नगर निकायों के चुनावों को लेकर तारीख भले ही तय नहीं है, लेकिन उदयपुर नगर निगम के 80 वार्डों के परिसीमन की अधिसूचना के बाद सियासी राजनीतिक हलचल तेज हो गई है। नई सीमाओं के बाद चुनाव लड़ने वालों के लिए भी नए लोग और नई टीम होगी।
उसी एक्सरसाइज पर चुनाव लड़ने की इच्छा रखने वाले भाजपा से लेकर कांग्रेस सहित अन्य ने अंदर ही अंदर अपना काम शुरू कर दिया है। सबसे बड़ी बात यह है कि राजनीतिक रूप से उदयपुर का मेयर अब पावरफुल होगा। क्योंकि चार विधानसभा क्षेत्र की सीमाएं बोर्ड में होगी।
नगर निगम के वार्ड 70 से बढ़कर 80 हो गई और इसमें कई पंचायतें और दूरदराज के इलाके जुड़े है। ऐसे में वार्ड की सीमाएं भी बढ़ी है और कई नए इलाके जुड़े तो कुछ इलाके कट गए है। ऐसे में चुनाव लड़ने का मन बना चुके कार्यकर्ताओं ने नए वार्ड का नक्शा हाथ में ले लेकर काम शुरू कर दिया है। ऐसे कार्यकर्ता सबसे पहले उन इलाकों में जमीन तलाश रहे हैं, जो उस वार्ड में नया जुड़ा है। वहां की राजनीतिक कुंडली और जातिगत समीकरण को लेकर सब कुछ समझ रहे हैं, ताकि चुनाव के समय पूरी तैयारी पहले से हो जाए।
अब समझिए मेयर कैसे पावरफुल होगा
- अब तक 70 वार्ड शहरी क्षेत्र के ही थे। उसमें भी उदयपुर शहर विधानसभा और ग्रामीण विधानसभा ही आती थी। ग्रामीण विधानसभा के करीब 20 वार्ड आते थे। तब जो भी मेयर होता था, उससे दो विधानसभा के विधायक जनता के काम के लिए मिला करते थे।
- अब वार्डों की संख्या 70 से 80 होने के बाद चार विधानसभा हो गई है। इनके इलाके नगर निगम में आते हैं। ऐसे में अब मेयर के पास चार विधानसभा के विधायक अपने इलाके में नगर निगम से काम कराने के लिए प्रयास करेंगे। ऐसे में मेयर की ताकत बढ़ जाएगी। मेयर का इन विधानसभा क्षेत्र के इलाकों में अपना प्रभाव बढ़ेगा।

वार्ड बढ़ने में नए इलाकों की गणित समझे
- गोगुंदा विधानसभा की बड़गांव पंचायत समिति की ग्राम पंचायतों में भाजपा मजबूत रहती है। जो पंचायतें नगर निगम में आईं, उसमें भाजपा के बहुत इलाके हैं। लेकिन वहां पर पंचायत समिति में प्रधान बनाने के लिए भाजपा का बेस प्रभावित हुआ है।
- गिर्वा पंचायत समिति की कुछ पंचायतें जो आदिवासी क्षेत्र से जुड़ी हैं, उनके नगर निगम में आने से भाजपा का बेस प्रभावित होगा। वहां पर भारत आदिवासी पार्टी और कांग्रेस का सियासी गुणा भाग बढ़ेगा।
- उदयपुर शहर के जो वार्ड होंगे, वहां पर चुनाव लड़ने वाले भाजपा और कांग्रेस के उम्मीदवारों के लिए नई सीमाओं में ताकत बढ़ाने में पसीना आएगा। वैसे जिनका संगठन बूथ पर अच्छा काम करेगा। उसका पलड़ा भारी होने की संभावनाएं बढ़ती है।
मेयर और पार्षदों की लॉटरी के बाद खुलकर करेंगे मेहनत
असल में वार्ड सीमा तय होने के बाद अब सबको इंतजार है, वार्डों के आरक्षण और मेयर पद के आरक्षण की लॉटरी का। ये फाइनल होने के बाद चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे कार्यकर्ता खुलकर मेहनत करेंगे। उन्होंने वर्किंग शुरू कर दी लेकिन वार्ड आरक्षण के बाद यह उनके लिए साफ हो जाएगा कि उनको चुनाव कहां से लड़ना है। इसके लिए वे पार्टी संगठन में और जमीनी स्तर पर मेहनत करेंगे।

