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सीकर के रैवासा धाम आए RSS के सरसंघ चालक मोहन भागवत ने कहा- शक्ति और भक्ति की भूमि पर आज आने का सौभाग्य मिला है। यहां मेरा जिस स्नेह से आपने स्वागत किया है। अयोग्य होते हुए भी मेरे बारे में जो सद्भावना अच्छे शब्दों में प्रकट की है। भगवान से प्रार्थना

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मेरा तो सरसंघ चालक बनने के बाद उनसे संबंध हुआ। उनसे पहली भेंट में मेरे ध्यान में दो बात आई थी- उनके मन में सबके लिए स्नेह था, सबको आत्मीय भाव से देखते थे। विचार मिले या नहीं वह बाद की बात है।

RSS के सरसंघ चालक मोहन भागवत आज सीकर के रैवासा धाम आए थे। उन्होंने रैवासा धाम में आयोजित ‘सियपिय मिलन महोत्सव’ में शिरकत की। पीठ के पूर्व पीठाधीश्वर राघवाचार्य महाराज की मूर्ति का अनावरण किया।

भारत ही दुनिया में धर्म देने वाला देश

मोहन भागवत ने कहा- उनके रहते हुए में एक बार रैवासा धाम आ चुका हूं। उन्होंने गुरुकुल के छात्रों से भी मिलाया था। उस वक्त भी वही स्नेह और समाज के लिए वही तड़पन थी। बहुत सारे ऐसे संत, जो संघ के कार्यक्रमों में नहीं आए लेकिन वह स्वयंसेवक ही तो है। मैंने उन्हें कहा था जब-जब आऊंगा, तब आपसे मिलूंगा। मैं दो-तीन बार आया लेकिन महाराज प्रवास पर थे। ऐसे में धाम में नहीं आया। फिर से यहां आना, उनके जाने के बाद होगा। इसका मुझे बिल्कुल भी अनुमान नहीं था। ऐसा अनुमान किसी को होता भी नहीं है।

भागवत ने कहा- मैं देख रहा हूं कि समाज के हित के लिए वही तड़पन यहां के वातावरण में विद्यमान है। महाराज के जाने के बाद यहां जो कुछ भी हो रहा है, वो इस तरह से किया जा रहा है कि वह तपस्या उसे भास्मान करती है। इस जगह भक्तमाल की रचना हुई। स्थान की परंपरा ऐसी ही चलती रहेगी। यह आज मुझे विश्वास हो गया है।

भारत दुनिया में धर्म देने वाला और विश्व का कल्याण चाहने वाला देश है। यहां वेदों में सारे शास्त्र हैं। ऋषियों ने यहां तप किया हं। उनके तप से अपने राष्ट्र के बल की ओजती उत्पन्न हुई।

दुनिया वास्तव में एक ही, इस पर सब एकमत

सत्य एक ही है और विश्व रूप है और दिखता है जो विविध है। वह उसी का अविष्कार है। मिथ्या कुछ देर चलता है बाद में सब एक ही है। इसलिए हमारे यहां संतों की ऐसी कथाएं भी मिलती हैं। रामकृष्ण ब्रह्मोस के जीवन का अनुभव लिखा गया है। पंचवटी में गंगा को देखते हुए बैठे थे, देखते-देखते ध्यान लग गया। आगे के सारे दृश्य के साथ वह तदरूप हो गए। उस समय सामने जो हरियाली थी। उस पर से एक गाय चली गई। वह इतने ज्यादा तदरूप हो चुके थे कि उनके खुद के सीने पर गाय के पैरों के निशान आ गए थे।

इतनी तनमयता सारे सृष्टि के साथ प्राप्त करने की गुरुकीली हमारे पास है, चाबी हमारे पास है और यह सर्वार्थ में कल्याणकारी सब लोगों के लिए है। ऋषि मुनियों ने सोचा कि सब एक है, सब अपने हैं। जो इतना बड़ा श्रेय हमें मिला है, वह सारी दुनिया को देना चाहिए। सारी दुनिया को देने के लिए एक आदमी पर्याप्त नहीं होगा। एक पूरा राष्ट्र अपना जीवनदेय बनाकर इसे जीए इसलिए उन्होंने इस राष्ट्र की अपनी तपस्या से निर्मिती की है।

