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कोचिंग सेंटर के स्टूडेंट्स जहां रोज 13 घंटे मोबाइल का उपयोग कर रहे हैं। वहीं छोटे बच्चे तीन से चार घंटे घरों में मोबाइल स्क्रीन पर टाइम बिता रहे हैं। नेत्र रोग विशेषज्ञों ने वर्ष 2050 तक एक करोड़ से अधिक बच्चों की आंखों में परेशानी की चेतावनी दी है।

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वहीं नेत्र रोग विशेषज्ञों ने स्कूलों में स्मार्ट क्लास से पढ़ाई कराने को लेकर भी चिंता जताई है। उन्होंने बताया कि स्मार्ट बोर्ड के कारण स्कूल की क्लास में अंधेरा रहता है। यह अंधेरा बच्चों के लिए जानलेवा है। इसके कारण मायोपिया जैसी बीमारी हो रही है।

विश्व दृष्टि दिवस इस बार 9 अक्टूबर को मनाया जा रहा है। इस साल इसकी थीम “लव योर आइज” (अपनी आंखों से प्यार करें) है। इसमें आंखों की देखभाल के महत्व के लिए जागरूक करती है। विश्व दृष्टि दिवस हर साल अक्टूबर के दूसरे गुरुवार को मनाया जाता है।

4 से 16 वर्ष तक के बच्चों के आंखों के विजन कम होने, उनमें मायोपिया बीमारी के लक्षण सहित अन्य परेशानियों पर पढ़ें दैनिक भास्कर में यह स्पेशल स्टोरी–

अब जानें बच्चे क्यों हो रहे हैं शिकार

अजमेर के जेएलएन अस्पताल में नेत्र रोग विभाग के एचओडी डॉ. राकेश पोरवाल ने बताया कि बच्चों को चश्मा लगने में परिजन की सबसे बड़ी भूमिका है। परिजन भले ही डॉक्टर्स को नहीं बताएं, लेकिन हकीकत यही है कि कम उम्र में ही बच्चों को खेलने के लिए हाथ में मोबाइल फोन दे दिया जाता है।

वहीं कोविड के समय ऑनलाइन क्लासेस शुरू हुई, जो अभी भी कई जगह चल रही हैं। ऐसे में बच्चों के हाथों में एक दिन में 13 घंटे मोबाइल रहता है। इसके अलावा कोचिंग सेंटर और स्कूलों में स्मार्ट क्लास चल रही है।

दिनभर मोबाइल और कंप्यूटर की स्क्रीन में देखने से बच्चे मायोपिया के शिकार हो रहे हैं। इसमें दूर की वस्तु साफ नजर नहीं आती। पास का ही साफ दिखाई देता है। एक तरह से कहा जाए तो आने वाले वर्षों में डायबिटीज, ब्लड प्रेशर की तरह ही मायोपिया बीमारी बड़े लेवल पर लोगों को घेर लेगी।

डॉ. पोरवाल ने बताता कि घर पर रहकर बच्चों का स्क्रीनिंग टाइम तीन से चार घंटे चल रहा है। स्कूल में भी स्मार्ट टीवी लगने के कारण लाइट और अंधेरे का एक्सपोजर रहता है। यह अंधेरा बच्चों के लिए जानलेवा है। इसके कारण मायोपिया जैसी बीमारी हो रही है। जिसके चलते हर दो बच्चे में से एक बच्चों को अब चश्मा लग रहा है। चश्मे के बगैर बच्चों को दूर का कुछ नहीं दिखाई देता है।

अस्पताल में बढ़ गए आंखों की परेशानी से आने वाले 4 साल से बड़े बच्चे, रोज आ रहे 30 से ज्यादा बच्चे