एक्सपर्ट बोले- कांग्रेस कमजोर होगी उदयपुर में राजनीतिक एक्सपर्ट लाल कुमार चुग ने बताया- कुछ को छोड़कर सब वार्डों में मतदाताओं की संख्या बराबर रखी है। पहले वाले इलेक्शन में एक वार्ड में मतदाता की संख्या 3 हजार थी तो दूसरे की 16,000 थी। इस बार एक वार्ड को छोड़कर सभी वार्ड में मतदाताओं की संख्या समानांतर ही रखी है। जिन वार्डों में एक जाति का दबदबा था। वहां परिसीमन के बाद वार्ड टूटने से उनका दबदबा भी बिखरते दिख रहा है, जिससे समीकरण बदलेंगे।

उदयपुर में परिसीमन के बाद नए वार्डों का मैप इस तरह होगा।
भाजपा में वार्डों की गणित को समझने वाले पूर्व पार्षद दिनेश गुप्ता ने बताया कि भाजपा का बरसों से सिम्पल फॉर्मूला है, सब जगह सक्षम कार्यकर्ता हैं। उनमें से जिसको मौका मिलेगा उसके साथ टीम काम करेगी। वार्ड बदलने और सीमा बढ़ने से कोई फर्क नहीं पड़ता है। गुप्ता कहते हैं कि पार्टी की मजबूत फौज काम करती है तो उनका काम करने का दायरा बढ़ जाएगा। इससे ज्यादा कुछ नहीं होगा।
कांग्रेस में डेटा रिव्यू करने वाले पूर्व पार्षद अरुण टांक कहते है कि नए वार्ड की तस्वीर के बाद पार्टी मजबूत होगी। वे कहते हैं कि पार्टी के युवा और कार्यकर्ता की टीम भी मजबूत है। वह नए वार्डों के विस्तार के बाद जनता की तकलीफों को लेकर जनता के बीच रहेगी। इसके साथ ही नगर निगम के स्ट्रक्चर को भी सरकार को मजबूत करना होगा।
अब जानिए नगर निगम के बारे में उदयपुर में पहले नगरपालिका मंडल की स्थापना दिसंबर 1922 मे मेवाड़ प्रशासन द्वारा की गई थी। इसके समस्त सदस्य मनोनीत किए जाते थे। जुलाई 1948 को यहां नगर निगम का गठन किया गया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात राजस्थान की नगरपालिकाओं मे एकरूपता लाने के लिए 13 अक्टूबर 1959 मे लोकतांत्रिक आधार पर नगर परिषद गठित की गई। 17 अक्टूबर 1973 से 25 नवंबर 1994 तक चुनाव के आभाव मे प्रशासन की व्यवस्था थी।
29 नवंबर को पुनः जनप्रतिनिधियों के बोर्ड का चयन हुआ। वार्डों का साल 2009 और 2019 में विस्तार हुआ था। साल 2009 तक यहां नगर परिषद थी और 50 वार्ड थे। इन्हें 5 बढ़ाकर 55 किया गया। फिर साल 2013 में नगर निगम बना। चुनाव 2014 में हुए। इसके बाद 2019 में सीमा क्षेत्र का विस्तार करते हुए 15 वार्ड बढ़ाए गए। कुल वार्डों की संख्या बढ़कर 70 हो गई। अब दस वार्ड बढ़ाने के बाद वार्ड संख्या 80 हो गई है।

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