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राजस्थान हाईकोर्ट की डबल बेंच ने पाली के फालना में देवीसिंह मर्डर केस में अहम फैसला सुनाते हुए तीन आरोपियों फालना निवासी हिम्मतसिंह, उसकी पत्नी पदम कंवर और बेटे यशपालसिंह को बरी कर दिया है। जस्टिस मनोज कुमार गर्ग और जस्टिस रवि चिरानिया की पीठ के इस र
इस मामले में पुलिस द्वारा देवीसिंह द्वारा मौत से पहले जोधपुर महात्मा गांधी अस्पताल में दिए गए आखिरी बयान पर न तो हस्ताक्षर थे और न ही अंगूठा निशान ही लिए गए थे। वहीं, डॉक्टर का स्पष्ट प्रमाणपत्र भी उपलब्ध नहीं था कि मृतक मानसिक और शारीरिक रूप से बयान देने योग्य था। इसके अलावा, मजिस्ट्रेट की उपस्थिति भी नहीं थी। इतना ही नहीं, पुलिस पांच गवाहों को भी पक्षद्रोही होने से नहीं रोक पाई।
यह था मामला: ससुराल में जिंदा जलाने का आरोप
मामले की शुरुआत 24 अगस्त 2012 को हुई जब शिकायतकर्ता देवी सिंह ने महात्मा गांधी अस्पताल जोधपुर के बर्न वार्ड में भर्ती होकर एक बयान दिया। देवी सिंह के अनुसार वह 18 अगस्त 2012 को बैंगलोर से यात्रा करके 20 अगस्त 2012 को अहमदाबाद पहुंचा, जहां से वह फालना गया था, क्योंकि उसकी पत्नी सुमन कंवर अपने छह महीने के बच्चे को छोड़कर भाग गई थी।
देवी सिंह द्वारा बताया गया कि उसने अपने ससुर हिम्मत सिंह से संपर्क किया और उन्होंने कहा कि वह बच्चे को लेकर फालना आए। 20 अगस्त 2012 को शाम 5 बजे के करीब वह फालना पहुंचा और अपने ससुराल गया, जहां उसने चाय पी। जब वह जाने लगा तो उसकी सास पदम कंवर और साले यशपाल ने उसके हाथ पकड़ लिए और उसका ससुर उसके पीछे खड़ा था। उसी समय किसी ने उस पर पेट्रोल डालकर आग लगा दी। पड़ोसियों ने उसे बचाया और अस्पताल ले गए।
मेडिकल एविडेंस: 80% बर्न केस में भ्रम की संभावना
मेडिकल एविडेंस के संबंध में पुलिस ने 80% जलने के मामले में शॉक के कारण होने वाले भ्रम की संभावना को गंभीरता से नहीं लिया। जबकि, डॉक्टर अनुज सिंह ने माना था कि इतने गंभीर जलने के मामले में मरीज को भ्रम हो सकता है। पुलिस ने इस महत्वपूर्ण तथ्य को नजरअंदाज किया। इसके साथ ही डॉ. संजय बेदी ने पुष्टि की थी कि घटना के समय देवी सिंह नशे में था, लेकिन, पुलिस ने इस महत्वपूर्ण साक्ष्य का उचित विश्लेषण नहीं किया।
पांच गवाह पक्षद्रोही, मकसद साबित नहीं कर पाई पुलिस
पुलिस की सबसे बड़ी विफलता गवाहों को पक्षद्रोही (hostile) होने से रोकने में रही। पांच स्वतंत्र गवाह ओम प्रकाश, ओम पुरी, मदन सिंह, भोपाल सिंह और विक्रम सिंह पलट गए। गवाहों को धमकी या दबाव से बचाने के लिए कोई विशेष सुरक्षा व्यवस्था नहीं की गई। पुलिस गवाहों के साथ नियमित संपर्क बनाए रखने में भी असफल रही।
मृतक के पिता बाबूसिंह, चाचा जगदीश सिंह और मां काकू देवी के बयानों से भी पुलिस कोई स्पष्ट मकसद साबित नहीं कर सकी। पुलिस ने मृतक देवी सिंह और सुमन कंवर के प्रेम विवाह को मकसद बताया गया, लेकिन यह पर्याप्त साक्ष्य नहीं था। विडंबना यह भी थी कि सुमन कंवर ने खुद अपने पति के खिलाफ धारा 498-ए के तहत केस दर्ज कराया था।
दो आरोपियों ने पकड़ा, तो तीनों कैसे जले?
फोरेंसिक सबूत जुटाने में पुलिस ने आरोपियों की जलने की चोटों की उचित जांच नहीं की। तीनों आरोपियों, हिम्मतसिंह, पदम कंवर और यशपालसिंह को भी जलने की गंभीर चोटें आई थीं जिसमें हिम्मत सिंह और यशपाल सिंह को 9% जलने की चोटें आईं, जबकि पदम कंवर को 18% जलने की चोटें आईं। कोर्ट ने सवाल उठाया कि यदि केवल दो आरोपियों ने मृतक को पकड़ा था तो तीनों को जलने की चोटें कैसे आईं। पुलिस इसका कोई ठोस स्पष्टीकरण नहीं दे सकी। जबकि आग लगने के मामले में भौतिक साक्ष्य जुटाना अहम होता है।
पाली की अतिरिक्त सेशन कोर्ट ने सुनाई थी सजा
पाली के अतिरिक्त सेशन जज ने 19 मार्च 2016 को तीनों आरोपियों को दोषी ठहराया था। पुलिस द्वारा पेश किए गए 23 गवाहों के बयानों के आधार पर धारा 302/34 के तहत आजीवन कारावास और 2,000 रुपए जुर्माना तथा धारा 341 के तहत एक महीने का कारावास की सजा सुनाई गई थी जिसमें दोनों सजाएं एक साथ चलने का आदेश था।
हाईकोर्ट का आदेश
हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे अपराध सिद्ध करने में असफल रहा है। कोर्ट ने मकसद के अभाव, पक्षद्रोही गवाहियों, मृतक की नशे की स्थिति और आरोपियों की जलने की चोटों के अस्पष्टीकृत होने पर चिंता जताई। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि पुलिस कार्रवाई हिम्मत सिंह की रिपोर्ट पर शुरू हुई थी, न कि मृतक के बयान के आधार पर।
हाईकोर्ट ने यशपाल सिंह को तुरंत जेल से रिहा करने का आदेश दिया है, जबकि हिम्मत सिंह व पदम कंवर के बेल बॉन्ड रद्द कर दिए हैं। इन तीनों को एक महीने के भीतर 50,000 रुपए का व्यक्तिगत बॉन्ड और समान राशि की जमानत देनी होगी जो छह महीने तक प्रभावी रहेगी।
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