति करने का विशेष अवसर मिलता है। इस दौरान भक्तांबर महामंडल खास तौर पर बच्चों के लिए आयोजन करता है, जिसमें 23-24 तारीख को दांपत्य संस्कार और बच्चों के संस्कार रखे जाते हैं। इसका उद्देश्य समाज, देश, राष्ट्र और धर्म के संस्कारों को मजबूत करना है। इसके बाद बड़े स्तर पर श्रावक संस्कार शिविर का आयोजन होता है, जो 28 तारीख को शुरू होता है। इस शिविर में प्रवचन, कक्षाएं, भगवान की पूजा, आरती और भक्ति के माध्यम से संस्कार सिखाए जाते हैं ताकि आने वाले 355 दिनों तक श्रावक अपनी साधना को बढ़ा सकें और आध्यात्मिक रूप से जुड़ सकें।

भादव के महीने में जितने व्रत होते हैं, वे साल भर में जितने व्रत होते हैं, उनकी बराबरी करते हैं। इसलिए भादव को विशेष महत्व दिया गया है। यह कोई मनमानी परंपरा नहीं है, बल्कि समय से चली आ रही है। भादव के महीने में सोला कारण भावूल, पंच मेरू, नंदीश्वर, दसलक्षण पर्व जैसे कई व्रत और उपवास होते हैं। ये उपवास और व्रत समाज में आध्यात्मिकता को बनाए रखने में सहायक होते हैं।



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