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सत्ता के साथ कई चीजें चलती हैं, जिनमें खींचतान भी एक है। पिछले दिनों गुजरात से सटे एक जिले में भी ऐसा ही हुआ। पौधरोपण के कार्यक्रम में सत्ताधारी पार्टी के जिला उपमुखिया और किसान मोर्चे के प्रदेश उपमुखिया माला-साफा पहनाने की बात को लेकर मंच पर ही भिड़

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खूब गाली-गलौज हुई। एक दूसरे को जिन-जिन शब्दों से नवाजा वो कई ने सुना। बात जिले से बाहर निकलकर राजधानी तक भी पहुंच गई है। जानकारों के मुताबिक मामला सियासी पावर से जुड़ा है, जो मंच पर सामने आ गया। अंदरखाने भी कई बातें चल रही हैं।

केंद्रीय मंत्री क्यों नहीं लगा पाए जिले में पसंद का कलेक्टर?

सियासत में हर काम हो जाए यह जरूरी नहीं होता। कई बार बड़े नेताओं के छोटे काम भी अटक जाते हैं। सीमावर्ती जिले में एक केंद्रीय मंत्री राजधानी की विकास एजेंसी में लगे एक अफसर को जिले का कलेक्टर लगवाना चाहते थे।

सब तरफ बात हो गई। सब फाइनल हो चुका था, लेकिन जब लिस्ट आई तो केंद्रीय मंत्री की सिफारिश पर कुछ नहीं हुआ। केंद्रीय मंत्री ने अपने नजदीकियों से लेकर कार्यकर्ताओं तक को कह दिया था कि अब फलांजी कलेक्टर होंगे।

सुना है, केंद्रीय मंत्री की सिफारिश को दरकिनार करने के पीछे दो टॉप लेवल के अफसर एकमत हो गए थे। अब यह मामला सियासी गलियारों में चर्चा का मुद्दा बना हुआ है। केंद्रीय मंत्री को भी पूछने वाले परेशान तो कर ही रहे होंगे, लेकिन करने वाला सबसे बड़ा होता है।

अफसर-इंजीनियर किस फरमान से परेशान?

राजधानी में पिछले दिनों हुई बारिश ने सड़कों को उधेड़कर रख दिया। अब राजधानी की सड़कें छलनी होने लगे तो हल्ला मचना स्वाभावकि है, क्योंकि सीधा सवाल सरकार पर आता है।

शहर के विकास की जिम्मेदारी वाली एजेंसी के पास ही सड़कों की जिम्मेदारी है। पिछले दिनों उधड़ी सड़कों पर पैबंद लगे हैं। शहरी विकास एजेंसी में अब बड़े से लेकर छोटे तक सब फील्ड नॉन फील्ड अफसर-इंजीनियर परेशान हैं।

परेशानी का कारण एक फरमान है। इस फरमान के अनुसार सब अफसर-इंजीनियरों को शहर में सड़क पर गड्‌ढा दिखते ही मौके पर ही उसकी कच्ची मरम्मत करने को कहा है।

इसके लिए सबको अपनी गाड़ी में दो-दो कट्टे मिट्टी-गिट्टी के रखने का फरमान सुना दिया है। अब यह काम हर अफसर तो कर नहीं सकता लेकिन बॉस का फरमान है तो मानना ही पड़ेगा।

कार्यकर्ताओं तक नहीं पहुंचीं लहरिया साड़ियां, महिला नेता के खिलाफ शिकायत

अच्छे और मनमोहक परिधानों का शौक इंसान को हमेशा से रहा है। पर्व-त्योहारों पर अलग अलग परिधानों का चलन है। सावन में लहरिया उत्सव अब सियासी रंग ले चुका है।

पिछले दिनों एक बड़े सत्ताधारी ने कार्यकर्ताओं के बीच लहरिया साड़ियां बंटवाने का फैसला किया। इसके लिए सत्ताधारी पार्टी के स्थानीय नेताओं को जिम्मेदारी देकर उन्हें सैकड़ों साड़ियां सौंपी।

एक महिला नेता को भी ढेरों साड़ियां देकर बांटने की जिम्मेदारी दी। महिला नेता को साड़ियां भा गईं और बांटने का इरादा टाल दिया।

जब सब जगह साड़ियां बंटी और महिला नेता की जिम्मेदारी वाले इलाके में साड़ियां नहीं आई तो कार्यकर्ताओं में चर्चा शुरू हुई। बात बड़े नेता तक पहुंची। सुना है महिला नेता की शिकायत टॉप तक पहुंच गई है।

किस पूर्व कलेक्टर आईएएस को मिली चार्जशीट?

पिछले दिनों प्रदेश के मुखिया ने भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों के मामलों में कई अफसरों पर कार्रवाई को हरी झंडी दी। जमीन आवंटन के मामले में एक आईएएस को चार्जशीट देने की मंजूरी दी गई।

आईएएस को चार्जशीट देने का फैसला प्रशासनिक हलकों में चर्चा में है। 2015 बैच के आईएएस को श्रीगंगानगर कलेक्टर रहते जमीन आवंटन से जुड़े मामले में अब 4 साल बाद एक्शन हुआ है।

आईएएस विपक्षी पार्टी के संगठन मुखिया के मंत्री रहते शिक्षा विभाग में रह चुके हैं, फिलहाल पावर महकमे में हैं।

देश की राजधानी से निराश क्यों लौटे पद इच्छुक नेता?

सत्ताधारी पार्टी में इन दिनों सत्ता से दूर नेताओं को आगे कुछ मिलने की उम्मीद है। उम्मीद पर दुनिया कायम है। ऐसे में सत्ताधारी दल के हारे हुए और टिकट कटे हुए नेता भी तो उम्मीद रख ही सकते हैं कि कुछ मिलेगा।

पद पाने के लिए पिछले दिनों कुछ हारे हुए और टिकट कटे हुए नेताओं ने भी लॉबिंग शुरू की। देश की राजधानी में वरिष्ठों से मुलाकात कर मनोकामना बताई। सुना है, दिल्ली में नेताओं की बात नहीं बनी।

उलटे सीख मिल गई कि नए लोगों को आगे आने दीजिए, आपको पहले ही बहुत मिल चुका। इसके बाद देश की राजधानी से निराश होकर प्रदेश की राजधानी लौटने के अलावा नेताओं के पास कोई चारा नहीं बचा था। हालांकि कुछ नेताओं ने अब भी उम्मीद नहीं छोड़ी है।

आरएएस से आईएएस बने अफसर क्यों हुए निराश

सरकार में पिछले दिनों प्रशासनिक फेरबदल हो गए लेकिन कई अब भी इंतजार में है। सबसे ज्यादा इंतजार आरएएस से आईएएस बने 16 अफसरों को है।

प्रमोशन हुए लंबा अरसा हो चुका है लेकिन वहीं काम कर रहे थे जहां पहले थे। अब आईएएस बने हैं तो पद भी तो नया होना चाहिए। नए प्रमोटी आईएएस सबसे बड़े दफ्तर भी गए, लेकिन वहां से उन्हें अभी मौजूदा पदों पर ही काम करने को कह दिया है।

काफी दिन चक्कर काटने के बाद इस जवाब से निराशा होना स्वाभाविक है, लेकिन कहते हैं कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती, इसलिए प्रयास अभी भी जारी हैं।

सुनी-सुनाई में पिछले सप्ताह भी थे कई किस्से, पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

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