
पूरे परिवार ने मिलकर 150 पुतले बनाए थे। बनाते-बनाते हाथों में छाले पड़ गए। ब्याज पर पैसे लेकर पुतले बनाते हैं। इस बार सब खराब हो गए। समझ नहीं आ रहा, क्या होगा?

ये दर्द है रावण के पुतले बनाकर रोजी रोटी कमाने वाले परिवारों का, जिनकी महीनों की मेहनत जयपुर में मंगलवार शाम हुई 1 घंटे की मूसलाधार बारिश ने बर्बाद दी। इनके बनाए पुतले बारिश में भीग गए। सड़क किनारे जहां इन्होंने झोपड़ियां बना रखी थीं, उनमें पानी घुस गया। एसएफएस चौराहा, गुर्जर की थड़ी सहित शहर में कई स्थानों पर ये मजदूर पुतले बना रहे थे।
पढ़िए पूरी रिपोर्ट…

बच्चे को गोद में लिए बारिश में बर्बाद हुए रावण के पुतले को देखकर आंसू बहाती महिला मजदूर।
इन परिवारों का दर्द जानने के लिए भास्कर रिपोर्टर एसएफएस चौराहे के किनारे स्थित झोपड़ियों में गई। हालात डरावने थे। झोपड़ियों में अब तक पानी भरा था। चूल्हा नहीं जला था। बच्चे भूख से तड़प रहे थे। महिलाएं रो रही थीं। मजदूर भीगे हुए रावण पुतलों को निहार रहे थे। मुरझाए चेहरे बता रहे थे कि उनकी महीनों की मेहनत और उम्मीदों पर पानी फिर चुका है।
‘12-13 परिवार साथ आए थे… 30 लाख का नुकसान हो गया’
डिग्गी मालपुरा से आए 62 साल के बाबूलाल ने बताया- ‘हम करीब 12-13 परिवार यहां आए थे। हर साल दशहरे पर रावण के पुतले बनाकर बेचते हैं। इस बार भी उम्मीद थी कि अच्छा काम होगा। बारिश ने सब खत्म कर दिया। करीब 30 लाख का नुकसान हुआ है। हमने उधार लेकर पुतले बनाए थे। अब न बिके, न कर्ज कैसे चुकाएं, यही चिंता है।’ ये बोलते-बोलते उनकी आंखें भर आईं।

‘150 पुतले बनाते-बनाते हाथों में छाले पड़ गए थे’
बीसलपुर से आई बुजुर्ग देवी बताती हैं- ‘हमारे पूरे परिवार ने मिलकर 150 पुतले बनाए थे। बनाते-बनाते हाथों में छाले पड़ गए। एक बारिश से लाखों का नुकसान हो गया। ये सब बेचकर ही घर चलता था। किसी को दो हजार में बेचते, किसी को पांच हजार में और बड़े पुतले तो 30-40 हजार से ज्यादा के भी बिक जाते थे। अब सब खराब हो गए।’
‘ब्याज पर पैसा लिया था। कोई 2 रुपए सैकड़ा ब्याज लेता है, कोई 5 रुपए सैकड़ा। अब उसे चुकाना भारी पड़ जाएगा। गरीबी में क्या करें? अगर सरकार मदद नहीं करेगी तो सचमुच भूखे मर जाएंगे। हमारे परिवार के पास कोई और साधन भी नहीं है रोजगार का। भगवान ही जाने क्या होगा हमारा।’

पुतले बनाने के दौरान हाथों में पड़े छाले दिखाते मजदूर।
‘सुबह से कुछ खाया नहीं, बच्चों के लिए भी कुछ नहीं’
देवली की ममता की गोद में उसका एक महीने का बच्चा था। बोली ‘हमने लोन लेकर पुतले बनाए थे। बारिश में सब चौपट हो गया। आज सुबह से खाना भी नहीं बनाया। बच्चों को खिलाने को भी कुछ नहीं है। झोपड़ी में पानी भर गया, अब कहां जाएं? हम तो बर्बाद हो चुके हैं। मेरा छोटा सा बच्चा है अब समझ नहीं आ रहा क्या करूं। इससे तो अच्छा हम मर ही जाते। बच्चों को तड़पते हुए तो नहीं देखना पड़ता।’

‘20 साल का हूं, फुटपाथ पर सो रहा हूं’
20 साल के मनोज से बात की तो बोले- ‘हम सड़क किनारे झोपड़ी बनाकर रहते हैं। पुतले बनाते हैं। इस बार बारिश ने न सिर्फ पुतले खराब किए बल्कि हमारी झोपड़ी में भी पानी भर गया। अब फुटपाथ पर सोना पड़ रहा है। पुतले सूखाने के लिए समय और धूप चाहिए। अब सिर्फ एक दिन बचा है। धूप नहीं निकली तो सब खत्म। न रावण बिकेगा, न घर चलेगा। घर में बुजुर्ग हैं। छोटे बच्चे हैं। समझ नहीं आ रहा, कैसे पेट भरेंगे? सरकार को हमारे लिए भी सोचना चाहिए। हमें कोई ऐसी जगह ही दे दे, जहां बारिश के कारण नुकसान न झेलना पड़े।’

जयपुर में गुर्जर की थड़ी के पास बारश के कारण बर्बाद हुए रावण के पुतले।
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