कोविड के बाद से 4 से 16 साल तक की उम्र के बच्चों को देखने में परेशानी सहित याददाश्त की कमी के मामले हॉस्पिटल में आ रहे हैं। कोविड से पहले पेरेंट्स 16 साल की उम्र के बाद वाले बच्चों को ही विजन की शिकायत लेकर अजमेर के जेएलएन अस्पताल में आते थे। बच्चों की आंखों की समस्याओं को लेकर आने वाले परिजन हाल ही 4-5 वर्ष में बढ़ गए हैं। इनमें 4 साल की उम्र से बड़े 30 से ज्यादा बच्चे रोजाना आंखों की जांच के लिए आ रहे हैं। अस्पताल के नेत्र रोग विभाग में इन बच्चों की जांच करने पर मायोपिया (दूर का दिखाई नहीं देना) बीमारी सामने आ रही है।

5 वर्ष पहले 95% मरीजों की उम्र 40-45 तक की रहती थी, अब बदल चुका है सिनेरियो अजमेर के जेएलएन अस्पताल में नेत्र रोग विभाग के एचओडी डॉ. राकेश पोरवाल ने कहा कि-

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वर्ष 2020 तक ओपीडी में आने वाले 95% मरीजों की उम्र 40-45 तक की रहती थी। वहीं 5 सालों में कोविड के बाद से सिनेरियो बदल चुका है। अब अस्पताल में रोजाना 50% तक बच्चे आंखों की बीमारी के आ रहे हैं। ऐसे में वर्ष 2050 तक एक करोड़ से अधिक बच्चों के चश्मा लग जाएगा। इस बीमारी से हर दूसरे बच्चे को आंखों की समस्या होगी। ये सभी 4 साल की उम्र से 16 साल की उम्र वाले होंगे।

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अमेरिका गाइडलाइन के मुताबिक- 14 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए मोबाइल खतरनाक

अमेरिका गाइडलाइन के मुताबिक नए नियमों के अनुसार 14 वर्ष से छोटे बच्चों को मोबाइल और लैपटॉप छूना उनके लिए हानिकारक बताया गया है। इंडोर और आउटडोर गेम करवाना जरूरी है। जरूरी होने पर भी 30 मिनट से ज्यादा मोबाइल स्क्रीन टाइम नहीं होना चाहिए।

अस्पताल में आए बच्चों की केस स्टडी पढ़ें…

केस 1- जेएलएन अस्पताल की नेत्र रोग ओपीडी में 8 साल के बच्चे को उसके पिता दिखाने आए थे। बच्चे को दूर का दिखाई देना बंद हो गया था। चेक करने पर उसे मायोपिया बीमारी के लक्षण दिखाई दिए। काउंसलिंग करने पर पता चला कि पिता ने नया मोबाइल खरीदा था। उसका उपयोग बच्चा लगातार करता था। पिता के खेत पर जाने के बाद वह मोबाइल पर गेम खेलता और पढ़ाई भी उससे ही करता था। मोबाइल पर स्क्रीनिंग टाइम ज्यादा होने के कारण उसे दूर का दिखाई देना बंद हो गया। इसके बाद उसे (-6 नंबर) आई साइड का चश्मा लगाया गया। बच्चे को अब मोबाइल से दूर रखकर आउटडोर एक्टिविटी करवाई जा रही है।

केस 2- अस्पताल में 11 साल की लड़की को परिवार लेकर आए थे। उसकी आंखों की जांच करने पर लड़की को (-3 नंबर) का चश्मा लग गया था। काउंसलिंग हुई तो पता चला कि मोबाइल पर लगातार पढ़ाई करने और वीडियो देखते हुए लड़की खाना खाती थी। मोबाइल के बारे में नुकसान बताए तो वह मानने को तैयार नहीं हुई। परिवार के सपोर्ट से काउंसलिंग हुई और अब उसे हर 6 महीने में इलाज दिया जा रहा है।

केस 3- ओपीडी में 5 साल के एक बच्चे को आंखों के इलाज के लिए परिवार लाया। बच्चे को मोबाइल की ऐसी लत लगी कि वह उसके बिना रह नहीं पाता था। उसकी आंखों की रोशनी कमजोर हो गई। जांच में उसे भी मायोपिया बीमारी का पता चला।



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