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रक्षाबंधन का पावन पर्व, जो भाई-बहन के अटूट प्रेम और स्नेह का प्रतीक है, झुंझुनूं में एक गहरी और भावुक परंपरा का रूप ले लेता है। यहां यह त्यौहार सिर्फ़ रिश्तों को नहीं, बल्कि अमर बलिदान की गाथाओं को भी याद दिलाता है। अणगासर गांव के वीर शहीद दलीप कुमार

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उनके हाथों में राखी थी, आँखों में नमी और दिल में भाई के अदम्य साहस पर गर्व। यह दृश्य भाई-बहन के रिश्ते को एक नए और अविस्मरणीय आयाम में परिभाषित करता है, जहाँ राखी केवल सुरक्षा का धागा नहीं, बल्कि देश के प्रति कर्तव्य और बलिदान का प्रतीक बन जाती है।

झुंझुनूं में शहीद की बहनें हर साल मनाती हैं यह अनोखा रक्षाबंधन

झुंझुनूं में शहीद की बहनें हर साल मनाती हैं यह अनोखा रक्षाबंधन

अमर भाई की प्रतिमा पर राखी

शनिवार की सुबह, जब देश भर में बहनें अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांध कर उनकी लंबी उम्र की कामना कर रही थीं, तब अमिता और सुनिता ने अपने शहीद भाई की प्रतिमा को पहले साफ किया, फिर चंदन का टीका लगाया और पूरे सम्मान के साथ राखी बाँधी। यह क्षण इतना भावुक था कि दोनों बहनों की आँखें भर आईं।

अमिता ने नम आंख से कहा, “भाई को हमसे बिछड़े 25 साल हो गए, लेकिन हमारे लिए वह आज भी जीवित हैं। उनका चेहरा, उनकी बातें, उनकी हंसी… सब हमारी यादों में जिंदा हैं। उन्होंने देश की सेवा में अपने प्राण न्योछावर किए, यह हमारे परिवार का ही नहीं, बल्कि पूरे गाँव और जिले के लिए गर्व का विषय है।”

शहीद दलीप थाकन की प्रतिमा पर बहनों ने बांधी राखी

शहीद दलीप थाकन की प्रतिमा पर बहनों ने बांधी राखी

सुनिता ने भी अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हुए कहा, “हर साल रक्षाबंधन पर हम यही करते हैं। भाई की प्रतिमा पर राखी बांधना हमारे लिए ऐसा है, जैसे हम उन्हें अपने हाथों से राखी बाँध रहे हों। वह हमारे लिए केवल भाई नहीं, बल्कि देश की रक्षा के लिए अमर हुए वीर सपूत हैं। उनका बलिदान हमें हमेशा देश के लिए कुछ करने की प्रेरणा देता है।”

पीढ़ियों को प्रेरित करती परंपरा

शहीद दलीप थाकन की भांजी ने, जिन्होंने अपने मामा को कभी नहीं देखा, भी इस परंपरा पर गर्व व्यक्त किया। उन्होंने कहा, “हमने उन्हें देखा तो नहीं, लेकिन माँ और बुआ की आँखों में जब भी उनके बारे में बात होती है, उनकी वीरता हमारे दिल में बस जाती है। हमारे लिए उनका नाम ही गर्व और प्रेरणा का स्रोत है। हम भी चाहते हैं कि देश के लिए कुछ करें।”

यहां के लोग शहीदों को लोक देवता के रूप में पूजते हैं और उनके बलिदान को नई पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए हर अवसर पर उन्हें याद करते हैं। यह परंपरा न केवल बलिदान की गाथा को जीवित रखती है, बल्कि झुंझुनूं की मिट्टी में बसे देशभक्ति के जज़्बे को भी आने वाली पीढ़ियों तक पहुँचाती है।

शहीद दलीप कुमार थाकन ने 25 साल पहले देश की सेवा करते हुए अपने प्राण न्योछावर किए थे। तब से हर साल उनकी बहनें और परिवारजन स्मारक पर आकर उन्हें राखी बांधना हैं।



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