विश्व में बड़ी ताकत लेकिन भारत का अपना स्थान

RSS प्रमुख ने कहा- इतिहास ने भी जब आंखें नहीं खोली थी। तब से यह काम भारतवर्ष और भारत का हिंदू समाज कर रहा है। सनातन काल से रीति ऐसे ही चल रही है। कई उतार-चढ़ाव आए। कभी हम स्वतंत्र रहे, कभी वैभव संपन्न रहे, कभी हम दरिद्र हो गए, कभी हम परतंत्र हो गए, अत्याचारी-पीड़ित हो गए। फिर भी यह काम लगातार चलता रहा।

जब-जब दुनिया को विशेष रूप से इसकी आवश्यकता पड़ती है। तब भारत का उत्थान होता है। आज हम देख रहे हैं अप्रत्याशित रूप से अगर स्वतंत्रता के बाद का हमारा इतिहास देखें तो इतिहास के आधार पर कोई यह तर्क नहीं कर सकता कि भारतवर्ष उठेगा, लेकिन भारत वर्ष उठ रहा है। विश्व में अपना स्थान बना रहा है। विश्व में बड़ी ताकत है लेकिन उसके बावजूद भारत अपना स्थान बना रहा है।

भारत के स्वतंत्र होने के बाद लोगों ने भविष्यवाणी की थी कि यहां प्रजातंत्र चल ही नहीं सकता। प्रजातंत्र चला भी और जब इस पर संकट आया तो लोगों ने उसका प्रतिकार करके प्रजातंत्र को कायम रखा है। आज भारत आश्चर्यकारक रीति से प्रजातांत्रिक देश के नाते प्रजातंत्र के मामले में सारी दुनिया से आगे है।

जहां ऐसे संत और महापुरुषों ने प्रत्यक्ष धर्म का आचरण करते हुए सामान्य लोगों के सामने यह विश्वास उत्पन्न किया कि इस धर्म पर चला जा सकता है। इस धर्म पर चलने पर इस लोक और परलोक दोनों में सुख मिल सकता है। हर परिस्थिति में इस प्रकार का जीवन हमारे यहां सामान्य आदमी का भी रहा है। यह प्रताप किसका है, ऐसे स्थान का ही है।

भारत में आध्यात्म के रूप में जो बोला जाता, वो संतों की देन

मोहन भागवत ने कहा- यहां से प्रेरणा लेकर संपूर्ण देश में विचरण करने वाले हमारे संतों का है। बाकी दुनिया में बहुत सारी पूजा पद्धतियां है, अच्छी है लेकिन पूजा पद्धति को अनुसरण करने वाले अगर पूछेंगे कि यह जो आप बता रहे हो वह प्रत्यक्ष दिखाओ, तो लोगों के पास कोई जवाब नहीं होगा।

भारतवर्ष में आज भी आध्यात्म के रूप में जो भी बोला जाता है, वह जिनके जीवन में दिखता है, जीवन में आचरण करके उन्होंने यश कीर्ति, श्रेय और प्रेय सब कुछ प्राप्त किया है। ऐसे जीवन बिल्कुल हमारे पास है। हम लोगों में घूमते-फिरते, हमारे जैसा खाते पीते, दिखते हैं। यह संतों की बड़ी महत्वपूर्ण कृपा हम लोगों पर है।

तुकाराम महाराज महाराष्ट्र के एक संत हैं, उन्होंने कहा कि हम यहां के तो है नहीं, हम तो भगवान के और बैकुंठ के हैं। यहां पर क्यों आए हैं। वह मराठी में रहते हैं आमी बैकुंठवासी, आलो याचिकांरणा सी। इसी कारण से यहां पर आए हैं। ऋषियों ने जो कहा इसका सत्य आचरण हर समय तब तब के देशकाल परिस्थिति के अनुसार करके बताने के लिए हम यहां पर है।

संतों का जीवन इसलिए है और ऐसे संत का स्मरण आज हम एक साल बाद कर रहे हैं। उसी जगह दूसरे संत हमें आश्वस्त करते हुए कि एक संत जिनका पार्थिव चला गया लेकिन संत है, संत दिखते अलग-अलग हैं लेकिन अंदर से सब एक होते हैं इसलिए मैं मानता हूं कि इस स्थान और उसकी महिमा को चलाने वाले संत लोग हैं तब तक हमको राघवाचार्य महाराज सदैव इस पीठ पर मिलते रहेंगे।



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