रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सेवा समिति (वृद्धाश्रम) पाली के मंच से कहा- अभी निर्णय भी ले लिया कि रेलवे में पाली के सिकोरे का उपयोग किया जाएगा। इस फैसले के बाद सिकोरे के रोजगार से जुड़े लोगों में खुशी की लहर है।

रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने पाली में ऐलान किया रेलवे में पाली के सिकोरे का इस्तेमाल किया जाएगा।
पाली में मशीन से बन रहे साफ-सुथरे सुंदर सिकोरे देख रेल मंत्री यह फैसला किया है। सिकोरे के जरिए लोगों को रोजगार से जोड़ रही है एक संस्था- लघु उद्योग भारती।
जानते हैं- कैसे यह संस्था मिट्टी से जुड़े लोगों का जीवन बदल रही है…
सबसे पहले जानिए-क्या है लघु उद्योग भारती
लघु उद्योग भारती (LUB) की स्थापना 1994 में हुई। यह गैर-लाभकारी अखिल भारतीय संगठन है। यह संगठन देशभर में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) को सशक्त बनाने के लिए काम करता है।
यह उद्यम के लिए मंच प्रदान करता है। उद्यमी अपनी समस्याओं पर चर्चा कर सकते हैं। समाधान पा सकते हैं। यह संगठन सरकार और उद्यमियों के बीच सेतु का काम भी करता है। पाली में लघु उद्योग भारती ने सिकोरे के जरिए लोगों को स्वरोजगार से जोड़ा है।

रेल मंत्री के ऐलान के बाद पाली के सिकोरा उद्योग को पंख लग जाएंगे।
3.50 लाख की मशीन, 16 लगाई जा चुकी
पूर्व विधायक ज्ञानचंद पारख बताते हैं- लघु उद्योग भारती ने सिकोरा उद्योग के लिए मशीन का निर्माण कराया। इस मशीन की लागत 3.50 लाख रुपए है।
इससे मिट्टी के कई तरह के सिकोरे बनाए जा सकते हैं। गिलास और कप आकार के सिकोरे के अलावा अन्य आइटम भी तैयार किए जा सकते हैं।
मशीन कम वक्त में अच्छी क्वालिटी का प्रोडक्शन देती है। संस्था ने किश्तों पर मशीन लोगों को उपलब्ध कराई। अब तक 16 मशीनें स्थापित की जा चुकी हैं। इनमें से 12 पर रेगुलर काम हो रहा है।
इनसे बनने वाले सिकोरे डिमांड में हैं। अब रेलवे से बड़ी डिमांड आएंगी तो रोजगार को पंख लग जाएंगे।

पाली के खेतावास के निकट रीको इंडस्ट्रीज एरिया में बनकर तैयार हुए मिट्टी के दीपक।
8 घंटे में बन जाते हैं 6 हजार सिकोरे
पाली शहर के नजदीकी गांव खेतावास में नरपत सिंह सोलंकी ने 2 मशीनें लगा रखी हैं।
नरपत सिंह ने बताया- मैं प्लास्टिक की चुड़ी बनाने के बिजनेस से जुड़ा था। इस मशीन को देखा तो यूनिट लगाने का तय किया। 5 महीने पहले मई में एक मशीन किश्त पर ली। इसके बाद जुलाई में एक और मशीन ले ली।
एक मशीन पर 8 घंटे में करीब 6 हजार सिकोरे बनते हैं। मेरे यहां 10 लेबर को रोजगार मिल रहा है। सारा खर्च निकालने के बाद 70 से 80 हजार रुपए प्रतिमाह कमाई हो जाती है।
यहां से सिकोरे पाली शहर में चाय की 60 दुकानों पर सप्लाई होते हैं। इसके अलावा ओम बन्ना, नाडोल, खाटू श्यामजी, सोनाणा, खेतलाजी तक जाते हैं। एक सिकोरा 1.60 रुपए में बेचता हूं।
दीपावली पर इसी मशीन से दीपक बनाने का काम भी करूंगा।

