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राजस्थान हाईकोर्ट ने चिकित्सा विभाग में कार्यरत डॉक्टर्स, जो नियमित चयन से पहले अस्थायी व संविदा पर सेवाएं दे चुके हैं। उनके लिए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है।

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जस्टिस श्रीचंद्रशेखर व जस्टिस संदीप शाह की पीठ ने राज्य सरकार की इस संबंध में प्रस्तुत सभी विशेष अपीलें खारिज कर दीं। अब उन डॉक्टरों को उनकी आरंभिक अस्थाई नियुक्ति तिथि से सेवा की संपूर्ण निरंतरता, वेतन बढ़ोतरी और सभी सेवा लाभ मिलेंगे। इस निर्णय से प्रदेश के 21 जिलों के 154 डॉक्टर्स को बड़ी राहत मिली है।

दरअसल, सरकारी सेवा में कार्यरत डॉ. युद्धवीरसिंह, डॉ. वसीम अहमद, डॉ. देवेंद्रसिंह राव सहित अन्य डॉक्टर्स की तरफ से अधिवक्ता यशपाल खिलेरी ने अलग-अलग रिट याचिकाएं पेश की थी। इनमें बताया–

  • 1. नियुक्ति प्रक्रिया को नियमित माना-याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट खिलेरी ने बताया- हेल्थ डिपार्टमेंट ने सार्वजनिक विज्ञापन जारी कर मेरिट व रोस्टर के अनुसार 22 जुलाई 1986 को चिकित्सा अधिकारी के रूप में चयन किया गया। चयन समिति के माध्यम से उनकी नियुक्ति रिक्त स्वीकृत पदों पर नियमानुसार की गई थी। बाद में आरपीएससी द्वारा भी अभियर्थियों की नियुक्ति अनुशंसित कर दी गई, जिससे कर्मचारियों की सेवा में कोई अंतराल नहीं आया।
  • 2. सेवा निरंतरता का अधिकार-याचिकाकर्ता लगातार बिना किसी ब्रेक के पद पर कार्यरत रहे हैं। उन्हें शुरुआत से वेतन, भत्ते और सभी लाभ भी मिलते रहे। लेकिन विभाग ने आरपीएससी चयन पूर्व की सेवा (लगभग छह वर्ष) को सेवा लाभों में नहीं गिना, जिस कारण याचिका लगी। आरपीएससी द्वारा चिकित्सा अधिकारी पद पर नियमित नियुक्ति हेतु अनुशंषा करने के बाद राज्य सरकार ने 24 मार्च 1992 को नियुक्ति आदेश जारी कर उनका दुबारा चयन कर लिया और पूर्व में वे जिन पदों पर कार्यरत थे, उसी स्थान पर जॉइनिंग दे दी।
  • 3. सेवा नियम एवं कोर्ट की राय-नए चयन आदेश से पूर्व की सेवा अवधि को गणना में शामिल नहीं पर इन डॉक्टर्स ने हाईकोर्ट की शरण ली। कोर्ट ने राजस्थान मेडिकल एंड हेल्थ सर्विस रूल्स, 1963, राजस्थान सेवा नियम, 1951 और पेंशन नियम, 1996 का हवाला दिया, जिसमें अस्थायी या संविदा सेवा को भी “क्वालीफाइंग सर्विस” माना गया है। कोर्ट ने माना कि रिक्त स्वीकृत पदों पर विज्ञापन व चयन समिति के जरिए नियुक्ति हुई, तो यही “नियमित चयन प्रक्रिया” है। कोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के हाल के फैसलों और चिकित्सा विभाग के विभिन्न सर्कुलर का भी उल्लेख किया।
  • 4. एकलपीठ के फैसले को राज्य सरकार ने दी चुनौती-राजस्थान हाईकोर्ट की एकलपीठ ने रिट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ताओं को सेवा निरंतरता का लाभ देने के आदेश दिए। साथ ही इनकी पूर्व में की गई सेवा अवधि को (आरंभिक नियुक्ति तिथि) गणना योग्य माना। एकलपीठ के इन्हीं आदेशों को राज्य सरकार ने हाईकोर्ट की खंडपीठ में विशेष अपीलों के माध्यम से चुनौती दी थी।
  • 5. खुद के ही परिपत्र में उलझी सरकार, खारिज हुई याचिकाएं-खंडपीठ में सुनवाई के दौरान भी याचिकाकर्ताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट के जाता फैसले में दी गई महत्वपूर्ण व्यवस्था का उल्लेख भी किया। इसके साथ ही कोर्ट में बताया कि राज्य सरकार के चिकित्सा विभाग ने खुद ही 5 जनवरी 1996 को परिपत्र जारी कर आदेशित किया था कि ‘ऐसे अस्थायी कार्यरत अभ्यर्थी जिनका चयन राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा किया जा चुका है और लगातार कार्यरत हैं, वह सभी आरंभिक नियुक्ति से ही नियमित माने जाएंगे।’

कोर्ट का अंतिम आदेश

इन्हीं पर सुनवाई के बाद जस्टिस श्रीचंद्रशेखर तथा जस्टिस संदीप शाह की खंडपीठ ने पूर्व में एकलपीठ द्वारा दिए गए निर्णय को विधिसम्मत माना। साथ ही अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि सरकार खुद अपने ही बनाए दिशा-निर्देशों से पीछे नहीं हट सकती। कोर्ट ने स्पष्ट किया–

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यदि प्रारंभिक नियुक्ति स्वीकृत रिक्त पद पर, चयन प्रक्रिया और चयन समिति के जरिए हुई है तो याचिकाकर्ता नियमित वेतनमान, वेतनवृद्धि एवं अन्य सभी भत्तों के हकदार हैं, और सेवा की गणना आरंभिक नियुक्ति तिथि से की जाएगी।

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कोर्ट ने राज्य सरकार की सभी विशेष अपीलों को सारहीन मानते हुए खारिज कर दिया।



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