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उदयपुर संभाग मुख्यालय इन दिनों प्रशासनिक ‘जुगाड़शाही’ का अनोखा नमूना बना हुआ है। यहां विभागों की तैनाती और जिम्मेदारियों का ऐसा घालमेल है कि खुद अफसर भी समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर वे किस विभाग के अधिकारी हैं। यहां खान, टीएडी, वन, आबकारी, एमपीयूएटी ज

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हालात यह हैं कि एक अधिकारी सुबह देवस्थान विभाग में बैठकर वरिष्ठ नागरिक तीर्थ यात्रा का शिड्यूल तय करते हैं और दोपहर को खान विभाग जाकर पूरे प्रदेश से जुड़ी फाइलों की पड़ताल में जुट जाते हैं। किसी अधिकारी को आदिवासी कला, संस्कृति और शिक्षा की जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन उनसे शराब तस्करी रोकने और पूरे प्रदेश में आबकारी कर्मचारियों की जांच कराने का काम भी लिया जा रहा है। यहां तक कि प्रशासनिक ट्रेनिंग संस्थान में पदस्थ अधिकारी अब कृषि विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार का अतिरिक्त चार्ज संभाल रहे हैं। वन विभाग की स्थिति तो और भी उलझी हुई है। संभागीय मुख्यालय पर मुख्य वन संरक्षक (सीसीएफ) का पद मार्च से खाली पड़ा है, लेकिन उसके नीचे के वन संरक्षक (सीएफ) से विभाग चलवाया जा रहा है। यानी सबसे महत्वपूर्ण पद खाली है और पूरे संभाग के जंगलों व वन्यजीवों का काम बिना वैध अधिकार वाले अधिकारी के भरोसे चल रहा है।

उदयपुर, जो आबकारी, खनन और देवस्थान विभाग का मुख्यालय है, वहां प्रशासनिक पदों का यह ‘म्यूजिकल चेयर गेम’ किसी मजाक से कम नहीं। सवाल उठ रहा है कि जब जिम्मेदारियां और तैनाती का यह टकराव यहीं से शुरू होता है, तो प्रदेशभर में इन विभागों का काम कितनी गंभीरता और पारदर्शिता से हो पा रहा होगा।

जिन विभाग मुख्यालयों पर पूरे प्रदेश का जिम्मा, वहीं ऐसे हाल…

देवस्थान अति. आयुक्त : सुबह मंदिर-तीर्थ यात्रा का काम, दोपहर में खनन-बजरी का खनन विभाग में अतिरिक्त निदेशक प्रशासन का पद खाली है। इसका अतिरिक्त चार्ज देवस्थान विभाग के अतिरिक्त आयुक्त अशोक कुमार के पास है। वे आधा-आधा दिन दोनों विभागों में बैठते हैं। खान विभाग के इस पद पर पूरे प्रदेश में जांच, तबादले जैसी जिम्मेदारियां हैं। देवस्थान में कुमार पर वरिष्ठ नागरिक तीर्थ यात्रा के संचालन से लेकर बदलाव तक की जवाबदेही है।

टीआरआई निदेशक : आधा दिन छात्रवृत्ति व संस्कृति-कला, फिर शराब तस्करी पर नजर टीआरआई के निदेशक ओपी जैन को अतिरिक्त आबकारी निदेशक प्रशासन, उदयपुर जोन के प्रभारी और टीएडी विभाग में अतिरिक्त आयुक्त द्वितीय के चार्ज पर भी हैं। यानी आदिवासी कला और छात्रवृत्ति योजनाओं से लेकर प्रदेशभर की आबकारी जांच, तबादले व शराब तस्करी की मॉनिटरिंग उन्हीं के जिम्मे है।

एचसीएम अति. निदेशक : ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट से लेकर कृषि विवि तक लगा रहे हैं दौड़ हरिशचंद्र माथुर लोक प्रशासन संस्थान में अतिरिक्त निदेशक पद पर कार्यरत बंशीधर कुमावत के पास अब महाराणा प्रताप कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (एमपीयूएटी) के रजिस्ट्रार का अतिरिक्त चार्ज भी है। जबकि लोक प्रशासन संस्थान का मूल काम ही प्रदेशभर के अधिकारियों की ट्रेनिंग कराना है।

सीएफ : सीसीएफ का काम संभाल रहे, लेकिन चार्ज नहीं, आदेश सीएफ के नाम से जारी हो रहे वन विभाग में 18 मार्च को हुए तबादलों के बाद से संभागीय मुख्यालय पर सीसीएफ का पद खाली है। सीएफ सुनील छिद्री सीसीएफ के कक्ष में बैठ तो रहे हैं, परंतु उनके पास आधिकारिक चार्ज न होने के कारण आदेश सीएफ के नाम से जारी करने पड़ रहे हैं। इससे उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ व चित्तौड़ जिलों का पूरा वन प्रबंधन ‘अधूरे अधिकार’ पर चल रहा है।

एडीएम मुख्यालय : पहले से तीन जिम्मे, अब पूरे महकमे के निदेशक का भी थमा दिया खान एवं भू-विज्ञान विभाग में पूर्व निदेशक दीपक तंवर के सेवानिवृत्त हाेने के 7 दिन बाद अतिरिक्त चार्ज अतिरिक्त निदेशक खान मुख्यालय (एडीएम) काे दिया गया है। हैरानी की बात यह है कि खान मुख्यालय के जिन अतिरिक्त निदेशक महेश माथुर को यह जिम्मा दिया गया है, उनके पास पहले से दो अतिरिक्त चार्ज हैं। वे अतिरिक्त निदेशक उदयपुर जोन, अतिरिक्त निदेशक पर्यावरण का का जिम्मा भी संभाल रहे हैं। यानी माथुर को अब खुद के पद सहित चार पदों का जिम्मा संभालना होगा।

संयुक्त शासन सचिव आशु चौधरी की ओर से गुरुवार काे जारी आदेश में भी महज खानापूर्ति की गई है। क्योंकि, अतिरिक्त चार्ज के दौरान एडीएम काे सिर्फ चार कार्यों के लिए अधिकृत किया गया है। जबकि, मुख्यालय पर निदेशक के पास पूरे खान महकमे की जिम्मेदारी रहती है।

भास्कर एक्सपर्ट- ताराचंद मीणा, पूर्व कलेक्टर उदयपुर और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी

अधिकारी अतिरिक्त चार्ज के बजाय मूल जिम्मेदारियों पर ज्यादा ध्यान देते हैं

अतिरिक्त चार्ज की पोस्ट पर अधिकारी अच्छी तरह से काम नहीं कर पाते। उनका ध्यान हमेशा अपने मूल पद की जिम्मेदारियों पर रहता है। ऐसे में वे अतिरिक्त चार्ज वाले विभाग के कामों काे गंभीरता से नहीं लेते। काम की अधिकता के चलते अधिकारी अपनी क्षमता के हिसाब से कार्य नहीं कर पाते हैं। अधीनस्थ कर्मचारी भी अधिकारी नहीं होने की वजह से बड़े कामों को टाल देते हैं। कुछ महकमे जनता से जुड़े हुए हैं ताे कुछ विभाग सरकार के रेवेन्यू वाले है।



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