राजस्थान हाईकोर्ट ने फर्जी मार्कशीट मामले में चूरू विधायक हरलाल सिंह के खिलाफ चल रहे आपराधिक मुकदमे को वापस लेने की राज्य सरकार की याचिका को खारिज कर दिया है। जस्टिस इंद्रजीत सिंह और जस्टिस भुवन गोयल की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि केवल इस आधार पर कि कोई
कोर्ट ने सरकार की ओर से पेश दलीलों को खारिज करने के साथ ही फटकार लगाते हुए कहा- वे यह साबित नहीं कर सके कि मुकदमा वापस लेने से न्याय के व्यापक हित कैसे पूरे होंगे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आवेदन सद्भावना से नहीं बल्कि कानूनी प्रक्रिया को दबाने के लिए दिया गया लगता है।
जिला परिषद सदस्य का चुनाव लड़ते फर्जी मार्कशीट लगाई
दरअसल, वर्ष 2019 में चिमना राम नामक व्यक्ति ने शिकायत दर्ज कराई थी कि हरलाल सिंह ने वर्ष 2015 में जिला परिषद चूरू के वार्ड नंबर 16 से सदस्य पद के लिए चुनाव लड़ते समय कक्षा 10वीं की फर्जी मार्कशीट जमा की थी। शिकायत के आधार पर चूरू के कोतवाली थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी।
आरोप के अनुसार, हरलाल सिंह ने नामांकन पत्र के साथ उत्तराखंड बोर्ड की एक मार्कशीट जमा की थी, जिसमें रोल नंबर 1494335 था। लेकिन जब आरटीआई के तहत जानकारी मांगी गई तो उत्तराखंड बोर्ड ने स्पष्ट कर दिया कि यह रोल नंबर किसी छात्र को आवंटित ही नहीं किया गया था। साथ ही यह भी पता चला कि मार्कशीट में दर्शाया गया स्कूल का नाम भी फर्जी था।
पुलिस ने जांच के बाद धोखाधड़ी, जालसाजी व आपराधिक साजिश सहित अन्य धाराओं में चार्जशीट पेश की। कोर्ट ने संज्ञान लेकर आरोप भी तय किए। तब, हरलाल सिंह ने संज्ञान के आदेश को चुनौती दी थी, लेकिन 11 सितंबर 2023 को उनकी रिवीजन पेटिशन खारिज कर दी गई।

सरकार ने कहा- अब विधायक है, इसलिए मुकदमा वापस लेना चाहिए
सरकार की रिपोर्ट पेश करते हुए एडवोकेट जनरल राजेंद्र प्रसाद ने बताया- राज्य सरकार ने 26 नवंबर 2024 की बैठक में फैसला लिया कि चूंकि हरलाल सिंह अब विधायक हैं, इसलिए उनके खिलाफ मुकदमा वापस लिया जाना चाहिए। सरकार ने हाईकोर्ट में सीआरपीसी की धारा 321 के तहत याचिका दाखिल की। इसमें एडवोकेट जनरल राजेंद्र प्रसाद ने कोर्ट में तर्क दिया कि उस मामले में सबूतों में कमी है।
AG ने तर्क दिया कि पुलिस चार्ज शीट में धारा 120-बी लगाई गई है, जबकि इस धारा में दो या इससे अधिक आरोपी होने चाहिए, जबकि चार्जशीट सिर्फ हरलालसिंह के खिलाफ है। इसी तरह, धारा 193 के मामले में अलग प्रक्रिया होनी चाहिए। इस मामले में चुनाव अधिकारी को शिकायत दर्ज करानी चाहिए थी, न कि किसी निजी व्यक्ति को और जिला परिषद का कार्यकाल 2020 में समाप्त हो चुका है।

हाईकोर्ट ने सरकार के सभी तर्कों को नकार दिया।
कोर्ट की फटकार- विधायक चुना गया, ये अच्छी छवि का प्रमाण नहीं
हाईकोर्ट ने सरकार के सभी तर्कों को नकारते हुए कड़ी टिप्पणी की। जस्टिस भुवन गोयल ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि “केवल इस आधार पर कि कोई आरोपी विधानसभा के लिए चुना गया है, यह उनकी जनता में अच्छी छवि का प्रमाण नहीं हो सकता। कोर्ट ने केरला सरकार बनाम के. अजीथ मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि मुकदमा वापसी के लिए स्पष्ट कारण होने चाहिए। न्याय के व्यापक हितों और सार्वजनिक नीति के अनुकूल होना चाहिए।
सरकारी समिति का फैसला संदिग्ध
कोर्ट ने पाया कि राज्य स्तरीय समिति ने मुकदमा वापस लेने के लिए कोई स्पष्ट कारण नहीं दिया था। समिति की 26 नवंबर 2024 की बैठक के मिनट्स में केवल यह लिखा था कि हरलाल सिंह अब विधायक हैं और पूर्व/वर्तमान सांसद व विधायकों के मामले हाईकोर्ट की अनुमति से ही वापस लिए जा सकते हैं। कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह नकार दिया और कहा कि यह कोई वैध कारण नहीं है।
जनता के धन का दुरुपयोग का मामला
कोर्ट ने खास तौर पर इस बात पर जोर दिया कि आरोप के अनुसार हरलाल सिंह ने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर जिला परिषद का चुनाव जीता और सार्वजनिक पद का दुरुपयोग करके सरकारी पैसे का इस्तेमाल किया। ऐसे गंभीर आरोपों में केवल राजनीतिक पद के आधार पर मुकदमा वापस लेना न्याय व्यवस्था के साथ खिलवाड़ है। कोर्ट ने अपने फैसले में अब्दुल करीम बनाम कर्नाटक सरकार और राजेंद्र कुमार बनाम राज्य सरकार के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मुकदमा वापसी यांत्रिक तरीके से नहीं की जा सकती।
कोर्ट के इस फैसले से यह साबित हो गया कि विधायक हरलालसिंह के खिलाफ आपराधिक मुकदमा जारी रहेगा। उस मामले की सुनवाई सरदारशहर एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की कोर्ट में सुनवाई आगे बढ़ेगी। हालांकि, हरलाल सिंह की तरफ से आरोप तय करने के आदेश को चुनौती देने वाली रिवीजन पेटिशन अभी भी लंबित है, जिसमें वे अपनी बचाव की कोशिश कर सकते हैं।
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