पाली में मशीन से तैयार होते सिकोरे।
मशीन से बनते हैं अलग-अलग डिजाइन के सिकोरे
नरपत सिंह ने बताया- मशीन से 100 ML, 200 ML और 80 ML के अलग-अलग डिजाइन के सिकोरे बनते हैं।
सिकोरे के लिए मिट्टी खेतावास गांव के तालाब से आती है। यह मिट्टी काली और चिकनी होती है। मिट्टी ढोने का काम ट्रैक्टर से होता है।
मिट्टी की एक ट्रॉली की कीमत 1600 रुपए है। इस मिट्टी को मिक्सर में डालकर महीन किया जाता है। इसके बाद इसमें पानी मिलाकर बड़े प्लास्टिक से कवर किया जाता है।
इसके बाद मशीन में सिकोरे की डाई लगाई जाती है। जिस आकार का सिकोरा चाहिए उस आकार की डाई का इस्तेमाल किया जाता है।
इसके बाद मशीन चालू कर मिट्टी डालते हैं। करीब 3 मिनट में 10 सिकोरे तैयार हो जाते हैं। कच्चे सिकोरे भट्टी में 4 घंटे तक पकाए जाते हैं। इसके बाद 15 घंटे तक ठंडे होने के लिए रख दिया जाता है। अब सिकोरे बिक्री के लिए तैयार होते हैं।

पाली के खेतावास के निकट रीको इंडस्ट्रीज एरिया में मिट्टी के दीपकों को भट्टी में तपाते हुए।
पति की मौत के बाद सिकोरा निर्माण से बढ़ी इनकम
पाली शहर के बजरंग बाड़ी में रहने वाली सविता देवी ने बताया- मेरे पति की मौत 12 साल पहले बीमारी से हो गई थी।
कंस्ट्रक्शन साइट पर मजदूरी कर मैं अपने 3 बच्चों को पाल रही थी। कभी कभी महीने पर काम नहीं मिलता था। अब मिट्टी के सिकोरे बनाने का काम कर रही हूं। प्रतिमाह 11 से 12 हजार रुपए मिल जाते हैं।
पाली के नया गांव क्षेत्र में रहने वाली फूल कंवर ने बताया- मेरे तीन बच्चे हैं। पति चूड़ी का काम करते हैं। इनकम ज्यादा नहीं है। इसलिए मैं सिकोरे बनाती हूं। प्रतिमाह 10 से 12 हजार रुपए कमाती हूं। इससे घर खर्च चलने काफी मदद हो जाती है।

पाली के खेतावास के निकट रीको इंडस्ट्रीज एरिया में मिट्टी के दीपक बनकर तैयार किए गए।
रेलवे के जुड़ने से पाली में बढ़ेगा मिट्टी के सिकोरे बनाने का बिजनेस
पूर्व विधायक ज्ञानचंद पारख ने बताया- पहले जहां 8 घंटे में 800 से एक हजार सिकोरे ही बनते थे वही अब इस मशीन से 8 घंटे में करीब 6 हजार सिकोरे बन जाते है। इससे इस काम से जुड़े लोगों की इनकम बढ़ने लगी है।
रेलवे मंत्री अश्विनी दवे ने जब यह काम देखा तो काफी प्रभावित हुए और कहा कि पाली में बनने वाले मिट्टी के सिकोरे अच्छी क्वालिटी के है। जिन्हें रेलवे प्लेटफॉर्म पर चाय की दुकानों से लेकर ट्रेनों में उपयोग किया जाएगा।
इससे प्लास्टिक के कप से लोगों को छुटकारा मिलेगा। रेलवे मंत्री द्वारा यह घोषणा करने के बाद पाली में इस इंडस्ट्रीज में रोजगार और बढ़ेगा।

सिकोरा उद्योग को बढ़ावा दिए जाने के बाद महिलाओं को रोजगार मिलेगा।
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