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राजस्थान हाईकोर्ट के जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस अनुरूप सिंघी की कोर्ट ने दिया अहम फैसला।

राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर की डिवीजन बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसले में हत्या के मामले में 10 साल 9 माह से ज्यादा समय से सजा काट रहे शख्स को राहत देते हुए उसकी सजा को कम करने का फैसला किया है। जस्टिस फरजंद अली और जस्टिस अनुरूप सिंघी की खंडपीठ ने 28 जुलाई

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दरअसल, हनुमानगढ़ जिले के पीर का मदिया निवासी गुरदीप सिंह पुत्र कश्मीर सिंह के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया गया था। घटना 22 अक्टूबर 2014 की शाम करीब 7 बजे घटित हुई थी। जब, गुरदीप सिंह का भाई सरजीत सिंह घर पर खाना खा रहा था, तब अचानक गुरदीप सिंह ने एक ईंट से सरजीत सिंह के सिर पर वार कर दिया। घायल सरजीत को सरकारी अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन वहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। तब, 23 अक्टूबर 2014 को सुबह 10:45 बजे मृतक के भाई मल्कीत सिंह और उसकी पत्नी ने गुरदीपसिंह के खिलाफ टिब्बी थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी।

इस आधार पर धारा 302 के तहत एफआईआर दर्ज की गई। जांच पूरी होने के बाद, गुरदीप सिंह के खिलाफ न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, टिब्बी के समक्ष चार्जशीट दाखिल की गई और बाद में यह मुकदमा सत्र न्यायालय हनुमानगढ़ को स्थानांतरित कर दिया गया।

सेशन कोर्ट ने सुनाई थी आजीवन कारावास की सजा

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संख्या-2, हनुमानगढ़ ने 15 मार्च 2016 को अपना निर्णय सुनाया था। कोर्ट ने गुरदीप सिंह को आईपीसी की धारा 302 के तहत दोषी ठहराया और उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई। साथ ही 5,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया, जिसके भुगतान न करने पर अतिरिक्त दो महीने की कठोर कारावास की सजा भी निर्धारित की गई थी।

अभियोजन पक्ष के 12 गवाह और साक्ष्य

अभियोजन पक्ष ने कुल 12 गवाहों की गवाही कराई। इनमें मुख्य गवाह मल्कीत सिंह (शिकायतकर्ता और मृतक का भाई), सीमा देवी (शिकायतकर्ता की पत्नी), डॉ. बलवंत सिहाग (पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर), और जांचकर्ता अधिकारी दिनेश मीना शामिल थे। अभियोजन पक्ष ने दस्तावेजी और भौतिक साक्ष्य भी प्रस्तुत किए जिनमें एफएसएल रिपोर्ट, खून से सने कपड़े, ईंट, और अपराध स्थल की तस्वीरें शामिल थीं।

बचाव तर्क: आरोपी के पैर में था फ्रैक्चर, गवाही में विरोधाभास

बचाव पक्ष की ओर से तर्क दिया गया कि एफआईआर दर्ज करने में अस्पष्ट देरी हुई थी और घटना के कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं थे। यह भी तर्क दिया गया कि आरोपी के पैर में फ्रैक्चर था, जिससे वह अपराध करने में असमर्थ था। एफआईआर और मौखिक गवाही में हथियार के संबंध में विरोधाभास भी बताया गया। बचाव पक्ष ने यह भी बताया कि कई अभियोजन गवाह विपरीत गवाही देने लगे थे।

हाईकोर्ट का विश्लेषण: चोट अकेले मौत का कारण बनने के लिए अपर्याप्त

राजस्थान हाईकोर्ट ने मामले का गहराई से अध्ययन करते हुए कई महत्वपूर्ण तथ्यों पर विचार किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी गुरदीप सिंह और मृतक सरजीत सिंह सगे भाई थे और एक ही घर में रहते थे। घटना पारिवारिक माहौल में घटित हुई थी।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, मृतक के सिर के पिछले हिस्से में तीन चोटें थीं, जो 2 सेमी से 2.5 सेमी लंबी थीं। ये चोटें हड्डी की गहराई तक थीं, लेकिन कोई दबी हुई फ्रैक्चर या घातक इंट्राक्रेनियल चोट नहीं थी। न्यायालय ने पाया कि कोई भी चोट अकेले मृत्यु का कारण बनने के लिए पर्याप्त नहीं थी।

धारा 302 की बजाय 304-II के अंतर्गत माना

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में आईपीसी की धारा 300 के अपवाद 4 का हवाला दिया। इस अपवाद के अनुसार, “दोषपूर्ण हत्या, हत्या नहीं है, यदि यह पूर्व चिंतन के बिना, अचानक लड़ाई में, उत्तेजना की स्थिति में, अचानक झगड़े में किया जाए और अपराधी द्वारा कोई अनुचित फायदा न लिया गया हो या कोई क्रूर या असामान्य तरीका न अपनाया गया हो।”

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह मामला हत्या के बजाय धारा 304 भाग II के अंतर्गत आता है, जो बिना इरादे के लेकिन जानकारी के साथ की गई हत्या से संबंधित है।

सजा में संशोधन और रिहाई

कोर्ट ने ध्यान दिया कि आरोपी गुरदीप सिंह 26 अक्टूबर 2014 से लगातार न्यायिक हिरासत में था और इस प्रकार उसने 10 वर्ष से अधिक की सजा पहले से ही काट ली थी। अपराध की प्रकृति, पूर्व चिंतन का अभाव, अचानक झगड़े में उत्तेजना की स्थिति में किए गए कार्य, और आरोपी की मानसिक व शारीरिक स्थिति को देखते हुए न्यायालय ने माना कि पहले से काटी गई सजा न्याय के उद्देश्य को पूरा करने के लिए पर्याप्त थी।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के दो महत्वपूर्ण फैसलों का संदर्भ देते हुए स्पष्ट किया कि सजा का उद्देश्य केवल दंडात्मक नहीं बल्कि सुधारात्मक भी होना चाहिए।

किसी दूसरे मामले में हिरासत की जरुरत नहीं, तो तत्काल रिहा करेे

कोर्ट ने आरोपी गुरदीपसिंह के खिलाफ दोषसिद्धि को धारा 302 से धारा 304 भाग II में परिवर्तित करते हुए आजीवन कारावास की सजा को पहले से काटी गई अवधि तक सीमित कर दिया। न्यायालय ने आदेश दिया कि यदि गुरदीप सिंह को किसी अन्य मामले में हिरासत में रखने की आवश्यकता नहीं है तो उसे तुरंत रिहा किया जाए। कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस निर्णय की प्रति तुरंत सत्र न्यायालय को भेजी जाए, ताकि आवश्यक अनुपालन सुनिश्चित हो सके।



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